राजनीतिक जनसांख्यिकी और लोकतंत्र का भविष्य।

 


हाल के दिनों में इलोन मस्क से लेकर भारत के विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक नेताओं (जैसे चंद्रबाबू नायडू, एम.के. स्टालिन, मोहन भागवत आदि) द्वारा अधिक बच्चे पैदा करने की अपीलें की गई हैं। यह रुझान दर्शाता है कि जन्म, मृत्यु, प्रवासन और आबादी की उम्रदराजी से जुड़े 'राजनीतिक जनसांख्यिकी' के मुद्दे अब विश्व और भारत की राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं।

प्रसवोत्साहवाद का अर्थ: घटती जन्मदर को रोकने और आबादी बढ़ाने के लिए लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना।

वैश्विक अनुभव: जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और इटली जैसे देशों ने भारी वित्तीय प्रोत्साहन और नीतियां लागू कीं, लेकिन वे घटती प्रजनन दर को पुराने स्तर पर वापस लाने में सफल नहीं हो सके।

कारण: प्रजनन दर केवल पैसे या प्रोत्साहन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसका सीधा संबंध आवास, रोजगार, शिक्षा, लैंगिक बराबरी और जीवन-स्तर की लागत से है।

भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level - 2.1) से नीचे है। National Family Health Survey (NFHS-5) के अनुसार, सभी प्रमुख धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर घटी है और समुदायों के बीच का अंतर कम हो रहा है।


दक्षिण भारत: तेजी से उम्रदराज हो रहा है (उदा. केरल की मध्यस्थ आयु  2026 में ~37 वर्ष रहने का अनुमान है।

उत्तर भारत: अपेक्षाकृत युवा बना रहेगा (उदा. उत्तर प्रदेश की मध्यस्थ आयु 2026 में ~26.9 वर्ष है)।

 भारत में अवसरों की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रवासन हो रहा है (2011 जनगणना के अनुसार लगभग 4.5 करोड़ अंतर-राज्यीय प्रवासी)।

2026 के बाद होने वाले लोकसभा परिसीमन से जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और मानव विकास में अच्छा प्रदर्शन किया है (जैसे दक्षिणी राज्य), उन्हें संसद में सीटें व राजनीतिक प्रतिनिधित्व खोने का डर है।

 'एक व्यक्ति, एक वोट' का सिद्धांत और राज्यों/समूहों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

 युवा बनाम बुजुर्ग होती आबादी के कारण वित्तीय अंतरण  कर वितरण और कल्याणकारी खर्चों को लेकर राज्यों के बीच तनाव बढ़ सकता है।

जनसांख्यिकीय परिवर्तन कोई 'षड्यंत्र' या काल्पनिक विचार नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक और प्राकृतिक बदलाव है। राजनीति को जनसांख्यिकीय बदलावों से अल्पकालिक फायदा उठाने की जगह इसे संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ संभालना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी संस्थाएं स्थायी राजनीतिक टकराव पैदा किए बिना बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को कैसे समायोजित करती हैं।












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