फिल्म 'तरेंगन' (Tarengan) का मुख्य कथा सार (Synopsis)

 



 यह बिहार के मुशहर  परिवार की एक मार्मिक कहानी है।एक पिता के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और बेटे की कृतघ्नता की भावुक कहानी पर आधारित है:

1. संघर्ष और समर्पण (1993 - 2004)

कहानी बिहार की पृष्ठभूमि में 1993 से 2004 के दौर को दर्शाती है। मुख्य पात्र जुगल मुसहर समाज से आने वाला एक मूक-बधिर (बोल और सुन न पाने वाला) रिक्शा चालक है। जुगल का जीवन अत्यंत अभावों में बीतता है, जहाँ वह अमीरों के बच्चों को रिक्शा से स्कूल छोड़ने का काम करता है। तमाम मुश्किलों और सामाजिक विषमताओं के बावजूद, जुगल का एक ही सपना है—अपने प्यारे बेटे 'तरेंगन' को पढ़ा-लिखाकर एक बड़ा और आदरणीय इंसान बनाना। वह अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी और खुशियाँ न्योछावर कर देता है।

2. सफलता और दूरी

पिता के कड़े परिश्रम और त्याग के बल पर तरेंगन अपनी पढ़ाई पूरी करता है और आगे चलकर एक ऊँचे पद और अच्छे सामाजिक ओहदे पर पहुँच जाता है।

3. घमंड और रिश्तों का पतन

सफलता और ओहदा मिलते ही तरेंगन के व्यवहार में बदलाव आ जाता है। वह अपने गरीब और मूक-बधिर पिता के त्याग और संघर्षों को भूलकर घमंडी तथा लापरवाह हो जाता है। जिस पिता ने उसे उँगली पकड़कर चलना सिखाया और इस मुकाम तक पहुँचाया, तरेंगन उसी पिता के प्रति संवेदनहीन हो जाता है।

यह कहानी पिता-पुत्र के इसी मार्मिक और दर्दनाक मोड़ को उकेरती है, जो दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता और सफलता की दौड़ में लोग अपने संस्कार और अपनों के बलिदान को कैसे भूल जाते हैं।

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