संघवाद को 50 साल का नुक़सान: 42वें संविधान संशोधन की विडंबना और भारतीय संघवाद का भविष्य।
भारतीय संविधान का 42वां संशोधन, जिसे नवंबर 1976 में आपातकाल के दौरान पारित किया गया था, भारतीय इतिहास में केंद्रीयकरण का सबसे स्थायी और प्रभावी साधन बना हुआ है। 2 नवंबर 1976 को जब लोकसभा ने इस संशोधन को भारी बहुमत से पारित किया, तब देश के कई दिग्गज विपक्षी नेता जैसे मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जेल में थे और संसद का कार्यकाल बढ़ाया जा चुका था। इंदिरा गांधी ने इसे "लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप और वर्तमान व भविष्य की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाला" बताया था।
संघीय ढांचे पर गहरी चोट और विषयों का स्थानांतरण
यह संशोधन केवल प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द जोड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने भारत के संघीय ढांचे को गहरा आघात पहुँचाया। आज जिस राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET), कुलपतियों की नियुक्ति और परिसीमन (Delimitation) को लेकर केंद्र-राज्य के बीच खींचतान दिखती है, उन सबकी जड़ें 1976 के इसी संशोधन में निहित हैं।
42वें संशोधन के तहत पांच महत्वपूर्ण विषयों को राज्य सूची से निकालकर समवर्ती सूची (Concurrent List) में डाल दिया गया था:
शिक्षा
वन और वन्यजीवों व पक्षियों की सुरक्षा
बाट और माप (Weights and Measures)
न्याय प्रशासन और उच्च न्यायालयों के गठन व क्षेत्राधिकार से जुड़े प्रावधान
इनमें सबसे गंभीर प्रभाव शिक्षा क्षेत्र पर पड़ा है। जहाँ अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे परिपक्व संघों में शिक्षा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है, वहीं भारत ने एक विकेन्द्रीकृत ढांचे से अत्यधिक केंद्रीयकृत व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया है। आज स्थिति यह है कि राज्य अपने ही मेडिकल कॉलेजों में छात्रों के चयन का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपनी सीटों का एक हिस्सा राष्ट्रीय कोटे में सरेंडर करना पड़ता है।
सुधार के अधूरे प्रयास और वर्तमान चुनौतियाँ
1977 में जनता पार्टी ने संविधान को आपातकाल से पहले की स्थिति में बहाल करने के वादे के साथ सत्ता संभाली थी। 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 257A को तो हटाया (जो केंद्र को कानून व्यवस्था के लिए राज्यों में सशस्त्र बल तैनात करने की शक्ति देता था), लेकिन शिक्षा, वन या न्याय प्रशासन जैसे विषयों को राज्यों को वापस नहीं सौंपा गया।
सरकारिया आयोग ने भी राज्यों से सलाह लेकर समवर्ती सूची के विषयों की समीक्षा करने की सिफारिश की थी, लेकिन इस पर शायद ही कभी अमल हुआ। आज पचास वर्षों के बाद, 1976 का यह प्रयोग न तो उत्कृष्टता दे पाया और न ही समानता, बल्कि इसने राज्यों को बिना अधिकार के जवाबदेह जरूर बना दिया है।
प्रसिद्ध न्यायविद् नानी पालखीवाला के शब्दों में, "केंद्र राज्यों के बिना कुछ भी नहीं है, और एक मजबूत केंद्र केवल मजबूत राज्यों का ही संघ हो सकता है।" 1976 के सातवें शेड्यूल के बदलावों और आपातकाल के प्रभावों पर चर्चा तब तक जारी रहेगी, जब तक केंद्र और राज्यों के बीच सच्चे संघवाद की स्थापना नहीं हो जाती।
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