भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की साख पर मंडराता संकट और फॉर्म 6-7 का विवाद.
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) वर्तमान में अपनी साख और विश्वसनीयता के सबसे गंभीर दौर से गुजर रहा है। चुनाव आयोग द्वारा बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के फॉर्म 6 में 'घोषणा' (Declaration) को शामिल करना और इसे नागरिकता अधिनियम से जोड़ना ऐसा प्रतीत होता है मानो पिछले दरवाजे से नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC) को लागू करने का प्रयास किया जा रहा हो।
आयोग की कार्यप्रणाली में यह गिरावट केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह निष्पक्ष चुनावों और नागरिकों के वोट के अधिकार की रक्षा करने वाले निकाय के रूप में इसके मूल स्वरूप को कमजोर करती है। उत्तराखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में फॉर्म 7 के जरिए मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाने के लिए फर्जी आवेदन और आपत्तियां दर्ज किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं, जिन पर आयोग की सुस्त प्रतिक्रिया इसकी पारदर्शिता पर और अधिक संदेह पैदा करती है। इसके अलावा, मतदान के बाद के वीडियो फुटेज को रोकने के नियम, आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में चुनिंदा कार्रवाई और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को हिला रही हैं।
यदि निर्वाचन आयोग को अपनी खोई हुई सार्वजनिक विश्वसनीयता को वापस पाना है, तो उसे अपनी कार्यशैली में पूर्ण पारदर्शिता लानी होगी और सभी राजनीतिक दलों व नागरिकों के प्रति निष्पक्षता का प्रमाण देना होगा।
#ECI #ElectionCommission #IndianDemocracy #Transparency #Form6 #Form7 #ElectionReform #CurrentAffairs
.jpeg)
Comments
Post a Comment