डिजिटल युग का नया जाल: डार्क पैटर्न और उपभोक्ताओं का शोषण।
डिजिटल दुनिया और ऑनलाइन सेवाओं ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही हमारे सामने नए तरह के धोखे भी खड़े कर दिए हैं। हाल ही में सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) द्वारा एक राइड एग्रीगेटर पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ऑनलाइन व्यवसायों में किस प्रकार ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है।
डार्क पैटर्न क्या हैं और यह कैसे काम करते हैं?
बास्केट स्नेकिंग: ट्रेन टिकट बुक करते समय बिना इच्छा के भोजन को साथ में जोड़ देना, जिसका भुगतान ग्राहक अनजाने में कर बैठते हैं।
मनोवैज्ञानिक प्रलोभन: "जितनी अधिक कीमत, राइड मिलने की उतनी अधिक संभावना" जैसे प्रॉम्प्ट्स का उपयोग करके उपयोगकर्ताओं से अधिक किराया वसूला जाना।
बैटरी और ओएस आधारित भेदभाव: कुछ राइड एग्रीगेटरों पर यह आरोप भी है कि वे उन उपयोगकर्ताओं से अधिक किराया वसूलते हैं जिनके फोन की बैटरी कम होती है या जो प्रीमियम ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं।
डार्क पैटर्न केवल एक मनोवैज्ञानिक चाल नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा डाका डाल रहा है।
Datum इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय उपयोगकर्ता डार्क पैटर्न के कारण औसतन ₹78-87 प्रति माह गंवाते हैं, जिससे इसका वार्षिक कुल योग ₹28,000 करोड़ तक पहुंच सकता है।
पिछले साल, अमेज़ॅन ने अपने प्राइम प्रोग्राम नामांकन से संबंधित कथित डार्क प्रथाओं के लिए यूएस फेडरल ट्रेड कमीशन के साथ 2.5 अरब डॉलर का समझौता किया था।
यह पूरी व्यवस्था सूचना असंतुलन (इन्फॉर्मेशन असमट्री) पर टिकी होती है, जहाँ ग्राहक के पास सच्चाई जानने का कोई साधन नहीं होता।
भारत में पिछले तीन वर्षों से 13 प्रकार के "डार्क पैटर्न" प्रतिबंधित हैं, इसके बावजूद ये ई-कॉमर्स वेबसाइटों से लेकर स्ट्रीमिंग सेवाओं तक हर जगह फैले हुए हैं। सरकार ने हाल ही में एक मजबूत कदम उठाते हुए यह अनिवार्य किया है कि ऑनलाइन विक्रेताओं को छूट की घोषणा करते समय उत्पाद की वास्तविक पूर्व कीमत का खुलासा करना होगा।
सुविधा के नाम पर ग्राहकों का शोषण रोकने के लिए ऐसे और अधिक कड़े कदमों की आवश्यकता है, ताकि राइड-हेलिंग हो या फूड डिलीवरी, हर जगह ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।
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