दिखावे का फेर नहीं, विश्वसनीयता की जरूरत: भारतीय निर्वाचन आयोग की साख और सुधार।
The indian express की पत्रकार रितिका चोपरा को सैल्यूट!
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की साख और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर हालिया संपादकीय और रिपोर्टों में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। केवल निर्वाचन आयोग के अधिकारियों में फेरबदल करने से स्थिति में सुधार नहीं होगा, बल्कि आयोग को अपनी कार्यशैली में पारदर्शिता लाकर अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी।
ट्रस्ट बनाम वर्थिनैस (विश्वास बनाम पात्रता): चुनाव आयोग लंबे समय तक केवल 'विश्वास' के सहारे चला है, न कि अपनी 'विश्वसनीयता' के प्रदर्शन पर। पिप्पा नॉरिस के अनुसार, विश्वास नागरिकों का एक आत्मपरक आकलन है, जबकि विश्वसनीयता संस्थान का वास्तविक प्रदर्शन और निष्पक्षता है।
चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी: मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन पैनल से हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने से आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। एक ऐसी चयन प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जिसमें विपक्षी दल भी विश्वास जता सकें।
निर्णयों का आधार सार्वजनिक हो: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे महत्वपूर्ण मामलों में आयोग को केवल अंतिम आदेश ही नहीं, बल्कि उसके पीछे के साक्ष्य, प्रशासनिक विकल्पों और आपत्तियों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करना चाहिए।
बाहरी और स्वतंत्र संवीक्षा: राजनीतिक दलों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाजों को निर्वाचन आयोग की प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने और डेटा प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र एवं पारदर्शी चैनल मिलने चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस बनाम पारदर्शिता: केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी बात रखना पारदर्शिता नहीं है। असली पारदर्शिता वह है जो नागरिकों को निर्णयों के आधार की जांच करने की अनुमति दे।
चुनाव आयोग की साख किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शी कार्यप्रणाली पर टिकनी चाहिए ताकि भविष्य में हारने वाला दल भी परिणामों को स्वीकार कर सके।
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