अस्पृश्यता, 'पवित्रता' की अवधारणा और कानून की सीमा !
हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद आयोजित एक 'शुद्धिकरण' अनुष्ठान ने भारतीय कानून में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के कानूनी पहलुओं पर पुनः बहस छेड़ दी है।
अनुच्छेद 17: संविधान अस्पृश्यता को समाप्त करता है, हालांकि यह इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं देता। संसद ने इसे लागू करने के लिए 'नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955' बनाया।
निजी व्यक्तियों पर लागू: सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, अनुच्छेद 17 के प्रावधान राज्य के साथ-साथ गैर-राज्य (निजी) संस्थाओं/व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय हैं।
अपराध की शर्तें: SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत केवल अपमान करना अपराध नहीं है; यह साबित होना आवश्यक है कि अपमान व्यक्ति की जाति के आधार पर और 'सार्वजनिक दृष्टि' (Public view) में किया गया था (हितेश वर्मा मामला)।
उच्चतम और उच्च न्यायालय की व्याख्या
'शुद्धता और प्रदूषण' का सिद्धांत: सुकन्या शांता (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अस्पृश्यता जाति व्यवस्था और 'पवित्रता-अशुद्धता' की धारणाओं से जुड़ी है। अनुच्छेद 17 ऐसे किसी भी भेदभावपूर्ण व्यवहार को खारिज करता है जो किसी व्यक्ति के स्पर्श या उपस्थिति पर आधारित हो।
समान पहुंच का अधिकार: सूर्यनारायण चौधरी (1988) मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने नाथद्वारा मंदिर में दलित श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश से पहले शुद्धिकरण की शर्त को भेदभावपूर्ण और अनुच्छेद 14, 15 व 17 का उल्लंघन माना था।
हल्द्वानी विवाद का कानूनी आधार
किसी स्थल के 'शुद्धिकरण' मात्र से अस्पृश्यता सिद्ध नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या अनुष्ठान का मुख्य कारण जातिगत अशुद्धता की धारणा और खरगे की उपस्थिति/स्पर्श था, या फिर इसका आधार कोई अन्य राजनीतिक/गैर-जातिगत कारण था। केवल 'शुद्धिकरण' शब्द का प्रयोग कानूनी रूप से अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है; इसके पीछे की जातिगत मंशा को सिद्ध करना अनिवार्य है।

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