लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार और खाकी की मनमानी!
राजधानी दिल्ली के साकेत थाने से सामने आई यह घटना न सिर्फ लोकतंत्र के मूल्यों को शर्मसार करती है, बल्कि प्रेस की आजादी और महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां भी उड़ाती है। यदि पत्रकार सवाल पूछने जैसे अपने मूल संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने पर हिरासत और बर्बरता का शिकार बनते हैं, तो यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हनन: एक पत्रकार का काम सत्ता से तीखे और जरूरी सवाल पूछना है। यदि सवाल पूछने के बदले पुलिस हिरासत और शारीरिक प्रताड़ना मिले, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरा आघात है।
महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल: देश की राजधानी में, जहां महिला सुरक्षा को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं महिला पत्रकारों के साथ थाने के भीतर कथित तौर पर अभद्रता और मारपीट होना पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की सख्त जरूरत: हालांकि पुलिस प्रशासन इन आरोपों को खारिज कर रहा है, लेकिन इस तरह की घटनाओं से जनता का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास डगमगाता है। इस मामले की बिना किसी दबाव के निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
यह घटना खाकी की कार्यशैली पर एक गहरा दाग है। यदि पत्रकारों की सुरक्षा और उनके अधिकार सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक की सुरक्षा की कल्पना करना भी बेमानी हो जाता है। लोकतंत्र में जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है ताकि ऐसी मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके।

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