क्या भारत और चीन शांतिपूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में रह सकते हैं?
यह भारत और चीन के जटिल और तनावपूर्ण संबंधों की पड़ताल करता है, जिसे 'प्रबंधित सह-अस्तित्व' (managed coexistence) कहा गया है। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या दोनों देश आने वाले दशकों में शांति से रह सकते हैं। यहाँ 1962 के युद्ध और हालिया गलवान घाटी संघर्ष जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख है, जो विश्वास की कमी और सीमा विवादों को गहरा करती हैं।
1962 के युद्ध के बाद से "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा खत्म हो गया और चीन पर भरोसा कम हुआ।
सीमा पर "फेस-ऑफ" और गश्त से जुड़ी अनिश्चितता शांति को खतरे में डालती है। तनाव कम करने के लिए सेना और सीमा रक्षकों को स्पष्ट संदेश देने की आवश्यकता है।
यह चीन की सैन्य शक्ति को लेकर धारणाओं पर चर्चा है। यह भी तर्क दिया गया है कि चीन को केवल भारत के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में देखना गलत हो सकता है। चीन के इरादों को समझना जरूरी है, जो अक्सर अमेरिका के साथ अपनी प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित होते हैं।
सह-अस्तित्व की संभावना: हालांकि चुनौतियां हैं, पूर्व में राजीव गांधी और डेंग शियाओपिंग जैसी पहलें दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने के उदाहरण हैं। अगर दोनों पक्ष चाहें, तो भारत चीन के साथ और चीन भारत के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकता है।
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