विधि-व्यवस्था और खोखले होते सुरक्षा दावे: मनेर के खूनी संघर्ष ने खोली प्रशासनिक मुस्तैदी की पोल।

   


​राजधानी पटना से महज कुछ ही दूरी पर स्थित मनेर थाना क्षेत्र के ब्यापुर इलाके में हुई दुस्साहसिक वारदात ने एक बार फिर बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। त्योहारी सीजन और प्रशासनिक चौकसी के दावों के बीच अपराधियों द्वारा सरेआम लगभग एक दर्जन गोलियां बरसाकर पैक्स अध्यक्ष संजीत कुमार उर्फ भानु की हत्या और प्रखंड प्रमुख पति पिंटू कुमार को गंभीर रूप से घायल कर देना यह बताने के लिए काफी है कि बदमाशों के दिलों से खाकी का खौफ पूरी तरह समाप्त हो चुका है।  

​जब राज्य के मुखिया और पुलिस प्रशासन पर्व-त्योहारों के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम का दावा कर रहे हों, तब राजधानी कीहदों के भीतर इस तरह की दुस्साहसिक वारदातें पुलिसिया गश्त और खुफिया तंत्र की पोल खोलकर रख देती हैं।

​बढ़ती आपराधिक घटनाओं का काला साया

​मनेर की यह घटना कोई अकेली बानगी नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय में राजधानी पटना और इसके आसपास के इलाकों में जिस तरह से आपराधिक ग्राफ ऊपर चढ़ा है, वह चिंताजनक है:

​मनेर गोलीबारी कांड: ब्यापुर गांव में दो बाइकों पर सवार होकर आए चार अपराधियों ने जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाकर अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे न सिर्फ एक की जान गई बल्कि इलाके में दशहत और अफरा-तफरी मच गई।  

​हालिया अन्य वारदातें: राजधानी में हाल के दिनों में अपार्टमेंट्स के बेसमेंट में घुसकर जनप्रतिनिधियों और कारोबारियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग, सड़क पर राहगीरों को कुचलने जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो यह साबित करती हैं कि अब अपराधी महफूज ठिकानों पर भी वार करने से नहीं हिचकिचा रहे हैं।  

​पुलिसिया कार्रवाई और सुस्त तंत्र

​घटना के बाद पुलिस और एफएसएल (FSL) टीम द्वारा साक्ष्य जुटाना, सीसीटीवी फुटेज खंगालना और राजनीतिक रंजिश की आशंका जताना महज रस्मअदायगी प्रतीत होता है। वारदात के बाद अपराधियों का बेखौफ होकर फरार हो जाना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर अपराधियों में पुलिस का खौफ शून्य हो चुका है। वारदातें होने के बाद ताबड़तोड़ छापेमारी के दावे करना आसान होता है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी घटनाओं को पहले ही रोकने में खुफिया तंत्र नाकाम क्यों साबित हो रहा है?

​यदि राजधानी पटना के ग्रामीण और शहरी इलाकों में जनप्रतिनिधि ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पुलिस प्रशासन को सिर्फ आश्वासन देने और सुराग तलाशने की खानापूर्ति से ऊपर उठकर अपराधियों के पूरे नेक्सस को नेस्तनाबूद करना होगा। जब तक अपराधियों के सरपरस्तों और उनके अवैध शस्त्रों पर कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक कागजी दावे और खोखले आश्वासन जनता को सुरक्षा का अहसास नहीं करा सकते।

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