हिसुआ की हिंसक राजनीति और अति-पिछड़ों का राजनीतिक छलावा: कब जागेगा चंद्रवंशी समाज?
बिहार के नवादा (हिसुआ) में 22 वर्षीय प्रणय कुमार भारती उर्फ पीयूष की दिनदहाड़े निर्मम हत्या केवल एक परिवार का व्यक्तिगत शोक नहीं, बल्कि प्रदेश की जर्जर कानून-व्यवस्था और गहराती सामाजिक विद्रूपता का नग्न प्रदर्शन है। आरजेडी के पूर्व एमएलसी रामबली चंद्रवंशी का यह बयान कि "बड़े-बड़े बाहुबली बिल में घुस गए, ये कौन बड़ी चीज है" और एनकाउंटर की मांग निश्चित रूप से जनता के आक्रोश और पीड़ा का स्वर बनती है। जब अपराधी बेखौफ होकर गलियों में गोलियां बरसाएं और बाद में खुद को बचाने के लिए काल्पनिक कहानियां गढ़ें, तो न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किंतु इस पूरे घटनाक्रम में सबसे कड़वा और विचारणीय पहलू वह राजनीतिक दोगलापन है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जब-जब बहुजन अथवा अति-पिछड़ा समाज (जैसे चंद्रवंशी) किसी जुल्म का शिकार होता है, तब-तब उनकी सुध लेने और सड़कों पर उतरने के लिए केवल बहुजन समाज के ही नेता (कौशल यादव, राजबल्लभ यादव, विधायक अनिल महतो) सामने आते हैं। इसके विपरीत, जिन स्वर्ण नेताओं और तथाकथित 'हाई-प्रोफाइल' जनप्रतिनिधियों—चाहे वे सांसद विवेक ठाकुर हों या अन्य स्वर्ण नेता—को अति-पिछड़ा समाज अपना एकतरफा वोट सौंपता आया है, वे संकट की इस घड़ी में पूरी तरह गायब और मौन नजर आते हैं।
यह स्थिति चंद्रवंशी समाज और व्यापक अति-पिछड़ा वर्ग के लिए एक गंभीर आत्मचिंतन का विषय है। एनडीए और स्वर्ण राजनीति का केवल 'वोट बैंक' बनकर रह जाने वाला यह समाज आखिर कब अपनी वास्तविक राजनीतिक समझ विकसित करेगा? सदियों से सत्ता का मलाईदार हिस्सा खाने वाले वर्ग के प्रति निष्ठा जताने के बजाय, अपने हक, अधिकार और सुरक्षा के लिए उन ताकतों का साथ देना ही समय की मांग है जो विपत्ति के समय कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती हैं।
पत्रकार वेद प्रकाश का यह कथन एक कठोर किंतु अनिवार्य चेतावनी है कि अपने वास्तविक शोषकों और राजनीतिक विरोधियों को पहचानना सीखें। अपने वोट की ताकत को पहचानकर बहुजन लामबंदी का हिस्सा बनना ही अति-पिछड़ा समाज के स्वाभिमान और सुरक्षा की एकमात्र गारंटी बन सकता है, वरना 'एनकाउंटर' की मांगें भाषणों तक ही सीमित रहेंगी और न्याय की आस में निर्दोषों का खून यूँ ही बहता रहेगा।

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