न्याय, संघर्ष और उम्मीद का नया इतिहास: दीपांशु शौकीन और दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव ।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DUSU) के छात्रसंघ चुनाव हमेशा से राजनीति, रसूख और पैसे की चमक-दमक के लिए जाने जाते रहे हैं। यहाँ के गलियारों से निकले छात्र आगे चलकर देश की राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बनते हैं। लेकिन इस बार का चुनाव इन तमाम पुरानी परिभाषाओं को पीछे छोड़ गया। इस बार की जीत किसी बड़े राजनीतिक दल के रसूख की नहीं, बल्कि एक डीटीसी बस कंडक्टर के बेटे की बेबाक और दर्द से उपजी आवाज की जीत है।
जब दर्द बनता है अलार्म: 'न्याय सत्याग्रह' की अनकही कहानी
सितंबर की तपती दोपहरी में दिल्ली यूनिवर्सिटी के दक्षिणी कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन की एक इमारत ('हॉस्टल डेज') अचानक भरभरा कर बैठ गई। इस मलबे में 5 छात्रों और 2 मजदूरों की जान चली गई। यह हादसा सिर्फ एक इमारत का गिरना नहीं था, बल्कि उन हजारों छात्रों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल था जो दिल्ली के महंगे और अनधिकृत पीजी (PG) में रहने को मजबूर हैं।
इस हादसे के बाद कैंपस में एक लड़का ऐसा उठा जिसने अपने पैरों से जूते उतार दिए। नाम था दीपांशु शौकीन। उसने कसम खाई कि जब तक इन मासूम बच्चों को इंसाफ नहीं मिल जाता, वह पैरों में जूता-चप्पल नहीं पहनेगा।
निर्दलीय और साहसिक कदम: एनएसयूआई से टिकट न मिलने पर भी दीपांशु ने हार नहीं मानी और एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे।
अभूतपूर्व जीत: चुनाव परिणामों में उपाध्यक्ष पद के लिए उन्हें तीस हजार से ज्यादा वोट मिले—जो पूरे पैनल में सबसे बड़ा आंकड़ा था।
बौद्ध अध्ययन और इतिहास का सुंदर इत्तिफाक
दीपांशु ने शहीद भगत सिंह कॉलेज से राजनीति विज्ञान पढ़ने के बाद वर्तमान में बौद्ध अध्ययन विभाग में एमए की पढ़ाई चुन रखी है। संयोग देखिए कि इसी विभाग के विनय पिटक में 'चमक्खन्धक' अध्याय में जूतों और भिक्षुओं के नियमों का उल्लेख है।
ग्रंथों में दर्ज है कि कैसे प्राचीन काल में सोण कोलिविस नाम के भिक्षु के पैरों से खून बहने लगा था, लेकिन उसने अकेले राहत लेने से इनकार कर दिया था—जब तक कि नियम सबके लिए न बने। दीपांशु ने भी दिल्ली की तपती सड़कों पर नंगे पांव चलकर डेढ़ लाख छात्रों के अधिकारों और हॉस्टल की मांग को अपनी तपस्या बना लिया।
सिस्टम के खोखले दावे और हकीकत
दिल्ली यूनिवर्सिटी के 91 कॉलेजों में से 71 में आज भी हॉस्टल नहीं हैं। ढाई लाख नियमित छात्रों के मुकाबले हॉस्टल की कुल सीटें मात्र सात हजार के आसपास हैं। नतीजतन, हर 20 में से 19 छात्र बाहर निजी कमरों या पीजी में रहने को मजबूर हैं।
सत्य निकेतन की यह घटना कोई पहली नहीं थी; अप्रैल 2022 में भी उसी इलाके में एक मकान गिरा था जिसमें दो मजदूरों की जान गई थी। तब कोई बड़ा आंदोलन नहीं उठा, लेकिन इस बार छात्रों की जान जाने के बाद एक छात्र नेता ने इसे पूरे सिस्टम के सामने ला खड़ा किया।
संघर्ष की पृष्ठभूमि और माता-पिता का सपना
पीरागढ़ी के एक साधारण परिवार से आने वाले दीपांशु के पिता डीटीसी बस में ठेके पर कंडक्टर हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। हर सामान्य माता-पिता की तरह उनका भी सपना था कि बेटा पढ़ाई लिखकर कोई बड़ा अफसर बने ताकि सुरक्षित भविष्य पा सके। लेकिन बेटे ने सुरक्षित रास्ता चुनने के बजाय उन तमाम बच्चों की सुरक्षा और हक की लड़ाई को अपना मकसद चुना।
यह जीत सिर्फ एक राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि जब नीयत साफ हो और दर्द साझा हो, तो बिना पैसों और गाड़ियों के काफिले के भी बदलाव की इबारत लिखी जा सकती है।
आपके परिवार में शिक्षा की अलख जगाने वाला और शहर से बाहर पढ़ने जाने वाला पहला शख्स कौन था, और उसका सफर कैसा रहा?
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