चोरी का नशा, नशे की चोरी! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   


भोर की पहली किरण अभी ठीक से फूटी भी नहीं थी कि दिनचर्या के नियम से कदम मन्दिर की ओर बढ़ गए। गाँव का मन्दिर महज आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे जेवार का ताजा-तरीन समाचार कक्ष भी होता है। वहाँ हर सुबह कुछ ‘खबरची’ जमा रहते हैं, जिनके मुखारविंद से जब तक दस-बीस लोगों को रात भर की वारदातें न सुनवा दी जाएँ, तब तक उनका पेट नहीं पचता। खबर की गंभीरता के हिसाब से ही उनके चेहरे के भाव बदलते हैं। बिना किसी औपचारिकता के, एक खबरची ने बड़े नाटकीय अंदाज़ में सुनाया—"आपके भैया के समर्सिबल का केबल कट गया, और पड़ोस वाले का भी!"

खबर सुनकर मैं अपनी रोज़मर्रा की टहलकदमी पर निकल गया। लौटते-लौटते तक यह खबर पूरे गाँव की हवा में आग की तरह फैल चुकी थी। रस्ते में भैया मिले, हाल-चाल हुआ तो नए बन रहे मकान की सुरक्षा को लेकर सीसीटीवी कैमरे लगाने की चिंता जताने लगे।

सुबह की इस हलचल के बाद सब अपने-अपने गृह-कार्यों में व्यस्त हो गए। कुछ ही घंटे बीते होंगे कि भतीजा घर आया। मंझले भाई ने उससे कहा—"रात में चाचा का केबल कट गया।" भतीजे ने उत्सुकतावश पूछा कि तार कैसा होता है? भाई ने अपने समर्सिबल के लटकते तार की तरफ इशारा करते हुए जैसे ही उसे समझाना चाहा, आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ से तार नदारद था!

दूसरों की तकलीफ अब पल भर में अपनी त्रासदी बन चुकी थी। मैं भी घर से बाहर निकला; यह चोरी की सूची में तीसरी वारदात थी। सुबह से न जाने कितनी बार हम सब उसी रास्ते से गुजरे थे, लेकिन किसी की नज़र उस कटे हुए सिरे पर नहीं पड़ी थी। मैंने हड़बड़ी में जाकर अपने समर्सिबल का जायजा लिया—राहत की बात थी कि वह 'अंडरग्राउंड' था, इसलिए महफ़ूज़ रह गया। भाई का केबल तो बिल्कुल दरवाज़े के सामने था, फिर भी किसी को आहट तक न हुई।

गाँव में यह कोई पहली घटना नहीं थी। कुछ दिन पहले ही कई समर्सिबल गायब हो चुके थे। साइकिलें और छोटे-मोटे सामान चुरा लिया जाना तो अब इतना आम हो चुका है कि लोग इसे किस्मत का लिखा मानकर हँसते-हँसते सह लेते हैं। गाँव के मन्दिर के दान पेटी तोड़कर कई बार खेतों में तोड़े हुए मिले। इसे भी प्रभु की कृपा समझकर लोग सह लेते हैं। 

परंतु यह सिर्फ चोरी का मामला नहीं है, यह गाँव की नसों में फैलते नशे के ज़हर का भयावह प्रकोप है। स्मैक, गांजे और शराब की लत में डूबे युवाओं की यह करतूत गाँव की शांति को दीमक की तरह चाट रही है। अभी तो आधे गाँव ने अपने समर्सिबल के केबल जाँच भी नहीं किए हैं; अगर ढलती शाम तक इस फेहरिस्त में कुछ और नाम जुड़ जाएँ, तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

— प्रो. प्रसिद्ध कुमार

(बाबूचक, फुलवारी)












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