​जंतर-मंतर से 'दिल्ली चलो': सत्ता को चुनौती देते जन-आंदोलन और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई।


   


​विभिन्न विरोध प्रदर्शनों का एकीकरण: पिछले कुछ महीनों में भारत में तीन मुख्य असंतोष धाराएं उभरी हैं—कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन, वामपंथी छात्र संगठनों के कार्य, और कांग्रेस व 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के नेतृत्व वाले अभियान。 ये सभी धाराएं अब लोकतंत्र, असहमति, नागरिकों के अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे समान मुद्दों पर एकजुट हो रही हैं。  

​छात्र और युवा असंतोष: जंतर-मंतर पर शुरू हुआ पहला चरण शिक्षा सुधारों, नीट (NEET) पेपर लीक और पूर्व शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर केंद्रित था。 सीजेपी (CJP) ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई और युवाओं की ऊर्जा व रचनात्मकता से बड़े पैमाने पर असंतोष को सड़कों पर उतारा。  

​चुनावी सूची और निष्पक्षता पर सवाल: सितंबर 2026 तक मतदाता सूचियों से 1.33 करोड़ से अधिक नामों के बाहर होने ने पात्र नागरिकों के मताधिकार से वंचित होने की गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। विरोध प्रदर्शनों के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मतदाता विलोपन की जांच, मनमाने निष्कासन पर रोक और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की गई है।  

​चुनाव आयोग की भूमिका और संस्थागत स्वायत्तता: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के बाद से चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता पर लगातार सवाल उठे हैं। आयोग की कार्यप्रणाली, फैसलों में मतभेद और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) ने चुनावी प्रशासन और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच की खाई को गहरा कर दिया है।  

​सत्ता की कमज़ोरियां और दमनकारी नीतियां: सरकार द्वारा असंतोष को दबाने के लिए दमनकारी उपायों का सहारा लेने से युवा वर्ग और सत्ताधारी दल के बीच की दूरी बढ़ गई है। संस्थागत स्वायत्तता का ह्रास और कार्यकारी शक्तियों का केंद्रीयकरण देश को चुनावी लोकतंत्र से चुनावी निरंकुशता की ओर धकेल रहा है।  

​निष्कर्ष: वर्तमान चुनौती इस व्यापक जन-असंतोष को एक टिकाऊ राजनीतिक विकल्प और नियंत्रण में बदलने की है, ताकि शिक्षा प्रणाली, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों के साथ जुड़कर यह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर सके।  

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