व्यवस्था का दीवाला और युवाओं का भविष्य: दारोगा बहाली में धांधली !
चयन आयोगों की कार्यप्रणाली में किस हद तक पारदर्शिता की कमी और लापरवाही व्याप्त है इसके
परिणाम से जाना जा सकता है। क्या यह एक संयोग है?
क्रमवार चयन का चौंकाने वाला गणित: बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग की दारोगा मुख्य परीक्षा के परिणाम में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं, जहां विभिन्न परीक्षा केंद्रों के अलग-अलग कमरों और कतारों में बैठकर करीब 301 अभ्यर्थी क्रमवार तरीके से पास घोषित कर दिए गए।
पारदर्शिता और उत्तर-कुंजी का अभाव: उम्मीदवारों का यह आरोप पूरी तरह जायज है कि परीक्षा के बाद न तो पीटी का मार्क्स बताया जाता है और न ही ओएमआर शीट या मॉडल उत्तर-कुंजी देखने का अधिकार दिया जाता है, जो सीधे तौर पर उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना है।
सवालों के घेरे में आयोग की चुप्पी: एक तरफ ईओयू (EOU) द्वारा यह पूछा जा रहा है कि आखिर 79 कतारों में 301 रोल नंबर क्रमवार कैसे पास हो गए, तो दूसरी तरफ आयोग और संबंधित अधिकारी इस पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।
क्या होगा युवाओं का?
यह सवाल आज देश और व्यवस्था के माथे पर एक बड़ा कलंक है। जो युवा रात-दिन एक करके अपनी जवानी, ऊर्जा और गाढ़ी कमाई का पैसा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में झोंक देते हैं, उनके भरोसे का इस तरह कत्ल होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। जब मेधावी और योग्य छात्रों के स्थान पर कथित धांधली, साल्वर सिंडिकेट और सिस्टम की खामियों के जरिए लोग 'दारोगा' जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठेंगे, तो कानून के राज की क्या स्थिति होगी, यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
यदि पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली, उत्तर-कुंजी जारी करने की व्यवस्था और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो युवाओं का व्यवस्था से पूरी तरह से विश्वास उठ जाएगा, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।
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