( संस्मरण) केसिंगा की माटी: अभाव के आंचल से आत्मीयता के सफर तक। -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
ओडिशा के अंचल में फैला कलाहांडी जिला और उसकी गोद में बसा केसिंगा कस्बा, प्रकृति की सुंदर छटा और इतिहास के एक लंबे संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है। छोटी-छोटी पहाड़ियों और सघन जंगलों के बीच घिरा यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र कभी देश के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता था। अस्सी के दशक का वह दौर आज भी सिहरन पैदा कर देता है, जब भीषण सूखे की मार ने यहाँ के जनजीवन को झकझोर कर रख दिया था। उस वक्त पेट की आग बुझाने के लिए लोगों को जंगलों की घास और पत्तों का सहारा लेना पड़ता था।
विकास के पदचिह्न और ऐतिहासिक पदयात्रा
इस बदहाली के भंवर से कलाहांडी को निकालने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने यहाँ सिंचाई और बुनियादी विकास की नींव रखी। उस दौर में यहाँ के जुझारू सांसद भक्त चरण दास थे, जिन्होंने क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभाई। आगे चलकर चंद्रशेखर की सरकार में वे रेल राज्य मंत्री बने और उनके तथा तत्कालीन गृह राज्य मंत्री के नेतृत्व में केसिंगा और टिटिलागढ़ जैसे रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प हुआ।
यह क्षेत्र तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब अस्सी के दशक में चंद्रशेखर के नेतृत्व में भक्त चरण दास, श्याम रजक ( फुलवारी विधायक) सहित दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कलाहांडी से दिल्ली तक हजारों किलोमीटर की ऐतिहासिक पदयात्रा की थी। इस पदयात्रा ने देश की सोई हुई व्यवस्था का ध्यान इस अंचल की भुखमरी और उपेक्षा की ओर खींचा था।
तेल नदी का तट और स्मृतियों के गलियारे
तेल नदी के तट पर बसा केसिंगा अपनी प्राकृतिक सुंदरता से मन मोह लेता है। यहाँ की फिजाओं में एक अजीब सा सुकून है। इसके समीप ही फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध सितारे गुलशन कुमार द्वारा बनवाया गया भव्य मंदिर अपनी अनूठी भव्यता से सबका ध्यान खींचता है। इस भूमि से महीनों जुड़े रहने और बार-बार यहाँ आने के कारण यहाँ के कण-कण से एक गहरा आत्मीय लगाव है।
सुदूर जंगलों में आदिवासियों के जीवन को करीब से देखना मन को भावविह्ल कर देता था। उस समय महिलाओं और युवतियों के पास तन ढंकने के लिए पूरे वस्त्र तक नहीं होते थे, वे बस एक ही साड़ी को किसी तरह अपने शरीर पर लपेटे रहती थीं। भोजन के नाम पर मूरी, नदी की ताजी मछलियां और जंगलों से मिलने वाले कंदमूल व फल ही उनका सहारा थे। शिक्षा का ऐसा अभाव था कि साक्षर व्यक्ति ढूंढने से भी नहीं मिलता था। आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने की बात करें तो शहरों में मारवाड़ी समाज का वर्चस्व था; बड़े-बड़े व्यापार, हवेलियां और अटारी उन्हीं की थीं, जबकि फुटपाथों और मंडियों में अपनी छोटी-मोटी उपज बेचने आने वाले लोग यही शोषित आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग हुआ करते थे।
समय का पहिया और अमिट यादें
वर्ष 2012 में विजयनगरम की यात्रा के दौरान इस रास्ते से गुजरने का अंतिम अवसर मिला। आधी रात को जब ट्रेन केसिंगा स्टेशन पर दो मिनट के लिए रुकी, तो खुद को रोक पाना कठिन था। मैं ट्रेन से नीचे उतरा, इस पावन माटी को नमन किया और वापस अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
इस रेल मार्ग पर पड़ने वाले संबलपुर, हीराकुंड बांध, टिटिलागढ़ और झारसुगुड़ा जैसे नाम आज भी जेहन में तरोताजा हैं। केसिंगा सिर्फ एक रेलवे स्टेशन या कस्बा नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, करुणा, मानवीय पीड़ा और उस अटूट जुड़ाव की एक ऐसी कहानी है जो समय की धूल में कभी धुंधली नहीं पड़ती।
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