दीर्घायु और जीवनशैली: जापान से सीख और भारत की राह ।
दीर्घायु और स्वस्थ जीवन आज के समय में पूरी दुनिया में चर्चा का एक मुख्य विषय बन चुका है। जापान में 100 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों (शतायु नागरिकों) की संख्या बढ़कर पहली बार 1,07,677 हो गई है, जिनमें 94,298 महिलाएं शामिल हैं। यह संख्या 1963 में केवल 153 थी। जापान की यह उपलब्धि हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर उन्होंने ऐसी कौन सी जीवन-पद्धति अपनाई है, जिससे एक पूरा देश स्वस्थ और सक्रिय रूप से लंबी उम्र जी रहा है।
दूसरी ओर, यदि हम भारत की बात करें, तो हमारी पारंपरिक जीवनशैली, खान-पान (थाली) और शारीरिक श्रम (श्रम) में स्वास्थ्य की असली कुंजी छिपी रही है। भारत में भी प्राचीन काल से स्वास्थ्य को किसी औषधि की शीशी में बंद वस्तु नहीं माना गया है, बल्कि इसे हमारी दिनचर्या, थाली, श्रम और संयम का हिस्सा माना गया है।
भारत और जापान की जीवनशैली में अंतर एवं समानताएं
जीवन-पद्धति और खान-पान: जापान के नागरिकों की दीर्घायु के पीछे बेहतर पोषण और स्वास्थ्य-व्यवहार की बड़ी भूमिका है। ठीक इसी तरह, भारत में भी यह माना जाता है कि धन से सुख-सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य नहीं।
निवारक स्वास्थ्य देखभाल (Preventive Healthcare): आज के दौर में रोग आने के बाद उपचार खोजने की अपेक्षा रोगों को आमंत्रित करने वाली जीवनचर्या से समय रहते किनारा करना अधिक बुद्धिमानी है, जिसे जापानी समाज ने अपने जीवन में चरितार्थ किया है।
महिलाओं की भूमिका: जापानी आंकड़ों का सबसे रोचक पक्ष यह है कि वहां दीर्घायु होने वालों में महिलाओं की भारी बहुलता (94,298 महिलाएं) है, जो स्वस्थ और गरिमापूर्ण ढंग से जीने की एक बड़ी मिसाल है।
जापान का यह आंकड़ा दुनिया के लिए केवल लंबा जीने का संदेश नहीं देता, बल्कि स्वस्थ, सक्रिय और गरिमापूर्ण ढंग से जीने की चुनौती भी सामने रखता है। भारत के पास अपनी समृद्ध पारंपरिक दिनचर्या और संयमित खान-पान की जो विरासत है, यदि हम उसे आधुनिक जीवन में अपनाएं, तो हम भी एक स्वस्थ और दीर्घायु समाज का निर्माण कर सकते हैं।
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