न्यायिक सत्यनिष्ठा और जवाबदेही: एक अनिवार्य संस्थागत सुधार!

 



 

राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संदीप मेहता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने भारतीय न्यायपालिका के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक न्यायाधीश के आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

मामले के मुख्य पहलू

गंभीर आरोप: पत्रों के अनुसार, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पर न्यायाधीशों का उत्पीड़न, कुप्रबंधन, रोस्टर प्रणाली का दुरुपयोग (मामलों का अनुचित आवंटन), स्वजनपक्षपात और सहकर्मियों को डराने-धमकाने जैसे आरोप लगाए गए हैं।

संस्थागत विफलता: लगभग 11 महीनों से बिना स्थाई मुख्य न्यायाधीश के कार्यवाहक नेतृत्व में अदालत का चलना और अतीत में विवादित निर्णयों के बावजूद व्यापक प्रशासनिक अधिकार दिया जाना संस्थागत चूक को दर्शाता है।

वकीलों का विरोध: सार्वजनिक असंतोष के बाद वकीलों द्वारा किए गए धरने-प्रदर्शन और सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा नए मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश के बाद ही स्थिति में बदलाव देखा गया।

संरचनात्मक और प्रणालीगत चुनौतियाँ

पारदर्शिता का अभाव: कॉलेजियम और केंद्र सरकार के बीच बिना किसी स्पष्ट मापदंड के होने वाली नियुक्तियाँ और स्थानांतरण प्रक्रियाएँ प्रणाली को अपारदर्शी और पक्षपातपूर्ण बनाती हैं।

प्रभावी तंत्र की कमी: 'न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968' और 1999 की 'इन-हाउस व्यवस्था' भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में काफी हद तक निष्प्रभावी साबित हुई हैं। इसके अलावा, प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की पूर्व अनुमति की अनिवार्यता जाँच में बाधा बनती है।

महाभियोग प्रक्रिया की विफलता: अनुच्छेद 124(4) और 217(1)(b) के तहत संविधान में उल्लिखित महाभियोग प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील होने के कारण व्यावहारिक रूप से असफल साबित हुई है।

अतीत के उदाहरण और CJI की संस्थागत जिम्मेदारी

ऐतिहासिक रूप से न्यायपालिका की साख बचाने के लिए साहसिक कदम उठाए गए हैं:

1990 में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी पर जांच के दौरान तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें न्यायिक कार्य से अलग रहने की सलाह दी थी।

महाभियोग प्रस्ताव विफल होने के बाद, तत्कालीन CJI एम.एन. वेंकटचलिया ने न्यायमूर्ति रामास्वामी को कोई भी मामला आवंटित करने से इनकार कर दिया था।

हाल ही में, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े मामले में तत्कालीन CJI संजीव खन्ना द्वारा तुरंत स्थानांतरण और न्यायिक कार्य न सौंपने का फैसला भी एक उदाहरण है।

उच्च न्यायपालिका में जनविश्वास बनाए रखने के लिए केवल प्रशासनिक फेरबदल पर्याप्त नहीं हैं। जब तक एक पारदर्शी नियुक्ति प्रणाली (जैसे ब्रिटेन या कनाडा की तर्ज पर स्वतंत्र निकाय) और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक कठोर, निष्पक्ष कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया जाता, तब तक न्यायिक सत्यनिष्ठा पर उठने वाले सवाल समाप्त नहीं होंगे। CJI को संस्थागत गरिमा बनाए रखने के लिए समय रहते त्वरित और निर्णायक कदम उठाने होंगे।












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