​लोकतंत्र की धड़कन हैं विरोध प्रदर्शन: जंतर-मंतर को छिपाने की कोशिशें खतरनाक।



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दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में डी-नोटिफ़ाई (अधिसूचना से बाहर) करने का निर्णय प्रशासनिक मनमानी का एक स्पष्ट उदाहरण है। तर्क दिया जाता है कि प्रदर्शनों से आम नागरिकों को यातायात या असुविधा होती है, लेकिन यह तर्क लोकतंत्र की मूल भावना के ही खिलाफ है। लोकतंत्र में असहमति, सार्वजनिक विचार-विमर्श और विरोध प्रदर्शन केंद्रीय स्तंभ हैं।

​जंतर-मंतर जैसे केंद्रीय स्थान सत्ता के केंद्रों (संसद और राष्ट्रपति भवन) के पास स्थित होते हैं, जो समाज के हाशिए पर मौजूद और शक्तिहीन समूहों को अपनी बात सुनाने का एकमात्र साधन देते हैं। यदि विरोध प्रदर्शनों को शहर की सीमाओं से बाहर धकेल दिया जाए, तो यह उस आवाज को दबाने जैसा है जिसे लोकतंत्र सुनना चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि असहमति को नजरों से ओझल कर दिया जाए।

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