लोक-सेवा या लूट का उत्सव—व्यवस्था के आईने में एक प्रशासनिक विडंबना।

   


  पटना ADM रविन्द्र कुमार दिवाकर और  इनकी पत्नी दानापुर की अवर निबंधक कुमारी स्वीटी के यहाँ छापे। 

बिहार प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी और उनकी पत्नी के आवास पर हुई निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Investigation Bureau) की कार्रवाई ने एक बार फिर व्यवस्था की चूलों को झकझोर कर रख दिया है। पटना के आपूर्ति अपर समाहर्ता (ADM) रविन्द्र कुमार दिवाकर और दानापुर की अवर निबंधक कुमारी स्वीटी के ठिकानों पर जब छापे पड़े, तो बरामद संपत्ति के आंकड़े ने आम जनमानस को अवाक कर दिया। डेढ़ करोड़ से अधिक की नगद राशि, भारी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण और सबसे दिलचस्प पहलू—48 कीमती घड़ियाँ! यह दृश्य उस गहरी सड़न को उजागर करता है जहाँ लोक-सेवक, जनसेवक न रहकर व्यवस्था के शोषक बन बैठते हैं।

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक महीने में तीस दिन होते हैं, यदि कोई व्यक्ति हर रोज एक नई घड़ी भी बदले, तो भी महीने भर में तीस घड़ियाँ पर्याप्त होती हैं, फिर अड़तालीस घड़ियों का यह जखीरा किस मानसिक विलासिता का परिचायक है? यह संचय की वह प्रवृत्ति है जो नैतिक पतन की पराकाष्ठा को छूती है। दानापुर निबंधन कार्यालय में स्टाम्प घोटालों और अवैध वसूली के जो किस्से कभी आम नागरिकों के लिए संघर्ष का विषय हुआ करते थे, वे आज इन छापों के बाद सच साबित हो रहे हैं। जब आम आदमी अपने रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों के लिए धक्के खाता है, तब कुछ लोग सरकारी कुर्सियों की आड़ में तिजोरियाँ भरने में व्यस्त होते हैं।

सवाल यह उठता है कि आखिर इन भ्रष्ट मानसिकता वाले अधिकारियों को जनता की गाढ़ी कमाई लूटने का अधिकार किसने दिया? क्या यह मात्र व्यक्तिगत लोभ है, या इसके तार उस व्यापक संरक्षण तंत्र से जुड़े हैं जहाँ ऊपर तक हिस्सेदारी पहुँचती है? जब तक प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग सेवा भाव को त्यागकर लूट को ही अपना कर्तव्य मान लेंगे, तब तक लोकतंत्र की नींव खोखली होती रहेगी। यह घटना केवल एक छापे की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक गंभीर प्रहार है जिसे सुधारने के लिए कड़े प्रशासनिक और नैतिक कदमों की सख्त जरूरत है।


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