RSS के 101 वर्ष: बदलाव और निरंतरता के दोराहे पर.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना के 101 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1925 में हिंदू समाज के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से शुरू हुआ यह संगठन आज देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में से एक बन चुका है। वर्तमान में राजनीतिक सत्ता में प्रत्यक्ष दखल के बावजूद, इसके अतीत, वैचारिक प्राथमिकताओं और समावेशिता को लेकर बहसें आज भी प्रासंगिक हैं।
ऐतिहासिक अंतर्विरोध और विरासत:
संघ का शुरुआती इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से दूरी और विभाजन के समय की सांप्रदायिक परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर लगा प्रतिबंध और नाथूराम गोडसे से वैचारिक नजदीकियों ने इसके अतीत को गहरा दाग दिया है। साथ ही, एम.एस. गोलवलकर के विचारों में अल्पसंख्यक वर्गों को लेकर जो दृष्टिकोण रहा, उसने राष्ट्रवाद की परिभाषा को लेकर लगातार सवाल खड़े किए हैं।
नरमी और बदलाव के संकेत (RSS 2.0):
हाल के वर्षों में मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ के रुख में कुछ नरम और समावेशी बदलाव देखने को मिले हैं। सार्वजनिक मंचों पर इस्लाम स्वीकार्यता, अंतरधार्मिक संवाद की पहल, और शासन-प्रशासन के रोजमर्रा के फैसलों से दूरी बनाने के दावे इसे पारंपरिक उग्र हिंदुत्व से अलग दिखाने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
जमीनी हकीकत और चुनौतियां:
सैद्धांतिक बयानों और व्यावहारिक आचरण के बीच का अंतर अभी भी बड़ा मुद्दा है। घृणास्पद भाषण (Hate speech), उपासना स्थल कानून (Places of Worship Act) के उल्लंघन के प्रयास और अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि संघ का जमीनी ढांचा अब भी बहुसंख्यकवादी प्राथमिकताओं पर चल रहा है।
आज देश की अधिकांश आबादी युवा है, जो सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से हर गतिविधि पर पैनी नजर रखती है। संघ का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सिर्फ बयानों से नहीं, बल्कि वास्तविक समावेशिता, लोकतांत्रिक बहुलता और संविधान के प्रति निष्ठा से खुद को कितना प्रासंगिक साबित कर पाता है।
#RSS #ShashiTharoor #IndianPolitics #HinduRashtra #Secularism #ModiGovernment #SocialChange #CurrentAffairs
.jpeg)
Very fine comment upon R ss. Conclusion is remarkable. Thanks
ReplyDelete