विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र असंतोष: नियंत्रण के बजाय विश्वास की आवश्यकता।

   



भारतीय विश्वविद्यालयों में जनरेशन-ज़ेड (Gen Z) के छात्र लगातार अपनी स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। हाल के घटनाक्रम—जैसे कि कानून के छात्रों और बार काउंसिल के बीच विवाद तथा विभिन्न परिसरों में होते विरोध-प्रदर्शन—इस बात का संकेत हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में एक गहरा प्रशासनिक संकट व्याप्त है।

विश्वविद्यालयों का मूल आधार अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वायत्तता है। हालाँकि भारतीय संविधान में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन वैश्विक स्तर पर (जैसे जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन आदि) इसे संवैधानिक अधिकार माना गया है। भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में वैचारिक कारणों से पाठ्यक्रम में बदलाव, शोध पर नियंत्रण और स्वतंत्र चिंतन को दबाने के प्रयास बढ़ रहे हैं, जिससे अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।

वर्तमान में अधिकांश विश्वविद्यालय 'कुलपति-केंद्रित' और 'नियंत्रण आधारित' व्यवस्था पर चल रहे हैं।

इस व्यवस्था में कुलपति और प्रशासन छात्रों से दूर हो जाते हैं। जब शिकायतों का समय पर निवारण नहीं होता, तो छात्रों में घबराहट और असंतोष पनपता है, जो अक्सर उग्र आंदोलनों के रूप में सामने आता है।

विश्वविद्यालयों को 'नियंत्रण मॉडल' छोड़कर 'लिबर्टी मॉडल' अपनाना चाहिए। इसमें छात्रों पर भरोसा किया जाता है, उन्हें प्रशासन, पाठ्यक्रम निर्माण और नियम निर्धारण जैसी प्रक्रियाओं में भागीदार बनाया जाता है। संवाद और पारदर्शिता से कई विवाद स्वतः हल हो सकते हैं।

भारत में शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने का लक्ष्य लंबे समय से अधूरा है और यह 4-4.1% के आसपास अटका हुआ है। वित्तीय कमी के कारण सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का बुनियादी ढांचा चरमरा रहा है:

शिक्षकों के स्थायी पदों का खाली होना और तदर्थ व्यवस्था पर निर्भरता।

निष्पक्ष भर्ती प्रक्रियाओं का अभाव तथा पेपर लीक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की घटनाएँ।

छात्रों के असंतोष को केवल अनुशासनहीनता मान लेना भूल होगी; इसके पीछे विश्वविद्यालय शासन की नाकामी मुख्य वजह है। यदि सरकार और प्रशासन परिसरों में विश्वास का वातावरण पुनः बहाल करना चाहते हैं, तो उन्हें विश्वविद्यालयों को 'नियंत्रण-केंद्रित' के स्थान पर 'छात्र-केंद्रित' बनाना होगा और परिसरों का लोकतांत्रिकरण करना होगा।

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