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Showing posts from February, 2026

रामलखन सिंह यादव कॉलेज में हर्षोलास के साथ होली मिलन समारोह मनाया गया!

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पटना (अनीसाबाद): स्थानीय राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद के छात्रों में होली के पावन अवसर पर भव्य 'होली मिलन समारोह' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कॉलेज के प्राध्यापकों, स्टूडेंट्सऔर कर्मचारियों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। मुख्य अतिथि का स्वागत .  समारोह के मुख्य अतिथि कॉलेज के शासी निकाय के अध्यक्ष व पालीगंज के  विधायक कॉम  संदीप सौरभ रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में  प्रो. सुरेंद्र प्रसाद  ने मुख्य अतिथि को पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया.   कॉम संदीप सौरभ ने कॉलेज के विकास के प्रति अपनी रुचि प्रदर्शित की। उन्होंने कहा कि कॉलेज के ढांचे को और भी बेहतर बनाने के लिए वे हरसंभव प्रयास करेंगे। वहीं प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने होली को मित्रवत प्रेम, शांति और भाईचारे का प्रतीक बताया।  इस समारोह में कॉलेज के विद्वानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उपस्थित मुख्य सदस्यों में   प्रो. कुमारी  तेजस्विनी , प्रो. रामबिनेश्वर सिंह, प्रो. बी.डी. यादव, प्रो. अशोक यादव, प्रो. अनिल कुमार, प्रो. वीरेंद्र प्रसाद यादव, प्रो. राय श्...

इंसानियत की मिसाल: सड़क हादसे में तड़पती रही महिला-बच्चे के लिए फरिश्ता बने एम्सकर्मी टिंकू जी!

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  बिहटा-सरमेरा रोड (पटना): बिहटा-सरमेरा मार्ग पर नौबतपुर टोल टैक्स (पुनपुन घाट) के पास एक हृदयविदारक सड़क दुर्घटना हुई, जिसने समाज की संवेदन निष्ठा और एक व्यक्ति की कर्मठता को एक साथ जोड़ दिया। दुर्घटना का विवरण एक बाइक पर सवार महिला और उनका 6 महीने का मासूम बच्चा जा रहे थे, तभी वे सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। चश्मदीदों के मुताबिक, दुर्घटना के बाद महिला और बच्चे सड़क पर दर्द से छटपटा रहे थे। दूसरी बात यह है कि उनके साथ मौजूद पुरुष उस कठिन घड़ी में उनकी कोई मदद नहीं कर सके और वहां मौजूद भीड़ केवल तमाशा तलाश रही थी. जब लोग केवल वीडियो बनाते थे और भीड़ में शामिल होते थे, तभी वहां से गुजर रहे एम्स पटना (एम्स पटना) में कार्यरत टिंकू जी की नजरें उन पर पड़ीं। उन्होंने बिना समय गंवाए अपने मानवता का परिचय दिया: टिंकू जी  तुरंत ही देश के सबसे बड़े राज्य के एम्स में गाड़ियां ले जाकर एडमिट कराया. मरीजों  को प्राथमिक उपचार सुनिश्चित करवाते हुए उन्हें बेहतर इलाज के लिए एम्स अस्पताल में रखा गया। भीड़ नहीं, सुपरमार्केट इस घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि सड़क पर किसी की जान ...

शब्द-सामर्थ्य: जहाँ रिक्तता दरिद्रता बन जाती है.

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  अल्प शब्द मति क्षीणता, बुद्धि का संताप। शब्द-धनी जो हो नहीं, व्यर्थ ज्ञान का जाप॥  अक्सर कहा जाता है कि संसार में सबसे बड़ा अभाव धन का है, किंतु सत्य इसके विपरीत है। आर्थिक दरिद्रता व्यक्ति के जीवन को कठिन बना सकती है, लेकिन 'शब्दों की दरिद्रता' उसके व्यक्तित्व को ही बौना कर देती है। विशेषकर एक बुद्धिजीवी के लिए शब्दों का अभाव केवल मौन नहीं, बल्कि उसके वैचारिक दिवालिएपन का संकेत है। शब्द ही सार हैं बुद्धिजीवी वह है जो समाज को दिशा दे, जो जटिल भावनाओं को सरल अर्थ प्रदान करे। यदि उसके पास शब्दों का अभाव है, तो वह उस जौहरी की तरह है जिसके पास पारखी नजर तो है, पर दिखाने के लिए कोई रत्न नहीं। शब्द हमारे विचारों के वाहन हैं; यदि वाहन ही अक्षम हो, तो विचार कभी गंतव्य तक नहीं पहुँच सकते। एक बुद्धिजीवी की गरिमा एक प्रबुद्ध व्यक्ति का आभूषण उसकी भाषा होती है। जब हम शब्दों के चयन में कंजूसी करते हैं या सतही शब्दावली का प्रयोग करते हैं, तो हम अपनी बौद्धिक चेतना के साथ अन्याय करते हैं। ज्ञान का संचय तब तक अधूरा है, जब तक उसे व्यक्त करने के लिए एक समृद्ध शब्द-कोष न हो। 

भारत में कैंसर की चुनौती: केवल बीमारी नहीं, व्यवस्था की विफलता!

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  भारत में कैंसर से बढ़ती मृत्यु दर केवल एक चिकित्सीय संकट नहीं है, बल्कि यह हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की गहरी खामियों और सामाजिक उदासीनता का प्रतिबिंब है। हालिया आंकड़ों और आपके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर, इस समस्या के कई चिंताजनक पहलू सामने आते हैं। 1. संसाधनों का भयावह असंतुलन   भारत में 2,000 मरीजों पर मात्र 1 डॉक्टर है, जबकि अमेरिका में यह अनुपात 100 पर 1 है, भारतीय स्वास्थ्य ढांचे की खोखली हकीकत को उजागर करती है। तथ्य: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार, प्रति 1,000 आबादी पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। कैंसर जैसे जटिल रोग के लिए यह अनुपात और भी बेहतर होना आवश्यक है। परिणाम: डॉक्टरों की इस कमी के कारण मरीजों को समय पर परामर्श नहीं मिल पाता, जिससे इलाज में देरी होती है और मृत्यु दर बढ़ती है। 2. 'अंतिम चरण' में पहचान की त्रासदी भारत में कैंसर से होने वाली मौतों की सबसे बड़ी वजह देर से पहचान  है। आलोचनात्मक पक्ष: भारत में लगभग 70% कैंसर मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी तीसरे या चौथे चरण में पहुँच चुकी होती है। इसका कारण जागरूकता का अभाव और ग्रामीण क्षेत्र...

जीवन: एक अनवरत प्रवाह और समय की सीख!

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  कबीर की कुछ पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि यह संसार नश्वर है। यहाँ 'साजो-सामान' और 'तामझाम' आता-जाता रहता है। हम अक्सर चीजों और व्यक्तियों से जुड़ाव बना लेते हैं, लेकिन समय हमें सिखाता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है। 1. अनित्यता और कबीर का बोध कबीर दास जी ने संसार की इसी क्षणभंगुरता को इन शब्दों में पिरोया है: कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।। यहाँ 'घर जलाने' का अर्थ मोह-माया और भौतिक जुड़ाव को त्यागने से है। जब हम यह समझ लेते हैं कि कुछ भी साथ नहीं रहने वाला, तब हम असल जीवन जीना शुरू करते हैं। 2. बिछड़ने का दर्द और उद्देश्य  "हर बिछड़ना दिल तोड़ता है, लेकिन समय के साथ समझ आता है कि हर किसी का आना किसी मकसद से होता है।" कबीर का मानना था कि जीवन में दुख और सुख दोनों गुरु की तरह आते हैं। दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।। जब हम प्रतिकूल परिस्थितियों (बिछड़ने या खोने) को एक 'सीख' के रूप में स्वीकार करते हैं, तो वे हमें और अधिक मजबूत बनाती हैं। 3. त्याग और स्वीकार्यता ...

भारत मेंकॉपीराइट की वर्तमान स्थिति!

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  1. कॉपीराइट की वर्तमान स्थिति और बाधाएं:  वर्तमान कॉपीराइट कानून अपने मूल उद्देश्य (रचनात्मकता को बढ़ावा देना) से भटक गए हैं और अब वे ज्ञान तक पहुँच में बाधा बन रहे हैं।  अत्यधिक क ऐतिहासिक रूप से कॉपीराइट एक सीमित अधिकार था (शुरुआत में केवल 14 वर्ष के लिए), । इस 'कॉपीराइट मैक्सिमलिज्म' (अतिवाद) ने सार्वजनिक डोमेन को सिकोड़ दिया है। 3. AI और डेटा माइनिंग की चुनौतियाँ: जेनेरेटिव AI के दौर में, मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए भारी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के सात देशों के अध्ययन से पता चलता है कि भारत सहित कई देशों के कानून स्पष्ट रूप से AI ट्रेनिंग के लिए डेटा के उपयोग की अनुमति नहीं देते हैं, जिससे कानूनी अनिश्चितता पैदा होती है। 4. अन्य देशों के उदाहरण: यूरोपीय संघ, जापान और सिंगापुर जैसे देशों ने 'टेक्स्ट और डेटा माइनिंग' (TDM) के लिए अपने कानूनों में छूट दी है। जापान का कानून विशेष रूप से मशीनों द्वारा डेटा के उपयोग को मानवीय उपभोग से अलग मानता है, जो AI के विकास के लिए अनुकूल है। 5. भविष्य की राह और सुझाव: भारत को अपने कॉपीरा...

तकनीक के दौर में मानवीय रचनात्मकता और बौद्धिक संकट! !

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  मुख्य  विचार  क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मानवीय रचनात्मकता और मौलिक चिंतन को समाप्त कर रहा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि एक विचारशील इंसान बनाना है, जिसे आज की "क्लिक और कॉपी" संस्कृति नुकसान पहुँचा रही है। बौद्धिक प्रतिगमन (Intellectual Regression): आधुनिक पीढ़ी ज्ञान के लिए संघर्ष करने के बजाय त्वरित उत्तरों पर निर्भर हो गई है। यह 'बौद्धिक पतन' का संकेत  है, जहाँ सूचना तक पहुँच तो आसान है, लेकिन गहन समझ का अभाव है। लेखन और कल्पना का ह्रास: एआई के कारण लेखन अब एक मानवीय अभिव्यक्ति के बजाय केवल एक 'उत्पाद' बन गया है। जब छात्र और शोधकर्ता एआई से निबंध लिखवाते हैं, तो वे अपनी सोचने और तर्क करने की क्षमता खो देते हैं। वैज्ञानिक शोध पर संकट: शोध पत्रों में एआई का अनियंत्रित उपयोग "भ्रामक उद्धरणों" (phantom citations) और गलत जानकारी को बढ़ावा दे रहा है, जिससे अकादमिक विश्वसनीयता खतरे में है। भाषा और लोकतंत्र: भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं और स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति है। यदि भाषा का स्तर गिरेगा, तो मानवीय...

आवश्यकतानुसार न्यायपालिका में विविधता और सुलभता: कॉलेजियम प्रणाली और सुधार की चुनौतियाँ!

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       1. न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव यह इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारतीय उच्चतर न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की भारी कमी है। आंकड़े: 2018 से 2024 के बीच नियुक्त न्यायाधीशों में केवल 20% SC, ST और OBC समुदायों से थे। लैंगिक और धार्मिक असंतुलन: महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15% और 5% से भी कम है। आलोचना: यह आंकड़े दर्शाते हैं कि 'योग्यता' (Merit) के नाम पर अनजाने में एक विशिष्ट वर्ग का वर्चस्व बना हुआ है, जो न्यायपालिका की समावेशी छवि को प्रभावित करता है। 2. कॉलेजियम प्रणाली: स्वतंत्रता बनाम पारदर्शिता विकास: 1993 के 'दूसरे न्यायाधीश मामले' के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए इसे लाया गया। समस्या:  इस प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है। भाई-भतीजावाद (Nepotism) के आरोपों और बंद दरवाजों के पीछे होने वाली नियुक्तियों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। NJAC की विफलता: 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करना न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच...

आधुनिक समाज में बढ़ता भावनात्मक फासला और 'आंसुओं' की सार्थकता !

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  आज के युग में हम शारीरिक रूप से एक-दूसरे के जितने करीब आए हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। "हम एक-दूसरे के सामने होकर भी एक-दूसरे के सुख-दुख से कितने अपरिचित हैं!"—आज के 'डिजिटल एकांत' (Digital Isolation) की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। 1. भौतिक निकटता बनाम भावनात्मक दूरी मनोवैज्ञानिक रूप से, हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ 'भीड़ में अकेलापन' एक सामान्य स्थिति बन गई है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों मित्र होने के बावजूद, जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन के 'सुख-दुख' से गुजरता है, तो उसके पास वास्तविक संवेदना साझा करने वाले लोगों का अभाव होता है। हम एक ही मेज पर बैठकर फोन में व्यस्त रहते हैं, जिससे हमारे बीच की सहानुभूति (Empathy) का स्तर गिरता जा रहा है। 2. आंसुओं का मनोविज्ञान:  मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, आंसू केवल दुख की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि ये मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक 'कैथार्सिस' (Catharsis) या भावनात्मक शुद्धिकरण का कार्य करते हैं। तनाव से मुक्ति: आंसू बहाने से शरीर में 'कोर्टिसोल' (तनाव हार्मोन) का स्तर कम ह...

भारतीय रेल: सुरक्षा और सेवा के 'ट्रैक' पर गहराता संकट!

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  भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन वर्तमान में यह रेखा असुरक्षा और अव्यवस्था के भंवर में फंसी नजर आती है। एक तरफ सरकार रेलवे को 'विश्व स्तरीय' बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों की बुनियादी जरूरतों—भोजन और सुरक्षा—के साथ खिलवाड़ एक कड़वा सच बन चुका है। 1. भोजन नहीं, बीमारी का 'जोखिम' हालिया आंकड़ों और यात्रियों के अनुभवों से स्पष्ट है कि ट्रेनों में परोसा जाने वाला भोजन अब केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक 'जोखिम' बन गया है। गुणवत्ता का अभाव: प्रीमियम ट्रेनों (राजधानी, शताब्दी) से लेकर सामान्य मेल ट्रेनों तक, भोजन में तिलचट्टे, कीड़े और अखाद्य वस्तुओं का मिलना आम हो गया है। 2024-25 के दौरान खान-पान की गुणवत्ता को लेकर 6,645 आधिकारिक शिकायतें दर्ज होना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। आर्थिक शोषण: यात्रियों से तय कीमत से अधिक राशि वसूलना और बदले में कम मात्रा या बासी खाना देना रेलवे के निगरानी तंत्र की विफलता है। जवाबदेही की कमी: शिकायत करने पर कर्मियों द्वारा यात्रियों से दुर्व्यवहार की खबरें सिस्टम की तानाशाही प्रवृत्ति को उजा...

गया की गलियों में गूँजती वो आख़िरी ठुमरी: जद्दनबाई की हवेली का अंत ! उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया।

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  ​इतिहास कभी-कभी ईंट-गारों की दीवारों में नहीं, बल्कि उन हवाओं में बसता है जो किसी दौर की महफिलों की गवाह रही हों। बिहार के गया शहर के पंचायती अखाड़ा रोड पर खड़ी वह हवेली अब मिट्टी में मिल चुकी है, लेकिन उसकी रूह में आज भी ठुमरी के वो सुर और घुँघरुओं की वो खनक दफ़न है, जिसने कभी राजा-रजवाड़ों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। ​ कला की 'मल्लिका' और गया का नाता ​यह हवेली सिर्फ़ एक इमारत नहीं थी, बल्कि भारतीय कला जगत की एक गौरवशाली विरासत थी। यहाँ देश की प्रसिद्ध नर्तकी और गायिका जद्दनबाई का बसेरा था। वही जद्दनबाई, जिनकी विरासत को आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचाया। ​कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले इस हवेली में जब जद्दनबाई अपनी महफ़िल सजाती थीं, तो वक्त ठहर जाया करता था। ठुमरी के सुरों पर जब वे थिरकती थीं, तो दूर-दूर से रईस और कला-पारखी उनके फन का दीदार करने खिंचे चले आते थे। वह दौर कला की कद्रदानी का स्वर्णिम युग था। ​ विकास की भेंट चढ़ी विरासत ​विडंबना देखिए, जिस विरासत को एक 'म्यूज़ियम' या कला केंद्र होना चाहिए था, वह समय की मार और सरक...

बेटियों के लहू से लाल होता शिक्षा का मंदिर: न्याय की पुकार!

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  17 फरवरी को शाम 5 बजे से नकटी भवानी से एम्स होते फुलवारी कैंडल मार्च: सोई हुई व्यवस्था को जगाने की एक कोशिश! ​पटना के फुलवारी शरीफ से आई खबर ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया है, बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर दिया है। 16 साल की एक मासूम, जो आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने लेकर 'फंडामेंटल कोचिंग' की दहलीज पर कदम रखती थी, आज वह दरिंदगी की भेंट चढ़ गई। ​परिजनों का आरोप है कि उसके साथ हैवानियत की गई और फिर साक्ष्य मिटाने के लिए उसे छत से नीचे फेंक दिया गया। क्या अब शिक्षा के केंद्र भी बेटियों के लिए सुरक्षित नहीं रहे? शरीर पर पड़े वे जख्म चीख-चीख कर इंसाफ मांग रहे हैं। ​ सत्ता और सियासत के बीच सिसकता न्याय ​घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश है। सांसद पप्पू यादव, पूर्व विधायक गोपाल रविदास और राजद नेता  हरिनारायण  यादव ने पीड़ित परिवार से मिलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। प्रबुद्ध जनों का कहना है कि अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण अपराधी बेखौफ हैं। ​"यह सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि प्रशासन के इकबाल की हत्या है।" ​ 🕯️ कैंडल मार्च: सोई हुई व्...

सरला माहेश्वरी: जहाँ चेहरा नहीं, शब्द और चरित्र बोलते थे!

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  ​आज की कानफोड़ू 'ब्रेकिंग न्यूज़' और चकाचौंध भरे स्टूडियो के शोर में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक सौम्य चेहरा आंखों के सामने तैर जाता है— सरला माहेश्वरी । दूरदर्शन के उस श्वेत-श्याम और शुरुआती रंगीन दौर की वह एक ऐसी आवाज़ थीं, जिसने पत्रकारिता को 'ग्लैमर' से नहीं, बल्कि 'गरिमा' से परिभाषित किया था। ​सादगी का सौंदर्य और शब्दों का संस्कार ​सरला जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की उस शालीनता का प्रतिबिंब था, जिसे आज के दौर में ढूँढना कठिन है। सीधा पल्लू, माथे पर एक छोटी सी बिंदी और चेहरे पर वह ठहराव, जो दर्शकों को सहज ही अपना बना लेता था। उनके लिए समाचार पढ़ना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। जब वे स्क्रीन पर अवतरित होती थीं, तो ऐसा लगता था मानो परिवार का कोई सदस्य घर के बैठक में बैठकर देश-दुनिया का हाल सुना रहा हो। ​संयम की प्रतिमूर्ति ​1982 से समाचार वाचन की कमान संभालने वाली सरला जी ने कभी आवाज़ की तीव्रता से खबरों को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की। उनकी आवाज़ में वह गंभीरता थी, जो बिना चिल्लाए भी गहरा असर छोड़ती थी। ​"उनकी पत्रकारिता...

वंदे मातरम बिना किसी संसदीय कानून या संवैधानिक संशोधन के थोपा गया।

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1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1937 का समझौता ​ 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने यह निर्णय लिया था कि केवल पहले दो अंतरा ही 'राष्ट्रीय गीत' के रूप में गाए जाएंगे। ​यह निर्णय इसलिए लिया गया था क्योंकि बाद के अंतराओं में हिंदू देवियों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का आह्वान किया गया है, जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अन्य धर्मों के नागरिकों की मान्यताओं से टकरा सकता था। ​रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी केवल पहले दो अंतराओं को ही सर्वस्वीकार्य माना था। ​ 2. संवैधानिक और कानूनी तर्क ​अनुच्छेद 51A: संविधान के मौलिक कर्तव्यों में 'राष्ट्र ध्वज' और 'राष्ट्रगान' (जन गण मन) का सम्मान करने की बात है, लेकिन 'राष्ट्रीय गीत' (वंदे मातरम) का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया गया है। ​बिजोय इमैनुएल केस (1986): सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण उसे गाता नहीं है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। ​ जब राष्ट्रगान (जिसका उल्लेख संविधान में है) गाने के लिए मजबूर...

संरक्षणवाद से सक्रिय भागीदारी तक का सफर !

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  ​ भारत का व्यापारिक इतिहास स्वाधीनता के बाद "वस्तु विनिमय" (Barter trade) और सोवियत संघ के साथ सीमित व्यापार से शुरू हुआ था। अतीत में भारत अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीति अपनाता था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस हिचकिचाहट को छोड़कर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों के साथ जुड़ने का "साहसिक" निर्णय लिया है। ​वैश्विक व्यापार का बदलता परिदृश्य ​WTO की चुनौतियां: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद निपटान तंत्र के कमजोर होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आए तनाव के कारण अब बहुपक्षीय समझौतों के बजाय द्विपक्षीय FTA (मुक्त व्यापार समझौते) अधिक प्रभावी हो गए हैं। ​रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अब केवल कागजी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि लागत-लाभ (Cost-benefit) के व्यावहारिक आकलन पर अपनी विदेश नीति तय कर रहा है। ​भारत-अमेरिका समझौते के मुख्य लाभ ​निर्यात में वृद्धि: भारत ने 2024-25 में अमेरिका को 86.5 बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इस समझौते से उन वस्तुओं पर टैरिफ कम होगा जहां भारत की पकड़ मजबूत है (जैसे: जेनेरिक दवाएं, रत्न-आभूषण और विमान के पुर्जे)। ...

फिल्म समीक्षा: महाराज (2024)

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  ​ ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक आईना,  अंधभक्ति पर प्रहार   ! ​फिल्म 'महाराज' भारत के एक ऐसे काले अध्याय को उजागर करती है जहाँ धर्म की आड़ में सत्ता और वासना का खेल खेला गया। यह फिल्म 1862 के ऐतिहासिक 'बॉम्बे लिबेल केस' पर आधारित है, जो पत्रकार करसनदास मुलजी और एक ताकतवर धर्मगुरु के बीच की कानूनी लड़ाई थी। ​ कहानी का मुख्य आधार: फिल्म की कहानी 1860 के दशक के बॉम्बे के इर्द-गिर्द घूमती है। मुख्य पात्र करसनदास मुलजी (जुनैद खान) एक सुधारवादी पत्रकार हैं, जो तर्क और नैतिकता में विश्वास रखते हैं। उनकी टक्कर जदुनथजी महाराज (जयदीप अहलावत) से होती है, जो एक बेहद प्रभावशाली संप्रदाय के प्रमुख हैं। महाराज खुद को भगवान का प्रतिनिधि बताकर महिला अनुयायियों के साथ 'चरण सेवा' के नाम पर यौन शोषण करते हैं। जब करसनदास की अपनी मंगेतर इस कुप्रथा का शिकार होती है, तो वे इस व्यवस्था के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं। ​ फिल्म के मुख्य बिंदु: ​ अंधभक्ति पर प्रहार : फिल्म बखूबी दिखाती है कि कैसे श्रद्धा का दुरुपयोग करके मासूमों और उनके परिवारों का मानसिक शोषण किया जाता है। जैसा कि आपन...

न्याय की चौखट पर 'तालाबंदी': जब रक्षक ही बन जाएं व्यवस्था के लिए चुनौती !

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  "तारीख पर ताला" ! ​दानापुर (पटना) में न्याय की आस लेकर आने वाले फरियादियों के लिए यह हफ्ता किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं रहा। एक तरफ तारीखों का लंबा इंतजार और दूसरी तरफ बार-बार होने वाली कार्यबंदी। बार एसोसिएशन दानापुर द्वारा जारी यह ताजा पत्र (Ref No. 28) इसी अव्यवस्था की जलती हुई मशाल है। ​आखिर कब तक चलेगा यह 'हड़ताली ड्रामा'? ​हैरानी की बात है कि एक ही हफ्ते में छह बार कोर्ट का काम बाधित हुआ है। पत्र में "सुरक्षा की दृष्टि" का हवाला देते हुए आज 12 फरवरी से 15 फरवरी 2026 तक न्यायिक कार्यों से अलग रहने का निर्णय लिया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या सुरक्षा के नाम पर न्याय की प्रक्रिया को ही बंधक बना लेना उचित है? ​पीड़ित क्लाइंट: दूर-दराज से अपनी जमा-पूंजी खर्च कर आने वाले मुवक्किलों का क्या? उनकी तारीखें निकल जाती हैं, किराया बर्बाद होता है और न्याय और भी दूर हो जाता है। ​परेशान वकील और मुंशी: यह केवल व्यवस्था की हार नहीं है, बल्कि उन जूनियर वकीलों और मुंशियों की कमर तोड़ने वाला फैसला है जिनका घर दैनिक काम पर निर्भर करता है। ​सिस्टम की विफलता: यदि सुरक...

स्वार्थ से मानवता की ओर: एक वैचारिक यात्रा!

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  ​आज के प्रतिस्पर्धी युग में 'स्वार्थ' शब्द को अक्सर नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन क्या स्वार्थ पूरी तरह वर्जित होना चाहिए? चित्र में दिए गए विचार इस पर एक नई और गहरी रोशनी डालते हैं। ​१. स्वार्थ की प्रकृति: जोड़ना या तोड़ना? —मुद्दा यह नहीं है कि हम स्वार्थी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि हमारे स्वार्थ का परिणाम क्या है। ​ सकारात्मक स्वार्थ: यदि हमारा स्वार्थ हमें रिश्तों को बेहतर बनाने और समाज में जुड़ाव पैदा करने के लिए प्रेरित करता है, तो वह सृजनात्मक है। ​ नकारात्मक स्वार्थ: जब स्वार्थ रिश्तों की नींव कमजोर करने लगे और केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित हो जाए, तो वह विनाशकारी बन जाता है। ​२. वह सीमा जहाँ स्वार्थ 'मानवता' बन जाता है ​ मनुष्य को अपने लाभ की खोज वहां रोक देनी चाहिए जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है। ​"जिस दिन हम अपने लाभ की सीमा वहाँ रोक देंगे जहाँ से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है, उसी दिन स्वार्थ मानवता में बदल जाएगा।" ​यह पंक्ति सिखाती है कि आत्म-कल्याण तब तक उचित है जब तक वह पर-कल्याण में बाधक न बने। सहानुभूति और संवेदनशी...

भक्ति या विनाश: धार्मिक आड़ में बढ़ता नशे का मायाजाल!

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  ​भारतीय समाज में एक पुरानी कहावत प्रचलित है— "भांग मांगे दूध मलाई, गांजा मांगे घीउ।" यह कहावत इस भ्रम को पालती है कि गांजा या भांग का सेवन शरीर को बलवान बनाता है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। विज्ञान और वास्तविकता गवाह है कि नशा शरीर को बनाता नहीं, बल्कि 'गलाता' है। आज के समय में, विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच, नशा 'भक्ति' और 'चिल' करने का एक खतरनाक माध्यम बन चुका है। ​1. आस्था की आड़ में अधर्म ​अक्सर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर 'बम शंकर' के जयकारों के साथ गांजे की चिलम सुलगाई जाती है। लोग इसे भगवान शिव का प्रसाद मानकर जायज ठहराते हैं। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ब्रह्मांड के रचयिता को प्रसन्न करने के लिए किसी नशे की आवश्यकता है? ​पुराणों के अनुसार, शिव और आदि शक्ति ने पंचतत्वों का निर्माण जीवन को चलाने के लिए किया था, उसे नष्ट करने के लिए नहीं। जिसे लोग 'शिव की बूटी' कहते हैं, वह असल में चेतना को सुन्न करने का साधन है। सच्ची उपासना होश में रहकर की जाती है, बेहोशी में नहीं। धार्मिक स्थलों पर नशे का यह 'खुला खेल' न केवल...

तकनीकी संपन्नता और मानवीय संवेदनाओं का ह्रास !

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  ​आज के युग में तकनीकी संसाधनों की प्रचुरता ने ज्ञान के द्वार तो खोल दिए हैं, लेकिन मानवीय संबंधों की गहराई को सोख लिया है। "युवा वर्ग जानकारी से तो भरा है, पर भावनात्मक संचार से शून्य है" , आधुनिक समाज की एक गंभीर व्याधि की ओर इशारा करता है। ​1. सूचना का विस्फोट बनाम संवेदना का अभाव ​इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण आज की युवा पीढ़ी 'इंफॉर्मेशन ओवरलोड' (सूचना के अतिरेक) का शिकार है। उनके पास हर विषय पर डेटा है, लेकिन उस डेटा को संवेदना में बदलने का समय नहीं है। ​डिजिटल दीवार: भौतिक उपस्थिति की जगह इमोजी और टेक्स्ट मैसेज ने ले ली है, जिससे स्पर्श और स्वर की वह गर्माहट खत्म हो गई है जो रिश्तों को जोड़ती है। ​सृजनात्मकता पर चोट: जब मस्तिष्क केवल दूसरों द्वारा परोसी गई जानकारी को "कंज्यूम" करने में लगा रहता है, तो उसकी अपनी मौलिक सोच और सृजनात्मक क्षमता (Creative Ability) कुंद होने लगती है। ​2. उपदेश की निष्फलता  युवाओं को 'उपदेश' से नहीं सुधारा जा सकता। वे तकनीकी रूप से इतने जागरूक हैं कि वे किसी भी तर्क के नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव को पहले से जानते...

समझौते की प्रकृति: कूटनीति या दबाव?

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  ​1 ​भारत ने अमेरिकी टैरिफ के डर से रूस से सस्ता तेल खरीदने की अपनी संप्रभुता (Sovereignty) का त्याग किया है। ​अमेरिकी टैरिफ में जो कटौती की गई है, वह वास्तव में कोई 'तोहफा' नहीं बल्कि पूर्व में लगाए गए अनुचित टैरिफ की आंशिक वापसी है। ​डोनाल्ड ट्रंप की "अस्थिरता" इस समझौते को कभी भी खतरे में डाल सकती है, क्योंकि ट्रंप ने पहले भी दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ हुए समझौतों से हाथ पीछे खींचे हैं। ​2. दीर्घकालिक लाभ बनाम तात्कालिक नुकसान ​यह समझौता भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन (जैसे सेमीकंडक्टर और एआई) में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है। ​भारत अब केवल 'असेंबली' तक सीमित नहीं है, बल्कि इनोवेशन और अनुसंधान की ओर बढ़ रहा है। ​चंद्रशेखरन के अनुसार, एआई (AI) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत की बढ़त इस सौदे को भारत के पक्ष में मोड़ती है। ​3. एआई (AI) और मानव संसाधन की शक्ति ​संदेह: हालांकि भारत के पास लाखों स्टेम (STEM) स्नातक हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता पर सवाल हैं। ट्रंप की नीतियां भविष्य में भारतीय आईटी पेशेवरों (H-1B वीजा) के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती ...

विकास की कीमत: सांसों में घुलता धीमा जहर!

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  ​आज हम जिस 'आधुनिकता' और 'औद्योगिकीकरण' का उत्सव मना रहे हैं, उसकी एक भयावह कीमत हमारी सांसें चुका रही हैं। पिछले कुछ दशकों में वाहनों की बढ़ती संख्या और अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार ने पर्यावरण को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ हवा अब जीवनदायिनी नहीं, बल्कि विषाक्त हो चुकी है। ​ नीतिगत विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव ​यह एक कड़वी सच्चाई है कि आर्थिक विकास के आंकड़ों (GDP) को चमकाने की होड़ में पर्यावरण को हमेशा हाशिए पर रखा गया। जब तक नीतियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी और उद्योगों के लिए मानक केवल दिखावा होंगे, तब तक 'कार्बन उत्सर्जन' में कमी लाना एक काल्पनिक लक्ष्य ही बना रहेगा। ​ अदृश्य हत्यारा: वायु प्रदूषण ​ ​अस्पतालों में वायु प्रदूषण के कारण हृदय रोग, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। ​विडंबना यह है कि इन मौतों को 'वायु प्रदूषण-जनित' नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें सामान्य बीमारी के रूप में दर्ज किया जाता है। ​यही कारण है कि यह एक 'स्वास्थ्य संकट' होने के बावजूद आधिकारिक फाइलों में एक अदृश्य संकट बना हुआ है। जब तक हम मौ...

​संपतचक में सड़क निर्माण में धांधली का आरोप, मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी से की गई शिकायत !

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​पटना, 11 फरवरी 2026: मुख्यमंत्री ग्राम सम्पर्क योजना (NDB) के तहत पटना के संपतचक नगर परिषद क्षेत्र में बन रही सड़क के निर्माण में भारी अनियमितता और लूट-खसोट का मामला सामने आया है। ग्राम मनोहरपुर (कछुआरा) निवासी सुरेंद्र प्रसाद ने इस संबंध में मुख्यमंत्री बिहार और जिलाधिकारी पटना को पत्र लिखकर कार्य की जांच कराने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की मांग की है। ​मामला क्या है? ​शिकायतकर्ता के अनुसार, "कनौजिया कॉर्नर R.C.C. कलवर्ट से पप्पू चंद्रवंशी तक" (0.200 कि.मी.) सड़क का निर्माण 'माँ पार्वती बिल्डकॉन प्रा.लि.' द्वारा किया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में तकनीकी मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ​प्रमुख शिकायतें: ​घटिया सामग्री का प्रयोग: सड़क निर्माण में प्रयुक्त सामग्री प्राक्कलन (Estimate) के अनुसार नहीं है। ​तकनीकी खामियां: मिट्टी कार्य, WBM ग्रेड III और बिटुमेन (अलकतरा) की परत बिछाने में तकनीकी विवरणों की अनदेखी की जा रही है। ​शिकायत पर अनसुनी: स्थानीय नागरिकों द्वारा आपत्ति जताने पर ठेकेदार और संबंधित विभागीय कर्मी बात सुनने को तैयार नहीं हैं।...

भक्ति के सागर में डूबा बग्घा टोला : 24 घंटे के अखंड हरिकीर्तन से गूंज उठा बाबा बगेश्वर धाम ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  ​ पटना (जानीपुर): कहते हैं कि जहाँ प्रभु का नाम संकीर्तन होता है, वहाँ साक्षात ईश्वर का वास होता है। कुछ ऐसा ही नजारा पटना के जानीपुर स्थित ग्राम-बघवाटोला (पंचायत-कोरियावाँ) में देखने को मिल रहा है। यहाँ श्री श्री शिव परिवार के द्वितीय वार्षिकोत्सव के शुभ अवसर पर आयोजित 24 घंटे का कुण्डीय संकीर्तन क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। ​ वरिष्ठ नेताओं और ग्रामीणों का अनूठा संगम ​इस भव्य धार्मिक आयोजन की खास बात यह है कि यह राजद के वरिष्ठ नेता श्री हरियाणा यादव जी के पैतृक गांव में आयोजित हो रहा है। कार्यक्रम में उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने ग्रामीणों का उत्साह दोगुना कर दिया। उनके साथ ही शम्भू यादव और प्रोफेसर प्रसिद्ध कुमार , राजनाथ यादव जैसे गणमान्य व्यक्तियों ने भी शिरकत की और प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त किया। ​ कीर्तन मंडलियों ने बांधा समां ​10 फरवरी की सुबह 11:00 बजे से शुरू हुए इस अखंड हरिकीर्तन में आसपास के कई गांवों की प्रसिद्ध कीर्तन मंडलियों ने हिस्सा लिया। "हरे राम हरे कृष्ण" के महामंत्र से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। कीर्तन में मुख्य रूप से इन गांवों की मंडल...

RBI की नीति: दरें स्थिर, लेकिन क्या बाजार में पैसा ज्यादा है?

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  ​हाल ही में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी बैठक में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। बजट 2026-27 के ठीक बाद आई यह घोषणा आर्थिक स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही कुछ गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। ​1. यथास्थिति का तर्क (Status Quo) ​RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट में कोई बदलाव न करके एक सुरक्षित रास्ता चुना है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: ​नया डेटा आने का इंतज़ार: सरकार जीडीपी (GDP) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के लिए 'बेस ईयर' (आधार वर्ष) को बदलने वाली है। जब तक नए आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक दरों में बदलाव करना जोखिम भरा हो सकता था। ​महंगाई का लक्ष्य: मुद्रास्फीति फिलहाल 4% के लक्ष्य के दायरे में बनी हुई है, जिससे केंद्रीय बैंक को जल्दबाजी में दरें घटाने या बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। ​2. लिक्विडिटी (तरलता) का मुद्दा: जरूरत या ज्यादती? ​ ​अत्यधिक सरप्लस: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सिस्टम में औसत सरप्लस लिक्विडिटी पिछले वर्ष की तुलना में 117 गुना बढ़ गई है। ​चिंता: लेखक का तर्क है कि RBI "...

आप्रवासन और अमेरिकी अर्थव्यवस्था: एक आर्थिक विश्लेषण !

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  ​हालिया जनगणना डेटा और आर्थिक रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अमेरिका अपनी जनसंख्या वृद्धि में एक ऐतिहासिक गिरावट का सामना कर रहा है। जहाँ पहले विशेषज्ञों का मानना था कि अमेरिकी जनसंख्या 2081 तक कम नहीं होगी, वहीं वर्तमान अनुमानों के अनुसार यह गिरावट बहुत जल्द शुरू हो सकती है। ​ 1. जनसंख्या संकट और कार्यबल की कमी ​2024-2025 के बीच अमेरिकी जनसंख्या केवल 0.5% बढ़ी है। इस सुस्ती का मुख्य कारण 'शुद्ध अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन' (Net International Migration) में भारी कमी है। ​जनसांख्यिकीय असंतुलन: जन्म दर पहले से ही कम है। यदि आप्रवासन और कम होता है, तो कार्यबल में युवाओं की कमी हो जाएगी। ​आर्थिक प्रभाव: युवाओं की कमी का अर्थ है नौकरियों को भरने के लिए श्रमिकों का अभाव और सोशल सिक्योरिटी (Social Security) जैसे सरकारी कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए करदाताओं की कमी। ​ 2. राजकोषीय योगदान बनाम भ्रांतियाँ ​राजनीतिक बहसों में अक्सर आप्रवासियों को देश पर बोझ बताया जाता है, लेकिन डेटा इसके विपरीत कहानी पेश करता है: ​कैटो इंस्टीट्यूट (Cato Institute) की रिपोर्ट: 1994 से 2023 के बीच, आप्रवासिय...

शिक्षा जगत के एक युग का अंत: प्रो. (डॉ.) कौशल किशोर मंडल जी को भावभीनी श्रद्धांजलि !

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 हमें गर्व है कि इनकी सुपुत्री हमारे कॉलेजमें प्रोफेसर हैं। ​ "शब्दों में पिरोना कठिन है उस व्यक्तित्व को, जिसने अपना संपूर्ण जीवन ज्ञान की ज्योति जलाने में समर्पित कर दिया।" ​अत्यंत भारी मन से हमें यह साझा करना पड़ रहा है कि तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) के पूर्व प्रति कुलपति और प्रखर समाजवादी चिंतक प्रो. (डॉ.) कौशल किशोर मंडल अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से न केवल उनके परिवार, बल्कि समूचे शिक्षा जगत और बौद्धिक समाज में एक अपूरणीय शून्य पैदा हो गया है। ​एक गौरवशाली शैक्षणिक सफर ​डॉ. मंडल केवल एक पद का नाम नहीं थे, बल्कि वे अनुशासन और विद्वता के प्रतिमान थे। उनके करियर के कुछ मुख्य पड़ाव उनकी कर्मठता की कहानी कहते हैं: ​नेतृत्व: उन्होंने 12 दिसंबर 2004 से 11 दिसंबर 2007 तक TMBU के प्रति कुलपति के रूप में विश्वविद्यालय के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया। ​प्रशासनिक कुशलता: बीएनएमयू (BNMU) में सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया। ​संस्थानों से जुड़ाव: मधेपुरा के टीपी कॉलेज और वहां की मिट्टी से उनका गहरा लगाव था। ...

बिहार: न्याय की गुहार बनाम प्रतिशोध की गिरफ़्तारी !😢😢

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  ​बिहार की राजनीति में 'न्याय के साथ विकास' का नारा अब एक विडंबना की तरह लगने लगा है। 7 फरवरी 2026 की आधी रात को सांसद पप्पू यादव की गिरफ्तारी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी प्राथमिकताओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटनाक्रम केवल एक नेता की गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सत्ता जब असुरक्षित महसूस करती है, तो वह कानून को न्याय का औज़ार बनाने के बजाय प्रतिशोध का हथियार बना लेती है। ​ 31 साल पुराने मामले की 'सजगता' और वर्तमान का सन्नाटा ​सरकार की कार्यकुशलता पर सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है। जिस मामले में पप्पू यादव को आधी रात को गिरफ्तार किया गया, वह 31 साल पुराना है—किराए के मकान से जुड़ा एक विवाद। ​सवाल उठता है कि: क्या तीन दशकों से सो रहा प्रशासन अचानक इतना मुस्तैद हो गया कि बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के रात के 12 बजे कार्रवाई करना ज़रूरी हो गया? ​सच्चाई: यह 'मुस्तैदी' कानून के पालन से अधिक, सत्ता की खीझ को दर्शाती है। ​ नीट छात्रा कांड: न्याय कहाँ है? ​एक तरफ प्रशासन 31 साल पुराने छोटे से मामले में 'सुपर एक्टिव' ...

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: चुनौतियां और समाधान !

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  ​भारत वर्तमान में एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल का सामना कर रहा है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और बजट घोषणाओं ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में बढ़ती डिजिटल लत (Digital Addiction) और स्क्रीन से जुड़ी समस्याओं ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। ​1. मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता बोझ ​आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं: ​वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया की कुल आत्महत्याओं, अवसाद और नशे की लत के मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। ​युवाओं पर प्रभाव: 15 से 29 वर्ष की आयु के भारतीयों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण आत्महत्या है। ​आर्थिक नुकसान: WHO के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण भारत को लगभग $1.03 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है। ​इलाज का अंतर: लगभग 70% से 90% लोगों को जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और पेशेवरों की कमी के कारण उचित उपचार नहीं मिल पाता है। ​2. बुनियादी ढांचे की कमी ​भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी है। भारतीय मनोचिकित्सा जर्नल के अनुसार: ​भारत में प्रति 1,...

सचेत रहें: आपकी सुनने की क्षमता खतरे में है!

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​अक्सर हम बड़े संगीत समारोहों, रैलियों या तेज शोर वाले आयोजनों का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शोर आपके कानों को स्थायी रूप से बीमार कर रहा है? हालिया शोध और विशेषज्ञों की राय के अनुसार, तेज संगीत से होने वाला नुकसान आपकी जानकारी में आने से बहुत पहले ही शुरू हो जाता है। ​क्या है 'हिडन हियरिंग लॉस'? ​सामान्य तौर पर हम मानते हैं कि अगर हम धीमी आवाजें सुन पा रहे हैं, तो हमारे कान बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने कोक्लियर सिनैप्टोपैथी (Cochlear Synaptopathy) नामक स्थिति की पहचान की है, जिसे "छिपी हुई श्रवण हानि" कहा जाता है। ​नुकसान कहाँ होता है?: यह हमारे कान की कोशिकाओं और मस्तिष्क के बीच संपर्क बनाने वाले सिनैप्स (Synapses) को नुकसान पहुँचाता है। ​पकड़ में क्यों नहीं आता?: मानक ऑडियोोग्राम टेस्ट केवल ध्वनि की संवेदनशीलता (कितना धीमा आप सुन सकते हैं) को मापते हैं। चूंकि सिनैप्स का नुकसान शुरुआत में सुनने की क्षमता (Volume) को कम नहीं करता, इसलिए टेस्ट रिपोर्ट 'नॉर्मल' आती है, जबकि नुकसान शुरू हो चुका होता है। ​मुख्य लक्षण और प्रभाव ​यदि आप...

आयुष (AYUSH) क्षेत्र का कायाकल्प: बजट 2026-27 और भविष्य की राह !

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  ​हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट 2026-27 में आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। यह न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़े निवेश का संकेत है, बल्कि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति भी है। ​बजट की प्रमुख घोषणाएं और वित्तीय प्रोत्साहन ​सरकार ने आयुष क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए बजट आवंटन में भारी वृद्धि की है: ​कुल बजट: आयुष का कुल बजट बढ़कर ₹4,408 करोड़ हो गया है (जो पिछले वर्ष ₹3,992 करोड़ था)। ​राष्ट्रीय आयुष मिशन: इसके बजट में 66% की भारी वृद्धि की गई है, जिससे यह अब ₹1,300 करोड़ का हो गया है। ​अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA): एम्स (AIIMS) की तर्ज पर तीन नए संस्थानों की स्थापना की घोषणा की गई है, जो शोध, शिक्षण और उपचार में स्वर्ण मानक स्थापित करेंगे। ​भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता और वैश्विक पहुंच ​आयुष के लिए सबसे बड़ा 'गेम-चेंजर' भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA)...

भोजपुरी लोक कला का 'विद्रोही सितारा': राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा की अनकही दास्तां !

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  ​ लेखक: प्रो प्रसिद्ध कुमार। दिनांक: 8 फरवरी, 2026 श्रेणी: लोक संस्कृति / बिहार की विरासत ​आज बात उस कलाकार की, जिसकी कला की गूँज सात समंदर पार तक जानी चाहिए थी, लेकिन वह अपनों के बीच ही 'अजनबी' बनकर रह गया। यह कहानी है बक्सर के देकुली गाँव के उस ब्राह्मण बेटे की, जिसने समाज की रूढ़ियों को पैरों तले रौंदकर 'लौंडा नाच' के घुंघरू बाँध लिए। ​ कुलीनता की जंजीरें और कला का विद्रोह ​सन् 1942, जब पूरा देश महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के आह्वान पर सड़कों पर था, उसी दौर में बक्सर के इटाड़ी थाना स्थित देकुली गाँव में एक किशोर विद्रोह कर रहा था। वह विद्रोह किसी बाहरी सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस सामाजिक जंजीर के खिलाफ था जो कला को 'जाति' के चश्मे से देखती थी। ​ राम सिंगासन उर्फ चाईं ओझा । नाम तो था ब्राह्मणों वाला, पर दिल धड़कता था लोक कला के लिए। इंद्र देव ओझा (झक्कड़ बाबा) जैसे जमींदार और रसूखदार पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद चाईं ओझा ने 'नचनिया' बनना स्वीकार किया। ​ "बिना नाच और गान के चाईं जिंदा तो रह सकते थे...