पीरो के गाँधी: स्मृतियों के आईने में समाजवाद की प्रासंगिकता और आर्थिक यथार्थ!
पटना! रिपोर्ताज लेखन एवं प्रस्तुति: प्रो. प्रसिद्ध कुमार।
पटना के ऐतिहासिक गाँधी संग्रहालय के सभागार में वैचारिक उल्लास, चिंतन और जन-सरोकारों से सराबोर एक गरिमामयी आयोजन संपन्न हुआ। अवसर था पीरो के पूर्व विधायक और जननेता राम एकवाल सिंह 'वरसी' की दसवीं पुण्यतिथि का, जिसे 'वीरेंद्र यादव न्यूज़' एवं 'सोनंचल विकास परिषद' के संयुक्त तत्वावधान में बड़े ही सौहार्दपूर्ण और वैचारिक माहौल में मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वीरेंद्र यादव ने की, जबकि संचालन और संयोजन ने इस आयोजन को एक जीवंत बौद्धिक मंच प्रदान किया।
स्मृतियों को नमन और आगत अतिथियों का स्वागत
कार्यक्रम का शुभारंभ उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों, प्रबुद्ध जनों और श्रोताओं द्वारा वरसी जी के तैल चित्र पर भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। आयोजक वीरेंद्र यादव ने सभागार में उपस्थित तमाम अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र सिंह यादव ने समाजवाद के ऐतिहासिक सफर और वरसी जी के साथ जुड़े अपने संस्मरणों को साझा करते हुए सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा:
"समाजवाद एक ऐतिहासिक ताकत और अमिट सच्चाई है, भले ही आज इसका स्वरूप या मॉडिफ़िकेशन हो गया हो। आज अमेरिका और फ्रांस में जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था है, चीन में साम्यवादी व्यवस्था है, वहीं भारत की जड़ें समाजवाद में निहित हैं। आज लोकतांत्रिक तानाशाही का दौर है, जहाँ लोगों को भ्रमित करना आसान है लेकिन समझाना कठिन है।"
सामाजिक न्याय, चुनौतियाँ और वैचारिक मंथन
विचार गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए पूर्व मंत्री रामचंद्र पूर्वे ने समाजवाद पर विस्तृत प्रकाश डाला और प्रेरक स्लोगन सुनाए। इस अवसर पर बहुचर्चित पुस्तक 'पीरो के गाँधी' का लोकार्पण किया गया, जिसके लेखक जयनंदन प्रसाद ने पुस्तक के मूल प्रसंगों और वरसी जी के संघर्षशील जीवन के पन्नों को साझा किया।
वरसी जी के सुपुत्र प्रो. शिवजी ने एक समाजवादी नेता के पारिवारिक जीवन, संघर्षों और पुत्र होने की कठिनाइयों का मार्मिक संस्मरण सुनाकर श्रोताओं को समाजवाद के यथार्थिक धरातल से परिचित कराया। बिक्रम कॉलेज के हिंदी प्राध्यापक प्रो. अजय कुमार ने साहित्यिक उदाहरणों और कवियों की पंक्तियों के माध्यम से समाजवाद के वैचारिक आयामों को रेखांकित किया। प्रो. डॉ. लालदेव यादव ने भी अपने ओजस्वी विचारों से समाजवाद की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
आर्थिक विषमता और सामाजिक यथार्थ के आंकड़े
प्रो. प्रसिद्ध यादव ने देश की वर्तमान आर्थिक विषमता पर अकादमिक आंकड़ों के साथ गहरी चिंता व्यक्त की और बताया कि किस प्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में विषमता गहरी होती जा रही है:
44% भूमि: देश की कुल कृषि/अन्य भूमि मात्र 10% आबादी के पास केंद्रित है।
90% संपत्ति: देश की कुल संपदा का 90% हिस्सा मात्र 10% संपन्न लोगों के कब्जे में है।
प्रो. यादव ने रेखांकित किया कि इतनी विराट आर्थिक खाई के बीच समाजवाद की मूल आत्मा को जीवित रखना एक बड़ी चुनौती है। निजीकरण की आड़ में वनों और पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) की जमीनों को छीनकर उद्योगपतियों को सौंपा जा रहा है तथा उनके अरबों-खरबों रुपयों के कर्ज माफ किए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार और उसके संरक्षण से पनप रही यह पूँजीवादी संस्कृति सामाजिक न्याय के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है।
समारोह का समापन
कार्यक्रम के अंत में वरसी जी की पुत्रवधु ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित प्रबुद्धजनों के प्रति आभार व्यक्त किया और धन्यवाद ज्ञापित किया। इस विचार गोष्ठी में भारी संख्या में महाविद्यालयों के प्राध्यापक, अधिवक्ता, पत्रकार, राजनेता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
स्थल: गाँधी संग्रहालय, पटना
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