निर्वाचन आयोग की साख और आंतरिक कलह पर गंभीर सवाल: सुधार जरूरी।
भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission) जो 1950 में अपनी स्थापना के बाद से देश की सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित संस्थाओं में गिना जाता था, आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। एक मीडिया जांच से यह उजागर हुआ है कि 3 सदस्यीय आयोग के भीतर अभूतपूर्व आंतरिक मतभेद चल रहे हैं, जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निर्णयों के खिलाफ आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
निर्णय लेने की प्रामाणिकता: रिपोर्ट ने तीन अहम सवाल खड़े किए हैं कि आखिर मुख्य फैसले कौन ले रहा है, मतदाता सूची (electoral roll) पर किसका नियंत्रण है, और किस अधिकार के तहत बड़े बदलाव किए जा रहे हैं?
पारदर्शिता का अभाव: आयोग ने न तो इन आंतरिक ज्ञापनों (memos) को सार्वजनिक किया और न ही यह स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में बदलाव, पश्चिम बंगाल में एसआईआर (SIR) विलोपन अपील दायर करने के निर्देश या गोवा में ईआरओ (EROs) द्वारा मतदाता सूची में संशोधन न कर पाने की स्थिति के लिए किसने अधिकृत किया था।
मतदाताओं के अधिकारों से खिलवाड़: मतदाताओं की सूची को दुरुस्त करना एक वैध प्रक्रिया है, लेकिन इसका उद्देश्य जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही जरूरी इसकी पारदर्शी प्रक्रिया भी है। किसी भी योग्य मतदाता को बाहर करना कोई मामूली प्रशासनिक चूक नहीं माना जा सकता।
अब समय आ गया है कि निर्वाचन आयोग सिर्फ आंतरिक कलह से इनकार करने के बजाय उठाए गए गंभीर सवालों के स्पष्ट जवाब दे। प्रक्रियात्मकバイपास और अनधिकृत निर्देशों के आरोपों की सच्चाई सामने आनी चाहिए, और जनता के टूटते भरोसे को बहाल करने के लिए संबंधित जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराना होगा।
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