​एसआईआर (SIR) की लंबी और छोटी कहानी: मतदान के अधिकार पर मंडराता खतरा।

   



​बड़े पैमाने पर मतदाताओं का मताधिकार छिनना: हाल ही में अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज (Jean Drèze) और योगेंद्र यादव ने यह तर्क दिया है कि एसआईआर (SIR) की पूरी प्रक्रिया बड़े पैमाने पर मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित  कर रही है. अनुमान है कि भारत की कुल वयस्क आबादी का लगभग 12% हिस्सा (कम से कम 12 करोड़ मतदाता) अंतिम एसआईआर सूचियों से बाहर हो सकता है.  

​बहिष्कार (Exclusion) पर आधारित प्रक्रिया: एसआईआर सूचियों को तैयार करने की प्रक्रिया का पहला चरण मूल रूप से 'बहिष्कार' पर आधारित है. इसमें पहले से तैयार सूचियों से एएसडीडी (ASDD - अनुपस्थित, स्थानांतरित, दोहराए गए या मृत) नामों को हटा दिया जाता है.  

​जनसंख्या के आंकड़ों से भारी अंतर: शुरुआती मसौदा सूचियां (Draft lists) वयस्क आबादी के अनुमानों से काफी नीचे हैं. हालांकि कुछ आलोचकों का तर्क है कि शुरुआती सूचियां समावेशी थीं और बाद में 13 करोड़ लोगों को हटाया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि शुरुआती सूचियों में ही बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल थे जो या तो डुप्लीकेट थे या मृत/ स्थानांतरित हो चुके थे, जिससे यह समस्या छिपी रही.  

​फॉर्म 6 और फॉर्म 7 की जटिलताएं: छूटे हुए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए फॉर्म 6 का बड़े पैमाने पर उपयोग करने के बजाय, पूरी प्रक्रिया नागरिकों से नागरिकता साबित करने से जुड़े दस्तावेज मांगने पर केंद्रित हो गई. प्रवासियों और 'स्थानांतरित' (Shifted) घोषित किए गए श्रमिकों को अपने नए स्थान पर नाम जुड़वाने में अत्यधिक कठिनाइयों और दस्तावेजों की कमी का सामना करना पड़ा.  

​लोकतांत्रिक ढांचे पर चोट: नोटबंदी, कोविड लॉकडाउन और ई-केवाईसी संकट की तरह ही आम जनता को इस प्रक्रिया से भारी मानसिक और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ा है. यह सीधा हमला भारत की चुनावी और बुनियादी लोकतांत्रिक व्यवस्था यानी 'वोट देने के अधिकार' पर है.  

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