शिक्षक दिवस का औचित्य और शिक्षा व्यवस्था का गहराता संकट।

   




लगभग ₹58,000 करोड़ के  कोचिंग उद्योग  बन गया है। 

वर्तमान समय में हमारी शैक्षणिक संस्थाओं के लगातार गिरते स्तर और शिक्षा प्रणाली में आए विकारों ने विद्यार्थियों के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात किया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जो इस बात का दर्दनाक प्रमाण है कि सामाजिक गतिशीलता की अंधी दौड़ ने युवाओं को किस चिंता और तनाव में धकेल दिया है। प्रीमियर संस्थानों जैसे IIT में आत्महत्या की घटनाएँ हों या NEET जैसी परीक्षाओं के पर्चा लीक व स्थगन से उपजा तनाव, आज विद्यार्थी असुरक्षा और अनिश्चितता के घेरे में हैं।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में देश में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। एक तरफ जहाँ सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है और शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य करवाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कोचिंग संस्कृति और 'डमी स्कूलों' का एक विशाल व्यवसाय बन चुका है। लगभग ₹58,000 करोड़ के इस कोचिंग उद्योग ने शिक्षण के मूल तत्व को समाप्त कर इसे केवल नौकरी पाने और परीक्षा पास करने की तकनीकी ट्रेनिंग तक सीमित कर दिया है।

अकादमिक स्वतंत्रता पर बढ़ता अंकुश, विश्वविद्यालयों में डर का माहौल, और नव-उदारवादी बाजारवाद के प्रभाव ने शिक्षा की लोकतांत्रिक और मानवीय भावना को कमजोर किया है। जब ज्ञान को केवल मौद्रिक मूल्य और तकनीकी उत्पादकता के पैमाने पर मापा जाने लगे, तो आलोचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास रुक जाता है।

इस संकटपूर्ण स्थिति में, यदि शिक्षक अपनी आवाज बुलंद नहीं करते और शिक्षा के मूल्यों की रक्षा के लिए आगे नहीं आते, तो शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य निष्प्राण रह जाता है। विद्यार्थियों द्वारा अन्याय और शिक्षा पर हो रहे प्रहारों के खिलाफ आवाज उठाना उम्मीद की एक किरण है। अब शिक्षकों को भी इस अभियान का नेतृत्व करना होगा ताकि शिक्षण के वास्तविक अर्थ और लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली को बचाया जा सके।












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