सुशासन का दावों में तैरता बिहार: राहत के नाम पर रील और मौत का तांडव।

    


 

बिहार में कुदरत का कहर और सरकार की आपराधिक बेपरवाही मिलकर विनाश का नया इतिहास लिख रही है। राज्य के ग्रामीण इलाकों को तो छोड़ ही दीजिए, राजधानी पटना खुद 'जल समाधि' की ओर बढ़ रही है। लोग इस डर से छटपटा रहे हैं कि जिंदा कैसे बचें। राहत और मदद की बात तो दूर, लोग पानी के खौफ से अपने ही घरों को छोड़कर जान बचाने के लिए भागने पर मजबूर हैं। लेकिन कुप्रबंधन का आलम यह है कि जिन ऊंचे स्थानों पर लोग शरण ले रहे हैं, वहां भी सांप, बिच्छू और जंगली सुअरों का आतंक उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।

दानापुर और मनेर के दियारा क्षेत्रों की स्थिति खौफनाक हो चुकी है, जहां जहरीले जीवों और खूंखार सुअरों के हमले से दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं। दानापुर  के अनुमंडल अस्पताल की लाचारी का यह हाल है कि सुअर या सांप के काटने पर वहां सुई तक मयस्सर नहीं है; तड़पते मरीजों को पटना रेफर कर दिया जाता है। मनेर में पीडीएस की दुकान से सरकारी राशन जुटाने की जद्दोजहद में एक व्यक्ति का पैर फिसला और वह उफनते पानी में समा गया—उसकी तलाश तक का कोई ठोस इंतजाम नहीं है। नौबतपुर, फुलवारीशरीफ, फतुहा, संपतचक और पुनपुन में बाढ़ ने जिंदगी को पूरी तरह तबाह कर दिया है।

तमाशा यह है कि पर्यटकों को लुभाने के लिए तो करोड़ों का 'लक्ष्मण झूला' तान दिया जाता है, लेकिन उसी के बगल में जलमग्न होकर सिसकती हजारों की आबादी के लिए सरकार के पास फूटी कौड़ी नहीं है। जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता इतनी गिर चुकी है कि बाढ़ पीड़ितों का दर्द बांटने के बजाय वे उफनती विभीषिका में 'रील' बनाने और फोटो-शूट कराने पहुंच रहे हैं। जनता के राशन और राहत सामग्री के लिए कोई हाथ आगे नहीं बढ़ रहा। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि अधिकारियों में जमीनी इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं है और जनता का आक्रोश फूट पड़ा है। 

जनता सवाल पूछ रही है कि जब बाढ़ की भयावहता दरवाजे पर खड़ी है, तो आपदा प्रबंधन का बजट कहां चला गया? क्या आपदा राहत के पैसे को दूसरे मदों में बांटकर कागजी खानापूर्ति कर ली गई? जनता पानी में डूब रही है, जहरीले जीवों का शिकार बन रही है, और प्रशासनिक तंत्र असहाय बनकर सिर्फ अपना मुंह ताक रहा है। यह प्राकृतिक आपदा कम, प्रशासनिक और राजनीतिक संवेदनहीनता का बनाया हुआ महा-मानव निर्मित संकट ज्यादा है।

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