बुजुर्गों की सुध: सामाजिक संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल।
किसी भी सभ्य समाज और देश की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के प्रति कितना संवेदनशील है। यदि जीवन के ढलते पड़ाव में वरिष्ठ नागरिकों को कठिनाइयों और उपेक्षा का सामना करना पड़े, तो यह न केवल कल्याणकारी योजनाओं की विफलता है, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश के सभी राज्यों को वृद्धाश्रमों की स्थिति और बुजुर्गों को मिलने वाली सुविधाओं पर ताजा रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश देना इसी गंभीर स्थिति को रेखांकित करता है।
भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को सदा से सम्मानजनक स्थान दिया जाता रहा है। आज भी कई परिवारों में संतानें अपने माता-पिता के स्वास्थ्य और खुशी के लिए हर संभव प्रयास करती हैं। लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा और दुखी करने वाला पहलू भी है। भौतिकवादी दौर में कई लोग अपने जन्मदाता माता-पिता को 'बोझ' मानने लगे हैं। अपनी निजी सुविधा और स्वच्छंद जीवनशैली के लिए बुजुर्गों को अकेला छोड़ देना या वृद्धाश्रम भेज देना एक आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिन माता-पिता ने अपने सुखों का त्याग कर उन्हें इस काबिल बनाया, वे ही आज उनकी उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।
वृद्धाश्रमों में पहुँचने के बाद भी बुजुर्गों की मुश्किलें कम नहीं होतीं। वहाँ भी उचित देखभाल, स्वास्थ्य सुविधाओं और आत्मीयता का अभाव प्रायः देखने को मिलता है। यद्यपि कानूनन संतानों पर माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी तय की गई है, परंतु सामाजिक मर्यादा और संकोच के कारण बहुत कम बुजुर्ग अपने अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। वहीं दूसरी ओर, सरकारी वृद्धावस्था पेंशन व अन्य कल्याणकारी योजनाएँ भी ज़मीनी स्तर पर उतनी प्रभावी साबित नहीं हो पा रही हैं जितनी कि कागज़ों पर दिखती हैं।
बुजुर्गों की सुरक्षा और गरिमा केवल कानूनी या सरकारी योजनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और मानवीय ज़िम्मेदारी है। जब तक समाज और परिवार अपने बुजुर्गों के प्रति कर्तव्यनिष्ठा और आत्मीयता का भाव पुनः जागृत नहीं करेंगे, तब तक एक समृद्ध और कल्याणकारी समाज का सपना अधूरा ही रहेगा।
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