यूनिवर्सिटी की सार्थकता की पुनर्स्थापना: अंकों की दौड़ से मेधा के सृजन तक.
एकरूपता बनाम गुणवत्ता: वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर की मानकीकृत परीक्षाएं (जैसे NEET, JEE, UGC NET) केवल एकरूपता और बहुविकल्पीय रटने की क्षमता को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे छात्रों की वास्तविक प्रतिभा, तार्किक क्षमता और आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) की उपेक्षा हो रही है।
भर्ती और मूल्यांकन प्रणाली की विफलता: विश्वविद्यालयों में चयन और पदोन्नति का आधार अब विचारों के बाजार के बजाय केवल 'प्रतिकीर्णन और अनुसंधान स्कोर' (Publication Counts and Research Scores) बन गया है, जिससे अकादमिक गुणवत्ता गिर रही है।
पीएचडी और थीसिस की गिरती साख: पीएचडी और थीसिस मूल्यांकन अब गंभीर शोध के बजाय केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गए हैं, जहां मात्रात्मक अंकों (Metrics) को प्राथमिकता दी जाती है।
संस्थागत स्वायत्तता की आवश्यकता: यदि हमें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है और वास्तविक ज्ञान का सृजन करना है, तो हमें अंकों की गणना को छोड़कर संकाय (Faculties) के अकादमिक निर्णय और संस्थागत स्वायत्तता को बहाल करना होगा।
उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल गणना योग्य अंक या स्कोर देना नहीं, बल्कि मेधावी और स्वतंत्र विचारकों का निर्माण करना है। इसके लिए हमें अंकों के बजाय संकाय के आंतरिक विवेक और संस्थागत स्वतंत्रता पर पुनः विश्वास जताना होगा।
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