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Showing posts from January, 2026

मंगल ग्रह की वधू और गोविंद बाबू का 'पुत्र-पुराण' ! ( कहानी )- प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  जब ईगो के आगे 'वर-वधू स्वयंवर' भी हो जाए भंग ! ​गोविंद बाबू हमारे कॉलेज के वे नियमित अतिथि हैं, जो अतिथि कम और 'पुत्र-प्रशस्ति' के गायक अधिक जान पड़ते हैं। उनके पास फुर्सत का अपार भंडार है और उस भंडार का एकमात्र उपयोग है—अपने सुपुत्र के लिए ऐसी वधू की खोज, जो शायद विधाता ने अभी तक बनाई ही नहीं। ​ कुलीनता का बोझ और ईगो का आकाश ​गोविंद बाबू के परिचय का दायरा उनके पद और प्रतिष्ठा से शुरू होकर उनके अहंकार पर जाकर समाप्त होता है। वे खुद बीडीओ के दामाद हैं, रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं, और नवादा-कौआकोल के जमींदार भी। पटना में मकानों की कतार है और संतान के नाम पर केवल एक 'पुत्र-रत्न'। ​उनकी बातों में बेटा एम्स (AIIMS) का 'पे-लेवल 11' वाला अधिकारी है, लेकिन वास्तविकता की परतों में झांकें तो मामला आउटसोर्सिंग और निजी क्षेत्र की धुंधली गलियों में खो जाता है। सरकारी नौकरी का दावा तो बस उनके ईगो को जिंदा रखने वाली एक ऑक्सीजन है। ​ भूगोल की बंदिशें और 'चांद-सितारों' की चाहत ​गोविंद बाबू का अहंकार भौगोलिक सीमाओं को भी नहीं बख्शता। उनके पास बिहार के उन जिलों की ...

स्मृतियों की पाथेय और विदाई की वेला: राजकीय मध्य विद्यालय गायघाट का एक स्वर्णिम अध्याय !

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  ​'चौदह वर्षों का शैक्षणिक वनवास' और स्नेह की अनमोल पूंजी ! ​आज राजकीय मध्य विद्यालय गायघाट, हरसिद्धि की हवाओं में एक अजीब सी भारीपन और आंखों में नमी है। आज हमारे प्रिय साथी, ओजस्वी शिक्षक श्री राजू प्रसाद जी अपनी गौरवशाली सेवा यात्रा को विराम देकर सेवानिवृत्त हो रहे हैं। 31 जनवरी 2026 की यह तिथि विद्यालय के इतिहास में एक भावुक मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है। ​सेवा का संकल्प और जन्मभूमि का मोह ​राजू जी की सेवा यात्रा किसी तपस्या से कम नहीं रही। अपनी जन्मभूमि पटना के मोह को त्यागकर, पूर्वी चम्पारण की इस मिट्टी को अपनी कर्मभूमि बनाना और यहाँ के बच्चों के भविष्य को संवारना उनके लिए एक 'शैक्षणिक वनवास' की तरह था। जैसे प्रभु राम ने वनवास को लोक कल्याण का मार्ग बनाया, वैसे ही राजू जी ने इन 14 वर्षों को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने में व्यतीत किया। ​निष्ठा और ईमानदारी का पर्याय ​एक शिक्षक के रूप में उन्होंने केवल पाठ्यपुस्तकें नहीं पढ़ाईं, बल्कि जीवन जीने के संस्कार रोपे। उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ऐसी थी कि विद्यार्थियों के लिए वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि मार्ग...

गरीबी का पैमाना ! प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र विभाग।

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  ​ 1. सरकारी दावा और आंकड़े ​आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, देश की सबसे निचली 5-10% आबादी के उपभोग व्यय (spending) में वृद्धि हुई है। सरकार का मानना है कि सब्सिडी, पेंशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और शिक्षा-स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च के कारण गरीबों की स्थिति बेहतर हुई है और उपभोग असमानता में कमी आई है। ​ 2. व्यय बनाम वास्तविक आय का संकट ​: क्या खर्च बढ़ने का अर्थ वास्तव में गरीबी कम होना है? ​महंगाई का प्रभाव: कई बार खर्च में बढ़ोतरी खुशी से नहीं, बल्कि बढ़ती महंगाई और जीवन की अनिवार्य जरूरतों के कारण मजबूरी में होती है। ​कर्ज का जाल: आय कम होने पर भी गंभीर जरूरतों के लिए गरीब परिवार बैंक या साहूकारों से कर्ज लेकर खर्च करते हैं, जिसे आंकड़ों में 'सम्पन्नता' मान लेना भ्रामक हो सकता है। ​ 3. विरोधाभास: मुफ्त राशन की योजना ​ यदि देश में गरीबी वास्तव में कम हो गई है, तो सरकार को आज भी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? इस योजना को 2024 से अगले पांच साल के लिए बढ़ाना धरातल पर गरीबी की निरंतरता को दर्शाता है। ​ 4. स्थायी समाधान की आवश्यकता ​ गरीबी को के...

आधुनिकता की भीड़ में खोता अकेलापन !

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  ​आज का युग सूचना और तकनीक का महासागर है। हमारे पास मनोरंजन के हजारों साधन हैं और दुनिया भर से जुड़ने के लिए उंगलियों के इशारे पर इंटरनेट है। लेकिन विडंबना यह है कि सुविधाओं के इस महासागर में आज का व्यक्ति पहले से कहीं अधिक अकेला और बेचैन है। ### बदलता सामाजिक ढांचा समय के साथ हमारे सामाजिक ताने-बाने में बड़े बदलाव आए हैं: ​लघु परिवार (Nuclear Families): संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवारों ने ले लिया है, जिससे बच्चों और बड़ों के बीच का वह भावनात्मक पुल टूट गया है जो पहले कहानियों और साझा समय से बनता था। ​औपचारिक रिश्ते: अब रिश्तों में वह आत्मीयता कम और औपचारिकता ज्यादा नजर आती है। लोग दिल से मिलने के बजाय 'स्टेटस' और 'दिखावे' को अधिक महत्व देने लगे हैं। ​संवाद बनाम संदेश ​ संवाद का स्थान संदेशों ने ले लिया है। पहले लोग घंटों बैठकर बातें करते थे, एक-दूसरे के चेहरे के भाव पढ़ते थे। आज हम एक ही घर में, एक ही सोफे पर बैठे होते हैं, लेकिन हमारी नजरें अपनी-अपनी मोबाइल स्क्रीन पर होती हैं। हम "बात" नहीं करते, बस "टेक्स्ट" करते हैं। इमोजीस ने असली मु...

बजट 2026: भारत की 3 मुख्य व्यापक आर्थिक चिंताएं !

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​ 1. नाममात्र जीडीपी (Nominal GDP) की सुस्त वृद्धि दर ​ बजट निर्माण के लिए 'वास्तविक जीडीपी' (Real GDP) के बजाय नाममात्र जीडीपी (Nominal GDP) अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि सरकार के राजस्व अनुमान इसी पर आधारित होते हैं। ​चुनौती: भारत की Nominal GDP वृद्धि दर में गिरावट देखी जा रही है। वित्त वर्ष 2026 के लिए यह लगभग 8% रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम है। ​प्रभाव: यदि Nominal GDP कम रहती है, तो सरकार का कर संग्रह (Tax collection) भी कम हो जाता है, जिससे राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। ​ 2. कमजोर कर उत्प्लावकता (Weak Tax Buoyancy) ​कर उत्प्लावकता वह अनुपात है जो बताता है कि जीडीपी में बदलाव के साथ कर राजस्व में कितना बदलाव आता है। ​चुनौती: कर संग्रह (विशेषकर कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत आयकर) बजट अनुमानों से कम रहा है। ​परिणाम: कर राजस्व में कमी के कारण सरकार को या तो बाजार से अधिक ऋण (Borrowing) लेना पड़ता है या फिर रक्षा, अनुसंधान (R&D) और सब्सिडी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में खर्च में कटौती करनी पड़ती है। ​ 3. निजी निवेश...

भारतीय अर्थव्यवस्था: वृद्धि की चुनौतियां और नीतिगत विरोधाभास !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र विभाग।

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  ​हालिया आर्थिक सर्वेक्षण भारत की विकास गाथा का एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है जो आशावाद और गंभीर संरचनात्मक चिंताओं के बीच झूल रहा है। एक ओर हम विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निवेश, विनिर्माण और मुद्रा स्थिरता जैसे मोर्चों पर कई लाल झंडे दिखाई दे रहे हैं। ​1. विकास दर और 'Viksit Bharat' का लक्ष्य ​FY27 के लिए 6.8-7.2% का अनुमानित GDP विकास दर, विकसित भारत (2047) के लिए आवश्यक 8.2% की निरंतर वृद्धि दर से काफी कम है। ​रियल बनाम नॉमिनल GDP का अंतर: 7.4% रियल GDP और 8% नॉमिनल GDP के बीच का मात्र 0.6% का अंतर (GDP Deflator) यह संकेत देता है कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति अत्यंत कम या नकारात्मक स्तर पर है। यह उत्पादकों के लिए चिंताजनक है क्योंकि कम 'प्राइसिंग पावर' उनके मुनाफे को सीमित करती है। ​डॉलर टर्म्स में विकास: यदि नॉमिनल ग्रोथ 8% है और रुपया 6.5% गिरता है, तो वैश्विक संदर्भ में हमारी क्रय शक्ति और अर्थव्यवस्था का आकार बहुत धीमी गति से बढ़ता है। यह 'मिडिल-इनकम ट्रैप' की ओर इशारा करता ह...

सामाजिक सुरक्षा: अटल पेंशन योजना !

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  ​भारत के असंगठित क्षेत्र के श्रमिक देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी होने के बावजूद यह वर्ग बुढ़ापे में सबसे अधिक असुरक्षित है। ​ प्रमुख बिंदु और सामाजिक विश्लेषण ​असंगठित क्षेत्र की व्यापकता: भारत के कुल कार्यबल का लगभग 85% से 93% हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। इसमें मजदूर, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले शामिल हैं, जिन्हें नौकरी की सुरक्षा, चिकित्सा सुविधा (ESI) या भविष्य निधि (PF) जैसे लाभ नहीं मिलते। ​योजना का विस्तार: केंद्र सरकार ने इस योजना को वर्ष 2030-31 तक जारी रखने का निर्णय लिया है। यह दर्शाता है कि सरकार दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। ​आर्थिक सुरक्षा का आधार: 60 वर्ष की आयु के बाद 1,000 से 5,000 रुपये तक की गारंटीकृत मासिक पेंशन का प्रावधान है। यह राशि व्यक्ति द्वारा किए गए अंशदान (Contribution) पर निर्भर करती है। जनवरी 2026 तक लगभग 8.66 करोड़ लोग इससे जुड़ चुके हैं। ​ चुनौतियां और सामाजिक प्रभाव ​असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए बुढ़ापे में पारिवारिक उपेक्षा एक गंभीर सामाजिक चुनौती है। यह योजना उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर सम्...

श्रम उत्पादकता में सुधार की चुनौती !

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​ 1. वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति भारत की श्रम उत्पादकता G-20 देशों में सबसे कम है। ​तुलना: जहाँ भारत की प्रति घंटे उत्पादकता मात्र 8 डॉलर है, वहीं लक्जमबर्ग (143), नॉर्वे (93) और सिंगापुर (74) इससे कहीं आगे हैं। ​कार्य अवधि: भारतीय श्रमिक सप्ताह में 46-48 घंटे काम करते हैं (जो चीन और जापान से अधिक है), लेकिन कम उत्पादकता के कारण वैश्विक बाजार में भारत बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से भी पिछड़ रहा है। ​ 2. नए श्रम सुधार: एक ऐतिहासिक कदम ​ सरकार ने 29 जटिल पुराने कानूनों को समाहित कर 4 नए श्रम कोड बनाए हैं: ​वेतन संहिता (2019) ​औद्योगिक संबंध संहिता (2020) ​सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) ​व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियाँ संहिता (2020) ​ये सुधार अनुपालन को सरल बनाने, परिभाषाओं के मानकीकरण और तकनीक के बेहतर उपयोग पर केंद्रित हैं। ​ 3. सुधारों के मुख्य लाभ ​व्यापार में सुगमता: 1436 प्रावधानों और दर्जनों फॉर्मों के बोझ को कम कर 'एक पंजीकरण, एक लाइसेंस और एक रिटर्न' की व्यवस्था की गई है। ​श्रमिक कल्याण: गिग इकोनॉमी के श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र को पहली बार सा...

समाज और परिवार: व्यक्तित्व का असली दर्पण !

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  ​अक्सर हम दुनिया को बदलने की चाह में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हम उन लोगों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमारे संसार की नींव रखी है—हमारा परिवार। समाज सेवा एक महान कार्य है, लेकिन यदि वह निजी जीवन की खोखली नींव पर टिकी हो, तो उसकी चमक फीकी पड़ जाती है। ​1. बुनियाद की मजबूती: परिवार ​जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष को सहारा उसकी जड़ों से मिलता है, उसी प्रकार एक व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक संबल उसके परिवार से प्राप्त होता है। यदि हम अपने माता-पिता, जीवनसाथी या बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को 'निष्ठा' से नहीं निभाते, तो हमारा सामाजिक व्यक्तित्व केवल एक मुखौटा बनकर रह जाता है। ​2. बाहरी दुनिया बनाम आंतरिक सत्य ​छवि बनाना आसान है, लेकिन चरित्र निभाना कठिन। यदि हमारे रिश्तों में प्रेम, विश्वास और समर्पण की कमी है, तो समाज के लिए किया गया हर दान या सेवा एक 'छलावा' है। बाहरी प्रशंसा बटोरना सरल है, लेकिन अपनों की नजरों में सम्मान पाना ही वास्तविक सफलता है। ​3. संतुलन ही समाधान है ​समाज सेवा और पारिवारिक दायित्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। ​सच्ची सेवा: वह है जो ...

बेटियों की सुरक्षा और संवाद: केवल कानून नहीं, सामाजिक बदलाव की आवश्यकता !

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  ​आज के दौर में जब हम विकास की ऊंचाइयों को छूने का दावा करते हैं, तब भी बेटियों की सुरक्षा एक गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि कड़े कानून बना देने से समाज सुरक्षित हो जाएगा, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। ​1. कानून से आगे: प्रशासनिक और सामाजिक प्रतिबद्धता ​लड़कियों की सुरक्षा केवल पुलिस या अदालतों का विषय नहीं है। यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक चेतना का मिला-जुला परिणाम है। जब तक समाज का हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक बेहतरीन से बेहतरीन सरकारी योजनाएं भी कागजों तक ही सीमित रहेंगी। कानूनों का सही तरीके से क्रियान्वयन और उनका उचित उपयोग सुनिश्चित करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। ​2. डर पर जीत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ​अक्सर देखा जाता है कि घरों में बेटों को अपनी बात रखने की जितनी आजादी होती है, बेटियों को उतने ही संकोच और भय के साये में रहना पड़ता है। ​समान अधिकार: जिस प्रकार एक बेटा बिना किसी झिझक के अपनी बात कहता है, वही अधिकार एक बेटी को भी मिलना चाहिए। ​बिना शर्त समर्थन: बेटियों को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे अपनी बात...

अहं का खंजर: एक अधूरी विदाई ! ( कहानी )

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​पटखौली का रहने वाला शहबाज, जिसे लोग 'जान मोहम्मद' भी कहते थे, जब सेवरही के दुबौली गांव की ओर बढ़ा, तो उसके कदम प्यार की उम्मीद से नहीं, बल्कि एक अजीब से अधिकार और दबे हुए गुस्से से भरे थे। उसकी शादी राबिया से हुई थी, लेकिन यह रिश्ता प्रेम की नींव पर नहीं, बल्कि डर और कलह की दीवारों पर खड़ा था। ​राबिया पिछले एक महीने से अपने मायके में थी। वह विदाई तो चाहती थी, लेकिन उस घर में नहीं जहाँ सम्मान की जगह मारपीट और सुकून की जगह सिसकियाँ मिलती थीं। शहबाज के लिए राबिया एक जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि एक ऐसी संपत्ति थी जिसे वह अपनी मर्जी से हांकना चाहता था। ​बुधवार की दोपहर जब शहबाज दुबौली पहुँचा, तो घर के आँगन में हवा भारी थी। उसने राबिया की विदाई की मांग की। राबिया के पिता अमीन और माँ आयशा की आँखों में अपनी बेटी के शरीर पर पड़े पुराने नीले निशानों का खौफ तैर गया। उन्होंने ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "जब तक तुम अपनी आदतें नहीं सुधारते और राबिया को मारने-पीटने का सिलसिला बंद नहीं करते, हम उसे विदा नहीं करेंगे।" ​यही वह क्षण था जहाँ एक 'पति' का अहं एक 'अपराधी' की सनक मे...

उपहार: निस्वार्थ भावना और जीवन की अनकही पूर्णता!

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​ मानव जीवन संबंधों की एक जटिल और सुंदर बुनावट है। इन संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में 'उपहारों' का बड़ा महत्व रहा है। अक्सर हम अपने जीवन के खास लोगों को ही कुछ भेंट देना पसंद करते हैं। लेकिन क्या उपहार का अर्थ केवल वस्तु का आदान-प्रदान है? असल में, उपहार देने के पीछे की भावना ही उसकी वास्तविक कीमत तय करती है। ​निस्वार्थता का सौंदर्य ​आमतौर पर हम जब किसी को कुछ देते हैं, तो उसके पीछे कोई अपेक्षा नहीं होती। विशेषकर जब हम अपने प्रियजनों को कुछ भेंट करते हैं, तो हमारा एकमात्र उद्देश्य उनकी मुस्कुराहट होती है। 'बिना कुछ पाने की इच्छा के देना' ही वह गुण है जो एक साधारण वस्तु को 'स्मृति' में बदल देता है। यह निस्वार्थ भाव हमारे चरित्र की गहराई को दर्शाता है और समाज में निस्वार्थ प्रेम की नींव रखता है। ​जब जीवन हमें 'नवाज़ता' है जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब हमारे द्वारा दिए गए प्रेम या उपहार के बदले हमें कुछ ऐसा प्राप्त होता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। यह 'रिटर्न गिफ्ट' हमेशा भौतिक नहीं होता। यह किसी की दुआ, एक गहरा सम्मान, या विपरीत परिस्थ...

आर्थिक असमानता: विलासिता बनाम बुनियादी जरूरतें !

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  ​वर्तमान समाज में बढ़ती आर्थिक खाई और नीतिगत विफलताओं का एक संक्षिप्त विश्लेषण है। ​ 1. दो भारत की तस्वीर (The Paradox) ​आज हमारी अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास दिख रहा है। जहाँ एक तरफ खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) के कारण आम आदमी अपनी थाली से दाल और सब्जियां कम करने पर मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ लक्जरी वस्तुओं (Luxury Goods) की रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। यह दर्शाता है कि समाज का आर्थिक संतुलन बिगड़ चुका है। ​ 2. 'रिसाव के सिद्धांत' की विफलता (Failure of Trickle-down Theory) ​पिछले कुछ दशकों में भारत ने जिस आर्थिक ढांचे को अपनाया, वह 'रिसाव के सिद्धांत' (Trickle-down Theory) पर आधारित था। ​सिद्धांत: यदि हम बड़े निगमों और उच्च वर्ग को अमीर बनाएंगे, तो उसका लाभ धीरे-धीरे नीचे के स्तर तक पहुँचेगा। ​हकीकत: डेटा बताते हैं कि धन का संचय ऊपर ही रह गया (Wealth Concentration), और निचले स्तर तक इसका लाभ उस गति से नहीं पहुँचा जिसकी उम्मीद थी। ​ 3. नीतिगत और कर-ढांचा (Policy and Tax Structure) ​हमारी नीतियों और कर-प्रणाली (Tax System) में कुछ ऐसी खामियां हैं जो इस अंतर को...

उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का प्रश्न और यूजीसी के नए दिशा-निर्देश: एक विश्लेषण !

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  ​ हाल के दिनों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लाए गए 'समता' (Equity) संबंधी प्रावधानों को लेकर समाज में एक बहस छिड़ गई है। कुछ वर्ग इसे "सवर्ण विरोधी" करार दे रहे हैं, लेकिन क्या यह विरोध तथ्यों पर आधारित है या केवल पूर्वाग्रहों का परिणाम? इस विषय की गहराई में जाने के लिए उन परिस्थितियों को समझना अनिवार्य है, जिन्होंने इन नियमों को जन्म दिया। ​1. परिसर की त्रासदी: आँकड़े और वास्तविकता ​केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आँकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। पिछले पाँच वर्षों में IIT, IIM और अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में लगभग 100 छात्रों ने आत्महत्या की है। ​ चिंताजनक तथ्य: इन आत्महत्याओं में से लगभग सभी छात्र अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), ओबीसी (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों से थे। ​यह आँकड़ा महज संख्या नहीं है, बल्कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों की आंतरिक कार्यप्रणाली और वहाँ व्याप्त सामाजिक वातावरण पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। ​2. न्यायपालिका का हस्तक्षेप और पृष्ठभूमि ​हैदराबाद विश्वविद्यालय के रोहित वेमुला और मुंबई की डॉ. पायल ...

भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता: 'री-ग्लोबलाइजेशन' की नई लहर

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  ​वर्ष 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं का समापन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि खंडित होती वैश्विक व्यवस्था में एक 'रणनीतिक हस्तक्षेप' है। ​ मुख्य बिंदु: ​रणनीतिक महत्व: वर्तमान में दोनों पक्षों के बीच लगभग $135 बिलियन का व्यापार होता है। यह समझौता भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और आपूर्ति श्रृंखला के झटकों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूती प्रदान करेगा। ​परस्पर लाभ: ​यूरोप के लिए: उत्पादन नेटवर्क में 'अति-एकाग्रता' (over-concentration) के जोखिम को कम करने और भारत जैसे बड़े बाजार में पैठ बनाने का अवसर। ​भारत के लिए: उच्च आय वाले बाजारों तक तरजीही पहुंच और तकनीकी स्रोतों के लिए कुछ सीमित देशों पर निर्भरता कम करना। ​प्रमुख क्षेत्र: इस समझौते से विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोटिव पार्ट्स, इंजीनियरिंग सामान, डिजिटल सेवाओं और कपड़ा उद्योग (Textiles) को बड़ा लाभ मिलेगा। विशेषकर कपड़ा क्षेत्र में भारत अब बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के साथ बराबरी की प्रतिस्पर्धा कर सक...

महाराष्ट्र की राजनीति के एक युग का अंत: अजित पवार का दुखद निधन !😢😢

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  ​आज महाराष्ट्र ने अपना एक कद्दावर नेता और विकास पुरुष खो दिया है। बारामती के अपने 'दादा' के रूप में पहचाने जाने वाले अजित पवार अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार सुबह बारामती में हुए एक भीषण विमान हादसे ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया है। ​अजित पवार अपनी प्रशासनिक पकड़ और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। मुंबई से अपने कार्यक्षेत्र बारामती की ओर जा रहे उनके विमान (VT-SSK) का क्रैश होना न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि समूचे महाराष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है। विमान में उनके साथ सवार अन्य चार लोगों का भी इस हादसे में निधन हो गया, जो अत्यंत पीड़ादायक है। ​राजनीति के मैदान में उनकी सक्रियता और जनसेवा के प्रति उनका समर्पण हमेशा याद रखा जाएगा। महाराष्ट्र उनके योगदान को कभी नहीं भूलेगा। भावभीनी श्रद्धांजलि।

भारतीय रुपये की गिरावट: आर्थिक संकट नहीं, कूटनीतिक चुनौती !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र विभाग।

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  भारतीय रुपये के मूल्य में हालिया गिरावट (अप्रैल 2025 से लगभग 6%) बुनियादी आर्थिक कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी व्यापार नीतियों का परिणाम है। ​1. सुदृढ़ आर्थिक आधार बनाम मुद्रा गिरावट ​भारत के आर्थिक संकेतक वर्तमान में सकारात्मक हैं: ​विकास दर (Growth Rate): 7.4\% का अनुमान। ​मुद्रास्फीति (Inflation): RBI के लक्ष्य से नीचे (1.33\%) जो पश्चिमी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है। ​चालू खाता घाटा - GDP का मात्र 0.76\%, जो पिछले वर्ष (1.35\%) की तुलना में काफी सुधरा है। ​इन मजबूत आंकड़ों के बावजूद रुपये का गिरना यह दर्शाता है कि समस्या घरेलू अर्थतंत्र में नहीं, बल्कि बाहरी कारकों में है। ​2. 'विलेन' कौन? पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflow) ​रुपये की कमजोरी का मुख्य कारण व्यापार घाटा नहीं, बल्कि विदेशी पूंजी का तेजी से बाहर निकलना है। इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी शुल्क (जैसे 50% आयात शुल्क) और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त प्रतिबंधों की चेतावनी है। इन कूटनीतिक दबावों ने निवेशकों में डर पैदा क...

सात बेटियों का 'सप्तऋषि': एक साधारण मिल मालिक की असाधारण जीत !

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  ​सारण जिले के एकमा ब्लॉक के एक छोटे से गांव में रहने वाले कमल सिंह की पहचान आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था। एक साधारण आटा मिल चलाने वाले कमल सिंह के घर जब एक के बाद एक सात बेटियों ने जन्म लिया, तो समाज ने उन्हें 'बेचारा' मान लिया था। ​1. सामाजिक तानों को बनाया 'ईंधन' ​ग्रामीण परिवेश में सात बेटियों का पिता होना अक्सर सहानुभूति या मजाक का विषय बन जाता है। कमल सिंह को भी ताने सुनने पड़े कि "बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा?" या "इतनी शादियां कैसे होंगी?"। लेकिन कमल सिंह ने इन तानों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी बेटियों की सफलता का 'ईंधन' बना लिया। ​2. सुबह 4 बजे का अनुशासन ​संसाधन बेहद सीमित थे, लेकिन इरादे फौलादी। कमल सिंह का दिन सुबह 4 बजे शुरू होता था। ​फिजिकल ट्रेनिंग: वे खुद बेटियों के साथ मैदान में उतरते, उन्हें दौड़ लगवाते और शारीरिक रूप से मजबूत बनाते। ​पढ़ाई की निगरानी: रात 11 बजे तक जब तक आखिरी बेटी अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेती, कमल सिंह उनके साथ जागते थे। ​त्याग: मिल से होने वाली मामूली कमाई का एक-एक...

भारत को 'पैक्स सिलिका' के उच्च मंच पर क्यों शामिल होना चाहिए?

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  ​उन्नत तकनीकों के वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका और रणनीतिक निर्णयों पर चर्चा है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: ​ 1. अवसर और चुनौतियाँ ​वर्तमान में उन्नत तकनीकों पर वैश्विक सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। भारत इस नियम-निर्धारण चरण से बाहर रहने का जोखिम नहीं उठा सकता। भारत को अमेरिका के नेतृत्व वाली 'पैक्स सिलिका' पहल में शामिल होने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ​ 2. संप्रभुता बनाम कूटनीति ​रणनीतिक स्वायत्तता: नई दिल्ली में इस पहल को लेकर संप्रभुता संबंधी चिंताएं हैं, क्योंकि भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है। ​राजनयिक परिणाम: हालांकि, इस निमंत्रण को ठुकराने से अमेरिका के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है, जिससे उच्च शुल्क या व्यापार सौदों में बाधा जैसे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ​ 3. निर्भरता को कम करना भारत को केवल एक निर्भरता (जैसे बीजिंग के खनिज प्रतिबंध) को दूसरी निर्भरता से नहीं बदलना चाहिए। इसके बजाय, भारत को: ​सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और AI पर अपनी घरेलू औद्योगिक नीति को मजबूत करना चाहिए। ​फ्रांस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे विभिन्न भागीदारो...

भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण: एक आर्थिक विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ,अर्थशास्त्र, विभाग।

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  ​1. क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय भिन्नता -भारत एक 'असममित' जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर रहा है। जहाँ केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य 'एजिंग स्टेट्स' की श्रेणी में आ रहे हैं, वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अभी भी अपने 'जनसांख्यिकीय लाभांश' के दौर में हैं। ​2. राजकोषीय चुनौतियाँ और आरबीआई का परामर्श ​भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्यों के लिए भिन्न राजकोषीय रणनीतियाँ सुझाई हैं: ​एजिंग स्टेट्स: उन्हें अपनी सब्सिडी को 'रेशनलाइज़' करने की सलाह दी गई है ताकि बढ़ते पेंशन बोझ और स्वास्थ्य व्यय को संभाला जा सके। ​युवा राज्य: उन्हें 'मानव पूंजी' यानी शिक्षा और कौशल में भारी निवेश करने की आवश्यकता है। ​3. दक्षिणी राज्यों की आर्थिक 'दोहरी मार' ​दक्षिणी राज्यों को अपनी सफलता की आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है: ​राजकोषीय हस्तांतरण : वित्त आयोग के फॉर्मूले में जनसंख्या को अधिक महत्व दिए जाने के कारण इन राज्यों को केंद्रीय करों में कम हिस्सा मिल सकता है। ​राजनीतिक प्रतिनिधित्व: आगामी 'डिलिमिटेशन' (परिसीमन) अभ्यास से उनकी संसदीय सीटों में कमी आने की स...

मार्क टुली: भारतीय जनमानस की आवाज़ और पत्रकारिता का एक युग !

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  ​भारतीय पत्रकारिता के आकाश में मार्क टुली एक ऐसा नाम थे, जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों से लेकर गाँव की चौपालों तक समान रूप से प्रामाणिक मानी जाती थी। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में जब सूचना के साधन सीमित थे, तब बीबीसी रेडियो पर उनकी रिपोर्टिंग भारत के लिए 'सत्य की कसौटी' हुआ करती थी। ​बीबीसी का वह दौर और मार्क टुली ​मार्क टुली का भारत से गहरा नाता था। 1935 में कोलकाता में जन्मे टुली ने अपने करियर का लंबा समय बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो चीफ के रूप में बिताया। वह दौर ऐसा था जब लोग रेडियो सेट के पास कान लगाकर बैठते थे ताकि राजनारायण भिसारिया, अचला शर्मा और मार्क टुली जैसे दिग्गजों से दुनिया का हाल जान सकें। टुली की खासियत उनकी निष्पक्षता और भारतीय समाज की गहरी समझ थी। उन्होंने आपातकाल, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को न केवल कवर किया, बल्कि उनका बारीकी से विश्लेषण भी किया। ​"अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल" – एक अनिवार्य दस्तावेज़ ​सतीश जैकब के साथ लिखी गई उनकी यह पुस्तक भारतीय राजनीति के सबसे उथल-पुथल भरे दौर का जीवंत...

डिग्रियों की भीड़ और कौशल का अकाल: हमारी शिक्षा व्यवस्था का स्याह सच !

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  ​आज के दौर में भारत एक अजीबोगरीब विरोधाभास से जूझ रहा है। एक तरफ लाखों युवा हाथों में ऊँची डिग्रियां लिए रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ उद्योग जगत 'कुशल प्रतिभाओं' की कमी का रोना रो रहा है। यह स्थिति हमारी शैक्षणिक व्यवस्था की जड़ों में छिपे गहरे संकट को उजागर करती है। ​1. किताबी ज्ञान बनाम व्यावहारिक कौशल ​हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी 'मैकाले' के उस ढांचे से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है, जिसका उद्देश्य केवल क्लर्क पैदा करना था। कॉलेजों में आज भी वही पुराना पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है जो दशकों पहले अप्रासंगिक हो चुका है। जब एक छात्र कैंपस से बाहर कदम रखता है, तो उसे पता चलता है कि उसने जो पढ़ा, वह आधुनिक बाजार की जरूरतों (AI, डेटा साइंस, या आधुनिक प्रबंधन) के सामने नगण्य है। ​2. 'डिग्री फैक्ट्री' बनते विश्वविद्यालय ​प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ दें, तो देश के अधिकांश निजी और सरकारी कॉलेज केवल 'डिग्री बांटने वाली फैक्ट्रियां' बनकर रह गए हैं। शिक्षा अब एक व्यापार है जहाँ फोकस गुणवत्ता (Quality) पर नहीं, बल्कि संख्या (Quantity) पर है। लाखों ...

कैंपस में 'कलरब्लाइंड' होने का ढोंग नहीं, समानता का 'कवच' है नया यूजीसी रेगुलेशन !

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  ​सामाजिक न्याय बनाम यथास्थिति: क्या समानता का अधिकार सिर्फ कागजी है? ​उच्च शिक्षा के गलियारों में अक्सर 'मेरिट' की आड़ में उन अदृश्य दीवारों को अनदेखा कर दिया जाता है, जो हाशिए के समुदायों (SC, ST, OBC, और दिव्यांगों) के सामने खड़ी होती हैं। यूजीसी द्वारा अधिसूचित 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' इसी भेदभाव को जड़ से मिटाने का एक साहसी कदम है। हालांकि, इसे 'सामान्य वर्ग के खिलाफ हमला' बताकर जो विरोध किया जा रहा है, वह न केवल अतार्किक है, बल्कि सामाजिक विकास की गति को रोकने वाला है। ​समान अवसर केंद्र (EOC): समावेशिता का नया ब्लूप्रिंट ​नए नियमों के तहत हर संस्थान में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) और समानता समितियों का गठन अनिवार्य है। इसकी बनावट में ही इसकी शक्ति निहित है: ​विविध प्रतिनिधित्व: समिति में वंचित वर्गों और महिलाओं की अनिवार्य उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि शिकायतों की सुनवाई केवल एकतरफा दृष्टिकोण से न हो। ​होलिस्टिक सपोर्ट: यह केंद्र केवल शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों को वित्तीय, शैक्षणिक...

राम लखन सिंह यादव कॉलेज में धूमधाम से मना 77वां गणतंत्र दिवस, 52 कर्मियों को मिला नियुक्ति पत्र!

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  ​ पटना, अनिसाबाद: राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनिसाबाद में 77वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में कॉलेज के सचिव डॉ. ब्रजभूषण सिंह ने ध्वजारोहण किया और तिरंगे को सलामी दी। ​ संविधान की महत्ता पर जोर अपने संबोधन में डॉ. ब्रजभूषण सिंह ने भारतीय संविधान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संविधान ही हमारे अधिकारों और कर्तव्यों का मार्गदर्शक है। उन्होंने कॉलेज परिवार को एकजुटता का संदेश देते हुए कहा कि संस्थान की बेहतरी के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने आपसी सद्भाव और एक-दूसरे को बिना शर्त सम्मान देने की आवश्यकता पर भी बल दिया। ​ नियुक्ति पत्रों का वितरण गणतंत्र दिवस के इस विशेष अवसर पर कॉलेज प्रशासन द्वारा कुल 50 शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र प्रदान किए गए। इनमें 30 सहायक प्राध्यापक और 22 शिक्षकेत्तर कर्मचारी शामिल हैं। विशेष उल्लेखनीय है कि इन 30 सहायक प्राध्यापकों में 11 नए चेहरे हैं, जबकि 19 पूर्व से ही कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे थे। इन सभी नियुक्तियों को समाचार पत्रों में विज्ञापन और साक्षात्कार की पार...

शीर्षक: आज का यथार्थ ! ( कविता ) -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  ​आज खड़ा है सच सहमा सा, सीना ताने झूठ खड़ा, ईमानों की बस्ती में अब, संकट देखो बहुत बड़ा। ​ निष्ठावान खड़ा है दुखी, और ईमानदार को कष्ट यहाँ, मेहनतकश तो भूखा सोता, मालामाल है भ्रष्ट यहाँ। कौड़ी-कौड़ी को तरस रहा, जो करता कठिन परिश्रम है, मौज उड़ाते वे अपराधी, जिनके दिल में न कोई भ्रम है। ​वही पेड़ अब छाया देता, जिसके बीज हुए हैं नष्ट, परिश्रमी ही आज जगत में, सबसे ज्यादा झेलें कष्ट। लुटेरे देखो मस्त खड़े हैं, जैसे उन पर कोई आंच नहीं, पर बेकसूर की आँखों में तो, बचता कोई भी ख्वाब नहीं। ​ लोग भले ही आँखें मूँदें, पर सब कुछ बिल्कुल स्पष्ट है, सच तो मुँह को छुपा रहा है, चारों ओर बस कपट है। मेहनतकश ही त्रस्त खड़ा है, अपराधी यहाँ आज़ाद हैं, कैसी ये रीत चली दुनिया में, जहाँ सज्जन ही बर्बाद हैं।

तेजस्वी यादव बने RJD के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष: पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर धारदार बनाने की नई मुहिम शुरू !

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  ​ पटना | 25 जनवरी 2026 ​राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में एक नए युग की शुरुआत हो गई है। पार्टी के दिग्गज नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी प्रसाद यादव को सर्वसम्मति से राष्ट्रीय जनता दल का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह निर्णय पटना में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया। ​लालू प्रसाद यादव ने सौंपा कमान का 'प्रमाण पत्र' ​बैठक के दौरान एक भावुक और ऐतिहासिक पल तब आया जब राजद सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद यादव ने स्वयं तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का प्रमाण पत्र सौंपा। तेजस्वी जी ने अपने पिता और राजनीतिक गुरु लालू प्रसाद जी का आशीर्वाद लिया, जो पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। ​"संगठन बनेगा और भी मजबूत और धारदार" - एजाज अहमद ​बिहार प्रदेश राजद के प्रवक्ता एजाज अहमद ने इस नियुक्ति पर हर्ष व्यक्त करते हुए तेजस्वी यादव को बधाई दी। उन्होंने कहा: ​"तेजस्वी प्रसाद यादव के कार्यकारी अध्यक्ष बनने से पार्टी के संगठन को न केवल मजबूती मिलेगी, बल्कि इसे राष्ट्रीय स...

बिहार के क्षितिज पर 'तेजस्वी' सूर्य: सामाजिक न्याय की विरासत और युवा संकल्प ! प्रो प्रसिद्ध कुमार ।

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  ​बिहार की राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सदियों से दबे-कुचले समाज की हुंकार रही है। इस हुंकार को स्वर दिया लालू प्रसाद यादव ने, और आज उसी मशाल को थामकर एक युवा नेतृत्व नए इतिहास की इबारत लिख रहा है। ​विरासत: संघर्ष की कोख से उपजा विश्वास ​कल्पना मात्र से अंतर्मन सिहर उठता है कि यदि भारतीय राजनीति के पटल पर लालू प्रसाद यादव जैसा व्यक्तित्व न होता, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति आज भी अपमान और अभाव की बेड़ियों में जकड़ा होता। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि 'गरीबों की मुखर जिह्वा' बनकर उभरे। ​उन्होंने सत्ता के गलियारों के द्वार उन लोगों के लिए खोल दिए, जिन्होंने कभी संसद या विधानसभा की चौखट लांघने का स्वप्न भी नहीं देखा था। जिसे लोग 'वोट' समझते थे, लालू जी ने उसे 'चेतना' बना दिया। हालांकि, समय-समय पर धार्मिक आडंबरों और षड्यंत्रों के द्वारा इस चेतना को कुंद करने के प्रयास हुए, परंतु लोक-शक्ति की जड़ें आज भी अडिग हैं। ​तेजस्वी यादव: राजनीति के नव-आकाश का उदय ​आज जब हम तेजस्वी यादव को देखते हैं, तो उनमें एक परिपक्व राजनेता और युवाओं की धड़कन का अद्भुत सं...

ट्रंप की ग्रीनलैंड महत्त्वाकांक्षा: कूटनीतिक दबाव और नव-साम्राज्यवाद का विश्लेषण !

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  ​ ​संसाधन बनाम सुरक्षा का तर्क: ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ग्रीनलैंड "सुरक्षा" के लिए आवश्यक है, लेकिन असली प्रेरणा वहां मौजूद विशाल प्राकृतिक संसाधन हैं। ग्रीनलैंड में ग्रेफाइट और टाइटेनियम जैसे 25 "महत्वपूर्ण कच्चे माल" मौजूद हैं जो सैन्य तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के लिए अनिवार्य हैं। यह सुरक्षा के नाम पर संसाधनों के दोहन की पुरानी साम्राज्यवादी नीति को दर्शाता है। ​आर्थिक ब्लैकमेल: डेनमार्क और यूरोपीय सहयोगियों पर 10% से 25% तक का आयात शुल्क लगाने की धमकी देना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मानदंडों का उल्लंघन है। यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए वैश्विक व्यापार प्रणाली को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ​नाटो (NATO) और संप्रभुता का संकट: ग्रीनलैंड पहले से ही नाटो द्वारा संरक्षित है। ऐसे में अमेरिका का अतिरिक्त नियंत्रण चाहना रूस या चीन के प्रभाव को रोकने के बहाने अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश है। डेनमार्क की संप्रभुता को दरकिनार करना 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' के लिए एक बड़ा खतरा है। ​वैश्विक प्रतिक्रिया की आ...

सादगी का 'श्राद्ध' और वीआईपी संस्कृति का 'अश्वमेध'!

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  ​आज के युग में 'सादगी' शब्द डिक्शनरी के किसी कोने में दुबक कर अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। विशेषकर हमारे माननीय जनसेवकों के जीवन में सादगी अब केवल चुनाव पूर्व जारी होने वाले 'घोषणापत्र' की शोभा बढ़ाने के काम आती है। जैसे ही मतपेटी से भाग्य का सूर्य उदय होता है, सादगी का 'सूर्यास्त' हो जाता है और 'वीआईपी संस्कृति' का वह अश्वमेध यज्ञ शुरू होता है, जिसके घोड़े आम आदमी की छाती पर दलदल की तरह रेंगते हैं। ​खादी की चमक और मखमली मखौल ​वह दौर अब 'ब्लैक एंड व्हाइट' फिल्मों की रील के साथ इतिहास हो गया, जब खादी का मतलब त्याग होता था। आज की खादी इतनी 'कड़क' है कि उसमें जनता की चीखें सुनाई ही नहीं देतीं। सादगी को तिलांजलि देना अब केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि एक अनिवार्य 'राजधर्म' बन गया है। अगर नेता के काफिले में हूटरों का शोर न हो, तो उसे लगता है कि उसकी सत्ता को 'लकवा' मार गया है। सड़कों पर घंटों रुकी हुई एम्बुलेंस और पसीने से तर-बतर जनता दरअसल उस 'वीआईपी' महोदय की महानता के लिए दी गई अनिवार्य बलि है। ​सुरक्षा का घेरा या जन...

जननायक की विरासत और तेजस्वी का संकल्प: "न कर्पूरी झुके, न लालू झुके, न तेजस्वी झुकेगा"

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  ​पटना के राजद राज्य कार्यालय में जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की 102वीं जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह मात्र एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि सत्ता की दमनकारी शक्तियों के खिलाफ एक नए शंखनाद का केंद्र बन गई। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस मंच से स्पष्ट कर दिया कि जिस तरह जननायक और लालू प्रसाद यादव ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, वही अडिगता अब उनके नेतृत्व में भी दिखेगी। ​शोषितों और वंचितों के हक की लड़ाई का नया अध्याय ​समारोह का उद्घाटन करते हुए तेजस्वी यादव ने बिहार की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज वे लोग सत्ता में बैठे हैं जो कर्पूरी जी के जीवनकाल में उन्हें अपशब्द कहा करते थे, लेकिन अब ढोंग की राजनीति कर रहे हैं। ​ ब्लॉग की मुख्य बातें: ​ अडिग नेतृत्व: तेजस्वी यादव ने हुंकार भरते हुए कहा, "कर्पूरी जी नहीं झुके, लालू जी नहीं झुके और मैं भी नहीं झुकूँगा।" उन्होंने जोर दिया कि शोषित, वंचित और अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों के लिए हर साजिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा। ​ लोकतंत्र बनाम धनतंत्र: उन्होंने एनडीए सर...