पोषण का संकट: विकास के दावों के बीच सुलगती कुपोषण की एक गंभीर हकीकत।
भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और विज्ञान, तकनीक तथा बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर लगातार नए आयाम छू रहा है। लेकिन जब देश के किसी कोने से भूख और कुपोषण के कारण किसी मासूम की मौत की खबर सामने आती है, तो यह विकास के तमाम दावों और चमकती हुई तस्वीर पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर देती है।
केरल के अलप्पुझा जिले में जहाँ दो साल के एक बच्चे ने भुखमरी और कुपोषण के कारण दम तोड़ दिया। यह सिर्फ एक बच्चे की मौत नहीं है, बल्कि यह हमारी खाद्य सुरक्षा, प्रशासनिक निगरानी और सामाजिक संवेदनाओं की विफलता का जीता-जागता प्रमाण है। केरल जैसे साक्षरता और स्वास्थ्य सूचकांकों में आगे रहने वाले राज्य में यदि ऐसी घटना हो सकती है, तो देश के अन्य कम विकसित राज्यों के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
सरकार द्वारा गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, निःशुल्क खाद्यान्न वितरण के दावे किए जाते हैं, और आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों व महिलाओं को पोषित करने का लक्ष्य रखा जाता है। परंतु, जमीनी हकीकत यह है कि व्यवस्था की उदासीनता और भ्रष्टाचार के कारण यह मदद अक्सर वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँच ही नहीं पाती। बाल कल्याण समितियों या आयोगों द्वारा घटना के बाद संज्ञान लेना और औपचारिकता पूरी करना नाकाफी है; आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पारदर्शी और सख्त व्यवस्था बनाई जाए। बच्चों का स्वस्थ विकास केवल उनके परिवारों की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है।
देश में सबसे ज्यादा कुपोषण की स्थिति
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुपोषण (विशेषकर स्टंटिंग यानी बौनापन, वेस्टिंग यानी दुबलापन और कम वजन) की समस्या अभी भी कई राज्यों में विकराल रूप में बनी हुई है। देश में कुपोषण और भुखमरी के मामले मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सबसे अधिक गंभीर स्तर पर दर्ज किए जाते हैं। इनमें भी ग्रामीण क्षेत्रों और आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है, जहाँ गरीबी, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और पोषक खाद्य पदार्थों तक पहुँच का अभाव इसके मुख्य कारण हैं।
बिहार के संदर्भ में विशेष स्थिति
बिहार के परिप्रेक्ष्य में कुपोषण की यह समस्या एक 'डबल हेल्थ संकट' की तरह उभरी है, जहाँ एक तरफ बड़ी संख्या में बच्चे कम वजन और बौनेपन (Stunting) का शिकार हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण और शहरी इलाकों में पोषण की गुणवत्ता को लेकर भारी असमानता है।
आंगनबाड़ी और जमीनी व्यवस्था की चुनौतियाँ: बिहार में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण के लिए आंगनबाड़ी केंद्र मुख्य आधार हैं, लेकिन अक्सर इनमें संसाधनों की कमी, अनियमितता, और पोषाहार वितरण में लापरवाही की शिकायतें सामने आती हैं।
बजट और उपयोग का अंतर: रिपोर्ट्स के अनुसार, कई बार बच्चों के गर्म भोजन और पोषण के लिए आवंटित धन का पूरा उपयोग नहीं हो पाता या वह सही समय पर धरातल पर क्रियान्वित नहीं हो पाता है।
गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारक: राज्य में गरीबी, खाद्य सुरक्षा का अभाव और महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) जैसी समस्याएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण के चक्र को बढ़ावा दे रही हैं। हालांकि सरकार 'मिशन सक्षम आंगनबाड़ी' और पोषण अभियानों के जरिए सुधार के दावे कर रही है, पर जब तक जमीनी स्तर पर कड़े प्रशासनिक निरीक्षण और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इस संकट से पार पाना मुश्किल होगा।
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