राजनीति का गिरता स्तर और जनता दल (यूनाइटेड): सिद्धांतों से समझौते का लाचार अंजाम।
बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे दिलचस्प और चिंताजनक मोड़ पर है, जहाँ सत्ता के समीकरणों ने राजनीतिक दलों को वैचारिक रूप से पूरी तरह लाचार कर दिया है। हाल ही में एमएलसी चुनाव के दौरान जो दृश्य सामने आए, उन्होंने साफ कर दिया है कि आज के दौर में अनुशासन, पार्टी व्हिप और वैचारिक प्रतिबद्धता महज कागजी बातें बनकर रह गई हैं। जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू के भीतर जिस तरह से पार्टी विधायकों द्वारा खुलेआम बागी तेवर अपनाए गए और जन सुराज के पक्ष में समर्थन जुटाया गया, वह किसी भी राजनीतिक दल के आंतरिक नियंत्रण की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
अनुशासनहीनता की हदें और सहमी हुई सियासत
जब किसी दल के विधायक अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ सरेआम ताल ठोकते हैं और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आंखें मूंदकर बैठा रहता है, तो यह राजनीतिक लाचारी की पराकाष्ठा है। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि जेडीयू के उम्मीदवार इस राजनीतिक दहशत और अनिश्चितता के चलते सदमे में अस्पताल जा पहुँचे। आखिर यह कैसी राजनीति है? जब दलों के भीतर अनुशासन का डर खत्म हो जाता है, तो कार्यकर्ता और प्रत्याशी खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह अनुशासनहीनता रातों-रात पैदा नहीं हुई; यह उस लंबी प्रक्रिया का परिणाम है जहाँ दलों ने सुविधा की राजनीति के नाम पर अनुशासन को ताक पर रख दिया।
अपराधियों, धनबल और अवसरवाद का नापाक गठजोड़
बिहार की राजनीति में आज इस पतन के मुख्य कारण स्पष्ट रूप से देखे जा ਸਕते हैं:
संख्या बल की अंधी दौड़: सरकार बनाने और अपनी विधायकी की संख्या बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक समझौते करना।
अपराध और धनबल का बोलबाला: जब राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को टिकट देना शुरू करते हैं, तो दल के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और नैतिकता दम तोड़ देती है।
बेमेल गठबंधनों की संस्कृति: वैचारिक शुद्धता को ताक पर रखकर केवल सत्ता प्राप्ति के लिए बेमेल सिद्धांतों वाले दलों से हाथ मिलाना, कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ देता है।
जब राजनीति का रिमोट कंट्रोल अपराधियों और धनबल के हाथ में चला जाता है, तो निष्ठावान और जमीन से जुड़े नेताओं का दम घुटने लगता है।
शिक्षित और चिंतक वर्ग की राजनीति से दूरी
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ है कि समाज के शिक्षित, प्रबुद्ध और वैचारिक रूप से संपन्न लोग आज राजनीति से कोसों दूर हो चुके हैं। यदि कोई युवा या चिंतक राजनीति में आना भी चाहे, तो उसे या तो हाशिए पर धकेल दिया जाता है या वह इस गंदे माहौल से तौबा कर लेता है। वंशवाद (परिवारवाद), धनबल और बाहुबल की त्रैगुणी संस्कृति ने राजनीति के दरवाजे उन लोगों के लिए खोल दिए हैं जिनका सरोकार जनसेवा से कम और व्यक्तिगत स्वार्थों से ज्यादा है।
मंथन और आत्ममंथन की सख्त जरूरत
आज केवल जेडीयू ही नहीं, बल्कि देश और प्रदेश के तमाम राजनीतिक दलों को गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। यह समझने का समय आ गया है कि सत्ता ही सब कुछ नहीं है। राजनीति में शुचिता, नैतिकता और वैचारिक दृढ़ता का अपना एक शाश्वत महत्व होता है। यदि समय रहते दलों ने अपराधियों और अवसरवादियों से दूरी नहीं बनाई और आंतरिक अनुशासन को सख्त नहीं किया, तो लोकतंत्र की जड़ें खोखली होती चली जाएंगी। अब सचेत होने की बारी खुद जनता और राजनीतिक दलों के नेतृत्व की है।
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