परिसीमन की राजनीति: भाजपा के पास कोई बुरा विकल्प नहीं, कांग्रेस के पास न कोई अच्छा ।
परिसीमन और पत्राचार: अक्टूबर 2026 में, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन के प्रस्तावों पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक की मांग की। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जवाब दिया कि सरकार ने इस पर पहले भी विचार-विमर्श किया है और कहा कि सरकार इस मुद्दे पर चर्चा से बच नहीं रही है, लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि सरकार विवरण छिपाकर चुपचाप कानून लाना चाहती है।
असली बहस (सीटों का पुनर्वितरण): महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा पहले ही तय हो चुका है कि आगामी परिसीमन में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। असली बहस इस बात पर है कि लोकसभा का आकार कितना बढ़ेगा और राज्यों के बीच सीटों का वितरण कैसे होगा।
भाजपा की रणनीति:
सरकार लोकसभा सीटों की संख्या को 850 तक बढ़ाकर वर्तमान आनुपातिक प्रतिनिधित्व को बनाए रख सकती है, जिससे हिंदी पट्टी के राज्यों को भारी लाभ हो सकता है।
यदि संवैधानिक संशोधन पारित नहीं होता है, तब भी मौजूदा प्रावधानों के तहत 550 सीटें हिंदी पट्टी के राज्यों को बड़ा फायदा पहुंचा सकती हैं। भाजपा के लिए यह स्थिति हर तरह से अनुकूल है, क्योंकि इससे उसकी सामाजिक इंजीनियरिंग और राजनीतिक विस्तार को बल मिलता है।
कांग्रेस की मुश्किलें:
कांग्रेस के पास दो ही कठिन विकल्प बचते हैं। पहला यह कि यदि संवैधानिक संशोधन के जरिए सीटों की संख्या बढ़ती है, तो भी राज्यों का व्यक्तिगत हिस्सा लगभग वही रहता है।
दूसरा विकल्प यह है कि यदि सीटें न बढ़ें और मौजूदा सीटों का पुनर्वितरण 2011 की जनगणना के आधार पर हो, तो केरल, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के प्रतिनिधित्व में भारी कटौती हो सकती है, जिससे कांग्रेस के लिए राजनीतिक संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
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