रीतिकरण से परे: भारतीय उच्च शिक्षा में तार्किकता और अकादमिक स्वतंत्रता की चुनौती।
आधुनिक शैक्षणिक संस्थान ज्ञान की खोज, प्रयोग और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के मंदिर होते हैं, न कि अंधभक्ति या कर्मकांड के केंद्र. वर्तमान समय में भारतीय शिक्षा जगत में तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जगह धार्मिक अनुष्ठानों और सामंती परंपराओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. आईआईटी (IIT) जैसे प्रमुख संस्थानों में दीक्षांत समारोहों के दौरान प्राचीन परंपराओं और प्रतीकों का समावेश अकादमिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. विश्वविद्यालयों में बढ़ती सरकारी दखलअंदाजी, वैचारिक संकीर्णता और आलोचनात्मक आवाज़ों के दमन से संस्थानों की स्वायत्तता खतरे में पड़ रही है. 'फ्री टू थिंक 2026' की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अकादमिक स्वतंत्रता को 'गंभीर रूप से प्रतिबंधित' श्रेणी में रखा गया है. रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों के अनुरूप हमें विश्वविद्यालयों को अंधविश्वास और राजनीतिक चापलूसी का अखाड़ा बनने से बचाना होगा, तथा उन्हें स्वतंत्र विचार और लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र बनाना चाहिए.
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