पटना स्नातक :बिहार की सियासत में 'शुचिता' का सवाल: बाहुबल और आदर्शों का द्वंद्व । _प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   

 


राजद के दिलीप पटेल इस सियासी लड़ाई में अपनी गाड़ी को 'ग्रीन सिग्नल' मिलते हुए देख रहे हैं। 

​बिहार की राजनीति एक बार फिर उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ आदर्शों और बाहुबल का द्वंद्व चरम पर है। प्रदेश के सबसे बड़े राजनैतिक दल, जदयू (JDU) की चुप्पी और उसकी विवशता, राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या पार्टी के भीतर भय इतना व्याप्त है कि वह अपने ही बागी नेताओं को 'बागी' तक कहने की हिम्मत खो चुकी है?

​वर्तमान घटनाक्रम के केंद्र में हैं जदयू के उम्मीदवार नीरज सिंह, जो भले ही अपनी बड़बोली शैली के लिए कुख्यात रहे हों, लेकिन उनके राजनीतिक चरित्र का एक उज्ज्वल पहलू भी है। उन्होंने कभी भी न तो अपराधियों को प्रत्यक्ष समर्थन दिया और न ही उनके सामने नतमस्तक हुए। स्वस्थ लोकतंत्र की यही वह शुचिता है जिसकी अपेक्षा एक राजनेता से की जाती है।

​इसके ठीक विपरीत, अनंत सिंह जैसे बाहुबली खुलेआम पार्टी से बगावत कर रहे हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी नेतृत्व, कार्रवाई तो दूर, उनसे स्पष्टीकरण (Show Cause) तक मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह का यह बयान कि 'अनंत सिंह अब पार्टी के खिलाफ मीडिया में कोई बयान नहीं देंगे', मानो दल-विरोधी गतिविधियों को मौन स्वीकृति देने जैसा है। यह भय का कैसा वातावरण है जो एक बड़ी पार्टी को इस कदर लाचार बना रहा है?

​राजनीति की विडंबना देखिए, नौबतपुर बिक्रम में जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह के समर्थन में आयोजित रोड शो में समर्थकों ने जेसीबी से फूलों की वर्षा की, मानो कोई अजूबा धरती पर उतरा हो। यह दृश्य बिहार के शिक्षित स्नातक वोटर्स की मनोदशा को बयां करता है, जहां बाहुबल का प्रदर्शन जनभावनाओं को इस कदर सम्मोहित कर रहा है कि अपराधी और राजनीति के फर्क को मिटाया जा रहा है।

​दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में रिश्तेदारी का एक नया समीकरण भी उभर कर आया है। अनुज सिंह, पी.के. शाही के छोटे भाई हैं, और पी.के. शाही का ललन सिंह से क्या रिश्ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। जदयू के कुछ ईमानदार कार्यकर्ता, जिनकी अंतरात्मा पहले इन बाहुबलियों के खिलाफ बोलती थी, अब इस भीतरी मिलीभगत के चलते मौन धारण कर चुके हैं। यहां तक कि पार्टी से निष्कासित एक नेता भी अब अनंत सिंह के कंधे पर बैठकर अपनी राजनीतिक किस्मत चमकाने की फिराक में है।

​इन सबके बीच, नीरज सिंह का आचरण अपवाद स्वरूप है। उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य की परवाह किए बिना ऐसे तत्वों को कभी खुद के करीब फटकने नहीं दिया। उनकी कार्यशैली हमेशा इमानदारी और बिना भेदभाव के रही है। वहीं, राजनीति में शुचिता के पर्याय माने जाने वाले प्रशांत किशोर, अपनी जीत का आंकड़ा बढ़ाने की जल्दी में, बिना देरी किए अनंत सिंह के उम्मीदवार को 'हाइजैक' कर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। यह राजनीतिक शुचिता का कैसा पैमाना है?

​राजनीति के ये रंग और बहुरूपिए चरित्र हैरान करते हैं। जो नेता कल तक सम्राट चौधरी को खुलेआम अपराधी कहते नहीं थकते थे, आज उन्हीं की गोद में बैठ कर अपनी सत्ता की रोटियां सेक रहे हैं। परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन एक बात तो तय है कि नीरज सिंह जैसे नेताओं की कार्यशैली और इमानदारी राजनीति की शुचिता के लिए याद की जाएगी। इस बीच, राजद के दिलीप पटेल दो भूमिहारों की इस सियासी लड़ाई में अपनी गाड़ी को 'ग्रीन सिग्नल' मिलते हुए देख रहे हैं, और मूकदर्शक बने हुए हैं।

​क्या यही वह बिहार है जिसकी कल्पना जेपी और कर्पूरी ठाकुर ने की थी? यह सवाल आज हर उस बिहारी के जेहन में कौंध रहा है जो राजनीति में नैतिकता और शुचिता की तलाश में है।

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