सड़क सुरक्षा और यातायात दुर्घटनाएं: केवल अदालती आदेश काफी नहीं ।
दुनिया के वाहनों का मात्र 1% हिस्सा होने के बावजूद, भारत में वैश्विक सड़क यातायात मौतों का लगभग 11% हिस्सा होता है, जिसका मुख्य कारण गाड़ी चलाते समय सीट बेल्ट और हेलमेट का उपयोग न करना है।
सड़क सुरक्षा और यातायात दुर्घटनाओं का मुद्दा आज के समय में देश और विशेषकर बिहार जैसे राज्यों के लिए एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि न्यायालयों के कड़े आदेश, समय-समय पर लगने वाले भारी जुर्माने और पुलिस की सख्ती का अपना एक महत्व है, लेकिन केवल अदालती आदेश या प्रशासनिक निर्देश सड़क हादसों को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए जमीनी स्तर पर व्यापक सुधार, मजबूत बुनियादी ढांचे और जन-जागरूकता की आवश्यकता है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सड़क हादसों की स्थिति बेहद भयावह है:
देश में कुल सड़क हादसों की संख्या पाँच लाख से अधिक है, जिनमें सालाना 1.83 लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं। औसतन हर घंटे दर्जनों हादसे होते हैं और हर 3 से 4 मिनट में एक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है।
सड़क हादसों के मामलों में शीर्ष राज्यों में तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सबसे आगे हैं। (उदाहरण के तौर पर, नवीनतम आंकड़ों के अनुसार अकेले तमिलनाडु में लगभग 39,000 से अधिक और मध्य प्रदेश में 34,000 से अधिक दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं।
कुल सड़क मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 45-46%) दोपहिया वाहन चालकों का होता है, इसके बाद बड़ा हिस्सा पैदल यात्रियों का है।
बिहार में प्रति 100 सड़क दुर्घटनाओं पर मौतों की दर देश के सबसे उच्च और डरावने आंकड़ों में से एक है ।
एनआईटी पटना और अन्य सड़क सुरक्षा विशषज्ञों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिहार में सड़क हादसों में पैदल यात्रियों की मौत का राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना होना एक बहुत बड़ा संकट है। कुल मौतों में पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों की बड़ी हिस्सेदारी यह बताती है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षा उपायों (जैसे फुटपाथ, जेब्रा क्रॉसिंग) की भारी कमी है।
दुर्घटना के बाद की गई जांच से अक्सर यह सामने आया है कि पीड़ित वाहन से बाहर छिटक जाते हैं या वाहन के अंदरूनी हिस्सों से टकराकर गंभीर चोट का शिकार हो जाते हैं।
सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, दोपहिया वाहन चालकों की हिस्सेदारी सड़क मौतों में 46.2% और पैदल चलने वालों की 20.6% है।
मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने सड़क मौतों को रोकने के लिए कई तंत्रों को स्थापित किया, लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय आंकड़ों में अपेक्षित सुधार नहीं देखा गया है।
भारत में सड़क सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए केवल अदालती निर्देशों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
निर्माताओं को ऐसे वाहनों का निर्माण करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए जिनमें छेड़छाड़ न किए जा सकने वाले (टैम्पर-प्रूफ) सीट बेल्ट रिमाइंडर हों और खरीद के बाद उनमें बदलाव करने पर रोक लगे।
चूंकि तेज गति (स्पीडिंग) मौतों से जुड़ा एक प्रमुख उल्लंघन पाया गया है, इसलिए वाहनों को अत्यधिक गति तक पहुंचने से रोकने वाली राष्ट्रीय रणनीति से अधिक लाभ मिल सकता है।
केंद्र और राज्य सरकारों को व्यवस्थित रूप से 'सेफ सिस्टम' दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसके तहत सड़कों का डिजाइन इस प्रकार तैयार किया जाए कि यह मानकर चला जाए कि हर कोई सड़क पर पूरी तरह सही व्यवहार नहीं करेगा।
दुर्घटना संभावित (एक्सीडेंट-प्रोन) स्थानों की पहचान कर उनमें सुधार करना, मानव त्रुटि की भरपाई करने वाला भौतिक वातावरण तैयार करना और आघात देखभाल (ट्रॉमा केयर) तक समय पर पहुंच में सुधार करना आवश्यक है।
सड़क पर होने वाली मौतों को स्थायी तरीके से कम करने के लिए सरकारों को व्यक्तिगत निर्णयों की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर आंके बिना विभिन्न दृष्टिकोणों का एक साथ उपयोग करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा याचिका को केंद्र सरकार के पास भेजना इस बात की मौन स्वीकृति है कि सड़क सुरक्षा अब केवल अदालती आदेशों के दायरे से आगे निकल चुकी है।
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