संवाद का सार: असहमति के साथ सह-अस्तित्व ।
किसी भी स्वस्थ और विकसित सभ्यता की नींव एकरूपता (सबका एक ही तरह सोचना या दिखना) पर नहीं, बल्कि असहमति के साथ सह-अस्तित्व की भावना पर टिकी होती है। वैचारिक विभिन्नताएँ किसी भी समाज की जीवंतता का प्रतीक होती हैं।
किंतु, विडंबना यह है कि हम अक्सर अपनी बात को ही एकमात्र विचार मान लेते हैं और सामने वाले के अलग मत या असहमति को अपनी अवमानना या अनादर समझ बैठते हैं। यही सोच रिश्तों में दूरियों, ईर्ष्या और द्वेष की नींव रखती है, क्योंकि जब हम दूसरे की बात सुनने की क्षमता खो देते हैं, तो संवाद का पुल टूटने लगता है।
वास्तविक संवाद का अर्थ केवल अपनी बात रखना या बोलना नहीं है, बल्कि सामने वाले के दृष्टिकोण को समझना भी है। जब तक हम असहमति का सम्मान करना और धैर्य से सुनना नहीं सीखेंगे, तब तक न तो सच्चे संवाद की स्थापना हो सकती है और न ही एक प्रबुद्ध समाज का निर्माण।

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