भारत में बढ़ता घरेलू कर्ज: उपभोग, चुनौतियाँ और macroeconomic प्रभाव.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आँकड़ों के अनुसार, सितंबर 2025 तक भारत का घरेलू कर्ज (household debt) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 45.5% हो गया है, जो जून 2023 में 42% और 2021 में 39.2% था. इस तेज वृद्धि ने नीति निर्माताओं और विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है.
बचत में गिरावट: कोविड-19 महामारी के बाद से घरेलू शुद्ध वित्तीय बचत में गिरावट आई है और वित्त वर्ष 2024-25 की पहली छमाही में यह बढ़कर GDP का 6% हो गई है.
कर्ज के कारण: असुरक्षित व्यक्तिगत ऋण और डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्मों के कारण कर्ज लेना आसान हो गया है, जिससे उपभोग को अस्थायी बढ़ावा तो मिलता है लेकिन भविष्य की आय गिरवी रखनी पड़ती है.
आर्थिक प्रभाव: यदि कर्ज का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास जैसी संपत्ति-निर्माण (asset-building) गतिविधियों के लिए किया जाए तो यह चिंता का विषय नहीं है; परंतु दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना वित्तीय जोखिम पैदा करता है.
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि कर्ज तक आसान पहुँच को बेहतर आर्थिक कल्याण में कैसे बदला जाए और उत्पादक कर्ज को संकटकालीन उपभोग से कैसे अलग किया जाए.
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