पर्यावरण बनाम विकास: अरावली का विनाश और संवैधानिक संकट।

 




अरावली पर्वत श्रृंखला, जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक लगभग 700 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है, उत्तर भारत के लिए केवल पहाड़ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक ढाल और जीवनरेखा है। यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकती है, भूजल स्तर को बनाए रखती है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से बचाती है। हाल ही में अरावली क्षेत्र में खनन और टेंडर से जुड़े मामलों को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, जो पर्यावरण संरक्षण के दावों और धरातल पर हो रहे कारनामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है।   

क्या यह संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन है?

अरावली के अंधाधुंध दोहन और खनन की अनुमति या टेंडर दिए जाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के कई बुनियादी प्रावधानों और मौलिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन प्रतीत होती है:

अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार): उच्चतम न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे एमसी मेहता वाद) में स्पष्ट किया है कि 'जीने के अधिकार' के अंतर्गत ही स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी और प्रदूषणमुक्त पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। 700 किलोमीटर लंबी अरावली को क्षति पहुँचाने से उत्तर भारत की आबोहवा जहरीली होगी, जो नागरिकों के जीने के मौलिक अधिकार (Article 21) का हनन है।

अनुच्छेद 48क (राज्य की नीति के निर्देशक तत्व - पर्यावरण का संरक्षण): भारतीय संविधान के इस प्रावधान के अनुसार, राज्य देश के पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वन और वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के दोहन से जुड़े निर्णय इस नीति निर्देशक तत्व की भावना के विपरीत जाते हैं।

अनुच्छेद 51क(छ) (मूल कर्तव्य): यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बताता है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीव सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और उसका संवर्द्धन करे। जब सरकारें या प्रशासनिक तंत्र व्यावसायिक हितों के लिए खनन के टेंडर जारी करते हैं, तो यह सामूहिक रूप से पर्यावरण के प्रति हमारे संवैधानिक कर्तव्यों पर एक बड़ा आघात होता है।

विकास की अंधी दौड़ में देश के प्राचीनतम प्राकृतिक पहरेदार—अरावली—को मिटाना न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी है, बल्कि यह देश के संविधान की मूल आत्मा और पर्यावरण-संरक्षण से जुड़े प्रावधानों की भी खुली अवहेलना है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर जल संकट और मरुस्थलीकरण का सामना करना पड़ेगा।

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