आचार संहिता का चाबुक और नेताजी का 'फ्रीज' हुआ शिलान्यास। - प्रो प्रसिद्ध कुमार।
रीबन अपनी तनातनी भूल चुका था, कैंची की धार भी थोड़ी ठंडी पड़ गई थी और पर्दे के पीछे का उत्साह बस औपचारिकता बनकर रह गया था। मौका था राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद का, जहाँ पार्षद निधि से बने नवनिर्मित कमरे के उद्घाटन और कॉलेज परिसर में पथ निर्माण के शिलान्यास का भव्य तामझाम सजा था। तारीख थी बाईस सितंबर, समय दोपहर का एक बजे। नेताजी सज-धज कर, जनता की नज़रों में छा जाने को बिल्कुल तैयार होकर घर से निकल भी चुके थे कि ठीक ग्यारह बजे चुनाव आयोग ने आचार संहिता का ऐसा ब्रह्मपुत्र बाण चलाया कि नेताजी पलक झपकते ही 'वर्तमान' से सीधे 'निवर्तमान' की श्रेणी में आ गिरे।
खैर, सौजन्य कहाँ छूटने वाला था! नेताजी इत्मीनान से दो बजे कॉलेज पहुँचे। कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद नवल यादव ने गुलदस्ते और अंगवस्त्र से उनका भवदीय स्वागत किया। उप-प्राचार्य कुमारी संगीता, वित्तरहित शिक्षा के बिहार के दिग्गज नेता प्रो. राम बिनेश्वर बाबू, प्रो. राय श्रीपाल सिंह और शिक्षक प्रतिनिधि प्रो. बीडी यादव ने उनके यशोगान में कोई कसर नहीं छोड़ी। नए-नवेले प्रोफेसरों की दिल की बात सुनना शायद इस महफिल की प्राथमिकता में नहीं था; वे महज़ दर्शक मुद्रा में खड़े रहे और फोटो शूट करवाकर ही संतोष पा लिया। कुछ से परिचय हुआ, और बाकी ऐसे थे जिन्हें शायद परिचय की कोई मोहताजियत ही नहीं थी।
नवल यादव ने अपने संबोधन में अपनी राजनीतिक निष्ठा और संघर्ष के पन्ने पलटे। उन्होंने बताया कि वे वित्तरहित शिक्षकों के अनुदान के लिए सड़क से लेकर सदन तक लड़े और इसके वास्ते दल बदलने में भी गुरेज नहीं किया—दो बार राजद तो तीन बार भाजपा! अब अपनी छठी पारी के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री से पटना में वित्तरहित शिक्षकों के अनुदान के बदले वेतनमान के पक्ष में मुँह खुलवा ही लिया है। इसे वे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए दावा करते नजर आए कि पिछले तैंतालिस वर्षों में ऐसा कारनामा किसी ने नहीं किया था।
बिहार के नौकरशाही तंत्र की बानगी भी उन्होंने खुद बया की। नवल यादव की जुबानी ही सुनिए—मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तीन-तीन बार बिहार के मुख्य सचिव को वित्तरहित समिति की बैठक करने को कहा, लेकिन मजाल है कि परिंदा भी पर मार ले। आखिरकार तंग आकर सीएम को कहना ही पड़ा कि क्या कोई सीएम से ऊपर वाला आकर बोलेगा तब बैठक होगी? तब जाकर फाइल हिली, बैठक हुई और अंततः घोषणा का प्रसाद मिला।
खास बात यह रही कि इस पूरे आयोजन में नवल यादव भाजपा के किसी पारंपरिक एजेंडे—मंदिर निर्माण, हिंदू राष्ट्र या गाय-गोबर—पर बोलते नजर नहीं आए, न ही उनके तेवर में विरोधियों की जमानत ज़ब्त करा देने वाली वह पुरानी अकड़ दिखी। उनकी बॉडी लैंग्वेज कुछ और ही कहानी कह रही थी, जिसका असली परिणाम तो चुनाव के बक्से ही खोलेंगे। फिलहाल तो अनिसाबाद के इस सियासी आसमान पर साफ धूप नहीं, बल्कि आचार संहिता की गहरी घटा छाई हुई है।
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