भारत में बढ़ती प्रोटीन की मांग और चुनौतियाँ।
भारत की खाद्य प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव आ रहा है, जिसके तहत प्रति व्यक्ति प्रोटीन की खपत 2025 के 9.5 किग्रा से बढ़कर 2070 तक 30 किग्रा से अधिक होने का अनुमान है।
यदि पारंपरिक तरीकों से इस मांग को पूरा करने का प्रयास किया गया, तो पशुधन, कृषि संसाधनों और ग्रीनहाउस गैसों (CO2) का उत्सर्जन 44 गीगाटन से अधिक हो जाएगा।
एशिया रिसर्च एंड एंगेजमेंट (ARE) और FICCI की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, बिना किसी बदलाव के उत्पादन जारी रखने पर 2070 तक वार्षिक उत्सर्जन जलवायु-सुरक्षित सीमा (1.9 गीगाटन) से लगभग आठ गुना अधिक हो सकता है।
केवल उत्पादन में सुधार (जैसे मीथेन और खाद उत्सर्जन कम करना) पर्याप्त नहीं है, बल्कि भारत को अपने प्रोटीन स्रोतों में विविधता लानी होगी।
इसका उद्देश्य डेयरी, पोल्ट्री या मछली उद्योगों को प्रतिस्थापित करना नहीं है, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय प्रोटीन पोर्टफोलियो तैयार करना है जो मौजूदा प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव डाले बिना भविष्य की मांग को संभाल सके।
भारत की मुख्य ताकत उसकी अंतर्निहित खाद्य संस्कृति यानी दालें (दलहन) हैं। दालों से होने वाली प्रोटीन की खपत 2025 के 3.5 मिलियन टन से बढ़कर 2070 तक 9.3 मिलियन टन होने का अनुमान है, जिससे दालें डेयरी के बाद दूसरी सबसे बड़ी प्रोटीन श्रेणी बन जाएंगी।
वर्तमान में भारत अपने अधिकांश प्रसंस्कृत पादप प्रोटीन आइसोलेट्स का आयात करता है, जबकि देश में मूल्य-वर्धन (Value addition) की अपार संभावनाएँ अभी भी अनछुए रूप में मौजूद हैं।
प्रोटीन निष्कर्षण, सामग्री और खाद्य विनिर्माण तकनीक में निवेश से भारत घरेलू स्तर पर अधिक मूल्य बनाए रख सकता है और कृषि उत्पादन के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।
प्रोटीन विविधीकरण को केवल स्थिरता (Sustainability) के नजरिए से नहीं, बल्कि विनिर्माण और नवाचार के माध्यम से मूल्य सृजन के रूप में देखा जाना चाहिए।
आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और पशु चारे की समस्या
भारत को पशु चारे की एक बड़ी कमी का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हरे चारे की लगभग 36%, सूखे चारे की 11% और सांद्र चारे की 44% कमी का अनुमान है।
यदि पशु प्रोटीन की मांग उम्मीद के मुताबिक बढ़ती है, तो उपलब्धता और उत्पादन लागत पर भारी दबाव पड़ सकता है, जिसे जलवायु अस्थिरता और बढ़ा देती है।
छोटे उत्पादक, जो अधिकांश दूध उत्पादन (लगभग 72%) का जिम्मा संभालते हैं, उन पर अकेले बदलाव का वित्तीय बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। इसके लिए बैंकों और निवेशकों को उचित वित्तपोषण, बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहायता विकसित करनी होगी।
भारत की प्रोटीन की खपत रातों-रात तीन गुना नहीं हो जाएगी, इसलिए तैयारी करने का पर्याप्त समय है, बशर्ते इसे समय रहते सही तरीके से किया जाए।
भारत को वर्तमान से तीन गुना बड़ी प्रोटीन प्रणाली की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक अधिक उत्पादक, विविध और लचीली प्रणाली की जरूरत है जो किसानों, भारतीय व्यवसायों और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए अधिक मूल्य पैदा करते हुए पोषण संबंधी मांग को पूरा कर सके।

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