खाकी के खौफ का नंगा नाच: पुलिसिया बर्बरता के शिकार पीड़ित ने विपक्षी नेता के दरबार में लगाई न्याय की गुहार।


(पीड़ित की फाइल फोटो) 
   

बिहार के पटना जिले के रानीतलाब थाने से मानवता को शर्मसार कर देने वाली और खाकी की साख पर बट्टा लगाने वाली एक अत्यंत अमानवीय और बर्बर घटना सामने आई है। पीड़ित उपेंद्र कुमार (पिता- सिधनाथ राय, साकिन-  पतुत , थाना- रानीतलाब) के साथ जो कुछ हुआ, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह घटना सिर्फ एक थाने की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि राज्य में कानून के राज की पोल खोलती है।

इस सम्बन्ध में  मैं थाना अध्यक्ष रानी तालाब से बात करने की कोशिश की तो एक no बक्सर में किसी थाना प्रभारी के पास मौजूद था दूसरा no नहीं लग रहा था। यही दोनों no नेट पर मौजूद है। 

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त विवरण और दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार, दिनांक 21.09.2026 की रात्रि करीब 1.30 बजे रानीतलाब थाना पुलिस ने बिना किसी वारंट, उचित कारण या महिला पुलिस की मौजूदगी के पीड़ित के घर में जबरन घुसपैठ की। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने महिलाओं के साथ अभद्र टिप्पणी व गाली-गलौज की और जब इसका विरोध किया गया, तो मोबाइल छीन लिया गया।

इसके बाद पीड़ित को जबरन थाने ले जाकर दो लाख रुपए (Rs. 2,00000/-) की अवैध रंगदारी की मांग की गई। पैसे न देने पर रानीतलाब थाना प्रभारी श्रवण कुमार, आर्दश कुमार (ओपी प्रभारी जीतन छपरा), अरुण कुमार एसओआई तथा अन्य अज्ञात कर्मियों द्वारा पीड़ित को बेरहमी से पीटा गया। सीने पर बूट रखकर, कमर पर लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से लगभग 300-400 बार प्रहार किया गया, जिससे पीड़ित को असहनीय पीड़ा हुई और पेशाब के रास्ते खून तक आने लगा। शाम को परिजनों द्वारा दो लाख रुपए की फिरौती/रंगदारी चुकाने के बाद ही उसे छोड़ा गया और एनकाउंटर की धमकी दी गई। वर्तमान में पीड़ित पीएमसीएच, पटना के इमरजेंसी वार्ड में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है, और लगातार धमकियां मिल रही हैं।

जब पुलिस बन जाए भक्षक, तो न्याय की आस कहां?

जब वर्दी पहनने वाले रक्षक ही कानून को ताक पर रखकर वसूली और अत्याचार करने लगें, तो आम नागरिक कहां जाए? प्रशासन और शासन से न्याय की उम्मीद जब धूमिल पड़ने लगती है, तब मजबूरन पीड़ित को न्याय की तलाश में विपक्ष की शरण में जाना पड़ता है।

हाल ही में हुई इस घटना से आहत होकर पीड़ित ने न्याय की आस में विपक्षी नेता के दरवाजे पर दस्तक दी है। विपक्ष के शरण में जाकर न्याय मांगने की यह मजबूरी इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मौजूदा व्यवस्था में आम आदमी कितना असहाय और प्रताड़ित महसूस कर रहा है। क्या एक गरीब नागरिक को न्याय पाने के लिए अब राजनीतिक शरण लेनी पड़ेगी? यह सवाल बिहार के गृह विभाग और उच्चाधिकारियों से सीधा पूछा जाना चाहिए।

आरोपी थाना प्रभारी श्रवण कुमार, आर्दश कुमार, अरुण कुमार समेत सभी संलिप्त पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए।

इन सभी के खिलाफ हत्या के प्रयास, रंगदारी और एससी-एसटी/आपराधिक धाराओं के तहत गंभीर मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया जाए।

पीड़ित परिवार को पूर्ण सुरक्षा और सरकार द्वारा उचित मुआवजा प्रदान किया जाए।

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