श्रीमद्भगवद्गीता: कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का अमृत !

    


दुनिया के 80 से अधिक देशों में गीता को पढ़ा, पढ़ाया और इस पर शोध किया जाता है। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर विश्व के सबसे महान ज्ञानकोश 'श्रीमद्भगवद्गीता' के दर्शन को समझना मानव जीवन को सही दिशा देने जैसा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर गीता की प्रमुख उक्तियों का अर्थ

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल की इच्छा मत करो और न ही कर्म न करने (अकर्म) में तुम्हारी आसक्ति होनी चाहिए।  

महत्व: यह सूक्त व्यक्ति को निष्काम कर्म सिखाता है। परिणाम की चिंता छोड़कर केवल अपनी पूरी निष्ठा के साथ कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं की रचना करता हूँ (अर्थात् अवतार लेता हूँ)।  

महत्व: यह श्लोक समाज में न्याय और सत्य की पुनः स्थापना के अटूट विश्वास को दर्शाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी हो, अंततः जीत सत्य की ही होती है।

भगवद्गीता किसी एक देश की सीमा में बंधकर नहीं रही है। दुनिया के 80 से अधिक देशों में गीता को पढ़ा, पढ़ाया और इस पर शोध किया जाता है। यह दुनिया की 75 से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों से लेकर अल्बर्ट आइंस्टीन, जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, राल्फ वाल्डो इमर्सन और महात्मा गांधी जैसे वैश्विक विचारकों ने गीता से मार्गदर्शन प्राप्त किया है।  

मुगल काल में काजी और ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश शासन के दौरान 1840 के दशक में भारतीय अदालतों में हिंदुओं को 'गीता' और मुसलमानों को 'कुरान' पर हाथ रखकर कसम खिलवाने की व्यवस्था शुरू की गई थी। अंग्रेजों का मानना था कि भारतीय अपनी धार्मिक पुस्तकों से डरकर अदालत में सच बोलेंगे।

भारत की स्वतंत्रता के बाद भारतीय शपथ अधिनियम, 1969 (Oath Act, 1969) लागू किया गया, जिसके तहत किसी भी धार्मिक ग्रंथ (गीता, कुरान या बाइबिल) पर हाथ रखकर कसम खाने की अंग्रेजों के ज़माने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।


Comments

Popular posts from this blog

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

केवी स्कूल की छात्रा रास्ते से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब, रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों में मिले कपड़े और बस्ता! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

नेउरा-दनियावाँ रेल खंड: क्या बाबूचक-मोहम्मदपुर में बनेगा 'शहीद जयगोविंद सिंह यादव रेलवे स्टेशन'?