'डबल इंजन' सरकार: सहकारी संघवाद के लिए एक चुनौती?
हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में 'डबल इंजन' सरकार का नारा काफी प्रचलित हुआ है। पहली नज़र में यह विकास के लिए दो सरकारों के आपसी तालमेल जैसा सुखद संदेश देता है, लेकिन संवैधानिक और संघीय दृष्टिकोण से इसके गहरे और चिंताजनक निहितार्थ हैं।
राजनीतिक गठबंधन बनाम संवैधानिक वादे
'डबल इंजन' का तर्क यह है कि यदि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होगी, तो विकास की गति तेज़ होगी। विडंबना यह है कि यह नारा परोक्ष रूप से यह संकेत देता है कि यदि राज्य में विपक्षी दल की सरकार है, तो उसे विकास निधि या सहयोग के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। भारत का संविधान एक ऐसे संघ की कल्पना करता है जहाँ केंद्र और राज्य एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि केंद्र की 'इच्छा' पर निर्भर। सार्वजनिक धन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि देश के नागरिकों का है, चाहे उन्होंने किसी भी दल को वोट दिया हो।
संघीय टकराव के मुख्य बिंदु
वर्तमान संघीय ढांचे में बढ़ रहे तनाव के तीन प्रमुख कारण हैं:
राजकोषीय अन्याय (Fiscal Issues): दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) ने चिंता जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता को ही आधार बनाकर उन्हें वित्त आयोग के फंड आवंटन में दंडित किया जा रहा है। उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges) के माध्यम से केंद्र अपनी आय बढ़ा रहा है, जिसे राज्यों के साथ साझा नहीं करना पड़ता।
राज्यपालों की भूमिका: कई राज्यों में देखा गया है कि राज्यपाल निर्वाचित विधानसभा द्वारा पारित बिलों को लंबे समय तक रोककर रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की है कि राज्यपाल का पद विधायी प्रक्रिया को बाधित करने के लिए नहीं है।
दिल्ली का उदाहरण: दिल्ली में चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल (LG) के बीच का विवाद यह दर्शाता है कि जब राजनीतिक विचारधाराएं नहीं मिलतीं, तो प्रशासनिक मशीनरी किस तरह ठप हो सकती है।
संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता
संघवाद की आत्मा को बचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव हैं:
वित्त आयोग: आयोग की सिफारिशों को अधिक बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए ताकि फंड का वितरण राजनीतिक सौदेबाजी के बजाय नियमों पर आधारित हो।
राज्यपालों के लिए समय सीमा: राज्यपालों के लिए बिलों पर निर्णय लेने हेतु एक निश्चित समय सीमा (जैसे तीन महीने) तय की जानी चाहिए।
अंतर-राज्यीय परिषद: अनुच्छेद 263 के तहत बनी परिषदों को केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित न रखकर, उन्हें सहकारी संघवाद के सक्रिय मंच के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

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