एनीमिया का बोझ और नमक का आयनीकरण: समाधान या नई चुनौती?

   

 


भारत में एनीमिया (खून की कमी) का संकट एक गंभीर समस्या है, जिसके समाधान के रूप में डबल-फोर्टिफाइड सॉल्ट (DFS - आयोडीन और आयरन युक्त नमक) को एक क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालाँकि, इस नीति और इसके व्यापक प्रसार की गहराई से समीक्षा करने की आवश्यकता है।  

नमक की खपत और अंतविरोध: भारत में लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित मात्रा से लगभग दोगुना नमक खाते हैं, जबकि देश का NCD (गैर-संचारी रोग) एक्शन प्लान नमक के सेवन को 30% तक कम करने का लक्ष्य रखता है। ऐसे में 'डबल-फोर्टिफाइड' नमक का प्रचार नमक की खपत को कम करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के विपरीत है।  

आयरन की खपत में असमानता: नमक की खपत आय, लिंग या उम्र के आधार पर पूर्वानुमानित नहीं होती है। वयस्क पुरुष सबसे अधिक नमक खाते हैं, जबकि युवा बच्चों और महिलाओं को इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, जिन्हें सबसे कम मात्रा मिलती है।   

आयरन का जोखिम: शरीर के पास अतिरिक्त आयरन को बाहर निकालने का कोई प्राकृतिक तरीका नहीं है, जिससे शरीर में आयरन का संचय, ऑक्सीडेटिव तनाव और चयापचय संबंधी रोग हो सकते हैं। 

एनीमिया का एकमात्र कारण आयरन नहीं है: वैश्विक स्तर पर लगभग आधे एनीमिया के मामले आयरन की कमी के कारण होते हैं। बाकी मामले फोलेट, विटामिन B12 की कमी, क्रोनिक संक्रमण, हुकवर्म, मलेरिया और कुपोषण जैसे अन्य कारणों से जुड़े हैं। इसलिए केवल एक पोषक तत्व (आयरन) पर आधारित समाधान सभी समस्याओं का हल नहीं हो सकता।   

बेहतर विकल्प और दिशा: पेरू और वियतनाम जैसे देशों ने एनीमिया से निपटने के लिए लक्षित पोषण, स्वास्थ्य संपर्कों, स्वच्छता और बेहतर आहार विविधता (dietary diversity) जैसे उपायों को अपनाकर सफलता हासिल की है। भारत को बिना सोचे-समझे DFS को राष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं करना चाहिए, बल्कि लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों, स्वच्छता, और बहुआयामी दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए।

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