जरासंध का सिद्धांत और राजनीतिक दलों का विभाजन।
भारतीय राजनीति में कॉरपोरेट तर्ज पर राजनीतिक दलों के विभाजन का विचार नया नहीं है। कांग्रेस से लेकर कई कम्युनिस्ट पार्टियों और हाल ही में शिवसेना के विभाजन में यह देखा जा चुका है। अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बारी है।
राजनीतिक दलों में 'ब्रांड' और प्रतीकों की लड़ाई
पश्चिम बंगाल में आगामी दो उपचुनावों में प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से TMC के 'फूल और घास' चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर संघर्ष छिड़ गया है।
चुनाव आयोग (EC) द्वारा नाम और प्रतीक को अंतरिम रूप से फ्रीज करना, एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे के 'असली शिवसेना कौन है?' के फार्मूले जैसा ही एक सटीक कदम है। इसे राजनीति पर 'जरासंध पूंजीवाद' लागू करना कहा जा सकता है, जिसमें इकाई को दो हिस्सों में बांट दिया जाता है और फिर यह खोजा जाता है कि दोनों हिस्से खुद को असली बता रहे हैं।
कंपनियों के लिए सबसे मूल्यवान संपत्ति उनका ब्रांड होती है। इसी प्रकार राजनीतिक ब्रांडों में भी नेताओं, नारों, वफादारियों, रंगों और प्रतीकों की संचित विरासत शामिल होती है।
एक मतदाता चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के पैरा 15 के बारे में भले ही ज्यादा न जानता हो, लेकिन वह एक फूल, तीर या कमल को तुरंत पहचान लेता है।
प्रमाणिकता और अस्तित्व की लड़ाई
पार्टी के विभाजन में एक अजीब सी हिंसा होती है क्योंकि कोई भी स्टार्टअप शुरू नहीं करना चाहता, बल्कि दोनों पक्ष सद्भावना, ट्रेडमार्क और भावनात्मक वजन के साथ विरासत वाली कंपनी चाहते हैं।
शिवसेना के विवाद ने इस समस्या को स्पष्ट रूप से दिखाया था और अब तृणमूल का झगड़ा भी उसी बुनियादी ढांचे को दोहरा रहा है।
अलगाव से केवल दो प्रतिस्पर्धी राजनीतिक संगठन ही नहीं बनते, बल्कि प्रामाणिकता के लिए एक बुनियादी लड़ाई छिड़ जाती है। जिस प्रकार पौराणिक कथाओं में जरासंध को बीच से चीरकर दो हिस्सों में बांटा गया था, उसी तरह एक राजनीतिक ब्रांड भी बंट सकता है। असली कठिनाई तब शुरू होती है जब दोनों हिस्से विजिटिंग कार्ड की मांग करते हैं।
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