भारतीय सिनेमा के बेजोड़ नायक: नाना पाटेकर

   


​भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा अनूठा और विद्रोही व्यक्तित्व खो दिया है, जिसने अभिनय को कभी महज़ एक कला नहीं बल्कि जीवन के साथ एक सीधा टकराव माना। 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित अपने आवास पर हृदयाघात के कारण उनका निधन हो गया। उनका पूरा जीवन और अभिनय सफर लीक से हटकर सोचने और धारा के विपरीत चलने वाले व्यक्ति का प्रमाण रहा है।  

​अभिनय का अनूठा सफर और शैली  

​समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा का सेतु: नाना पाटेकर ने अपने चार दशक से अधिक लंबे करियर में समानांतर कला-आन्दोलनों और मुख्यधारा के व्यावसायिक सिनेमा के बीच की खाई को पाटने का काम किया।  

​विशिष्ट पहचान: तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (National Award) और चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार (Filmfare Award) जीतने वाले नाना पाटेकर ने ऐसे किरदारों को चुना जो आसानी से किसी श्रेणी में नहीं बंधे।  

​प्रमुख फिल्में और यादगार भूमिकाएं: 'गमन' (1978) से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना ने 'अंकुश' (1986) में एक बेरोजगार युवा, 'परिंदा' (1989) में खतरनाक अंडरवर्ल्ड डॉन 'अन्ना सेठ', 'प्रहार' (1991) में गहराई से राष्ट्रवादी और फौजी किरदार, और 'क्रांतिवीर' (1994) में समाज के पाखंड व भ्रष्टाचार के खिलाफ तीखा प्रहार करने वाले प्रताप की भूमिका निभाकर भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ी। 'अग्नि साक्षी' (1996) और 'खामोशी: द म्यूजिकल' (1996) में भी उनकी संवेदनशीलता और अभिनय का अलग ही रूप देखने को मिला।  

​थिएटर की जड़ें: वह अपनी कला में पूरी तरह रचे-बसे थे और मराठी रंगमंच व सिनेमा से गहराई से जुड़े रहे। 'नटसम्राट' (2016) में उनका निभाया गया 'गणपत बेलवलकर' का किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में गूंजता है।  

​सिनेमा से परे सामाजिक सरोकार  

​किसान और सामाजिक हित: कैमरे के पीछे भी नाना पाटेकर ने हमेशा किसानों के अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता और संस्थागत पारदर्शिता के लिए लड़ाई लड़ी। सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों की सहायता के लिए उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की स्थापना की।  

​निडर और बेबाक: उन्होंने हमेशा राजनीतिक दलों के दबावों का विरोध किया और व्यवस्थागत विफलताओं पर खुलकर सवाल उठाए।  

​विवाद और जीवन का जटिल पहलू

अपने असाधारण योगदान के साथ-साथ उनके करियर पर उस समय एक दाग भी लगा जब भारत के 'मीटू' (MeToo) आंदोलन की शुरुआत में एक महिला कलाकार ने उन पर फिल्म के सेट पर यौन उत्पीड़न और डराने-धमकाने का आरोप लगाया। हालांकि उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया और मुंबई पुलिस ने साक्ष्यों को अपर्याप्त पाया, फिर भी इस घटना ने उनकी छवि को प्रभावित किया।  

​नाना पाटेकर एक ऐसे कलाकार थे जिन्हें उनकी तीखी और विस्फोटक शैली के साथ-साथ उनकी शांत संवेदनशीलता के लिए भी हमेशा याद किया जाएगा।  

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