वैश्विक और भारतीय परिदृश्य में असमानता की दोहरी तस्वीर।
विषमता के चक्रव्यूह में दुनिया और भारत: आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक चुनौतियाँ।
दुनिया भर में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, अंतरिक्ष तक पहुँच बन चुकी है, लेकिन इसके बावजूद मानव समाज एक गहरी और चौड़ी होती खाई (असमानता) का सामना कर रहा है। वैश्विक संस्थाओं (जैसे वर्ल्ड इनइक्विलिटी लैब) की रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया की कुल संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा चंद अमीर लोगों के हाथों में सिमटा है, जबकि एक बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है।
1. वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक असमानता वाले देश और उसके कारण आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक असमानता के मामले में दुनिया के कुछ देश सबसे आगे हैं:
दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया - ये देश वैश्विक स्तर पर आय और संपत्ति की असमानता में सबसे ऊपर हैं (यहाँ का गिनी गुणांक सबसे अधिक है)।
कारण: ऐतिहासिक रूप से रंगभेद (Apartheid) की नीतियाँ, भूमि और संसाधनों पर एक छोटे श्वेत या अभिजात वर्ग का कब्जा, और श्रम बाजार का अत्यधिक खंडित होना।
लैटिन अमेरिकी देश (जैसे ब्राजील, कोलंबिया, और मैक्सिको): इन देशों में ऐतिहासिक रूप से संपत्ति का संकेंद्रण बहुत अधिक रहा है।
कारण: औपनिवेशिक काल से चली आ रही भू-स्वामित्व प्रणाली कमजोर कर प्रणालियाँ और अनौपचारिक क्षेत्र का बहुत बड़ा होना।
असमानता के प्रमुख रूप:
आर्थिक: संपत्ति और आय का असमान वितरण, जहाँ शीर्ष के 10% लोग 70% से अधिक संपत्ति पर अधिकार रखते हैं।
सामाजिक: नस्ल, जाति, लिंग और वर्ग के आधार पर भेदभाव, जिसके कारण हाशिए के लोगों को आगे बढ़ने के समान अवसर नहीं मिलते।
शैक्षणिक: महंगे निजी संस्थान बनाम खस्ताहाल सरकारी स्कूल। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल संपन्न वर्ग की पहुँच में है।
2. भारत के संदर्भ में असमानता की स्थिति
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन यहाँ की आंतरिक असमानता भी उतनी ही गहरी है।
आर्थिक असमानता: भारत में 'वर्ल्ड इनइक्विलिटी रिपोर्ट' के अनुसार, देश की आय और संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा बहुत कम अमीर लोगों के पास केंद्रित है। देश के एक बड़े हिस्से की आय बेहद कम है।
सामाजिक असमानता: सदियों पुरानी जाति व्यवस्था, पितृसत्तात्मक सोच और ग्रामीण-शहरी विभाजन इसके मुख्य आधार हैं। महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी कम होना सामाजिक-आर्थिक असमानता को और बढ़ाता है।
शैक्षणिक असमानता: भारत में दोहरी शिक्षा प्रणाली प्रचलित है। एक तरफ कॉन्वेंट और महंगे इंटरनेशनल स्कूल हैं जहाँ अत्याधुनिक तकनीक मिलती है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इसके अलावा, उच्च शिक्षा (जैसे मेडिकल और इंजीनियरिंग) की भारी फीस गरीब मेधावी छात्रों के लिए रुकावट बनती है।
भारत में असमानता के मुख्य कारण:
संसाधनों का असमान वितरण: उदारीकरण के बाद से विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचे हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य तक असमान पहुँच: शिक्षा और स्वास्थ्य का व्यवसायीकरण होने के कारण गरीब व्यक्ति कर्ज के जाल में फंस जाता है।
कृषि संकट और अनौपचारिक रोजगार: देश की एक बड़ी आबादी आज भी कृषि या कम वेतन वाले असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है, जहाँ सामाजिक सुरक्षा का अभाव है।
असमानता केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा और लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है। जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी संसाधनों पर हर नागरिक का समान अधिकार सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक समावेशी विकास का सपना अधूरा रहेगा। सरकार और समाज दोनों को मिलकर नीतिगत स्तर पर सुधार करने होंगे, ताकि विकास का पहिया हर व्यक्ति के जीवन में बदलाव ला सके।
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