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Showing posts from December, 2025

समय की पुकार ( कविता )-प्रो प्रसिद्ध कुमार । नववर्ष 2026 मंगलमय हो!💐💐

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​ नववर्ष तो आता रहता है, पर उम्र घटती जाती है, टिक-टिक करती घड़ी हमें, बस यही याद दिलाती है। न काल रुकेगा, न आयु रुकेगी, यह वश में हमारे नहीं, पर जो करना है आज हमें, वह याद हमें रहता ही नहीं। ​ हम 'कल' पर सब कुछ टाल रहे, जो आज हाथ में आया है, न पल मिलना, न उम्र दोबारा, यह कैसी मोह-माया है? हम प्रेम-भाव से रह सकते, सद्भाव की राह चुन सकते थे, हम नेक राह पर चलकर भी, सुंदर सपने बुन सकते थे। ​ पर फितरत ऐसी बदल गई, हम भेदभाव में खो बैठे, जाति-धर्म और रंग-रूप के, कड़वे बीज हम बो बैठे। बनावटी चेहरा ओढ़ लिया, सादगी कहीं अब खो गई है, औरों के पथ में जाल बिछाना, फितरत अपनी हो गई है। ​ ऐश्वर्य की अंधी चाहत में, हम मानवता को भूल गए, कुकर्मों की बैसाखी थामी, मर्यादा से मुँह मोड़ लिए। न कबीर पढ़े, न रहीम पढ़े, न तर्क-ज्ञान को माना है, कुएँ के मेंढक बन बैठे, बस खुद को ही पहचाना है। ​ अभी वक्त है, जाग उठें हम, सत्कर्मों की राह चलें, इतिहास-बोध और ज्ञान की ज्योति, अपने भीतर हम ढलें। समय की रेत फिसलने से पहले, इंसान ज़रा तू जाग जा, नफ़रत के इस अंधेरे से, उजाले की ओर तू भाग जा।

​कलम की स्वतंत्रता और आँकड़ों की वैश्विक उड़ान: मेरी ब्लॉगिंग यात्रा का एक स्वर्णिम अध्याय !प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​"जब गुलामी वाली पत्रकारिता का सामना हुआ, तो मैंने उसे छोड़कर अपनी राह खुद बनाना ही श्रेष्ठ समझा।" इसी संकल्प के साथ मैंने करीब  पाँच साल पहले अपने इस स्वतंत्र ब्लॉग की नींव रखी थी। आज 31 दिसंबर 2025 को, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो 4300 ब्लॉग पोस्ट और 2,69,661 (पौने तीन लाख के करीब) व्यूअर्स का यह आँकड़ा मेरे वैचारिक संघर्ष की जीत का प्रमाण देता है। ​विकास का तुलनात्मक विश्लेषण (2022 - 2025) ​मेरे ब्लॉग की प्रगति केवल अंकों की वृद्धि नहीं, बल्कि आप पाठकों के बढ़ते विश्वास की कहानी है। साल 2022 में मेरे 1,816 ब्लॉग पर 71 हजार व्यूअर्स थे। आज 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 4,300 ब्लॉग और 2.69 लाख से अधिक व्यूअर्स तक पहुँच गई है। ​प्रतिशत के नजरिए से देखें तो: ​ब्लॉग पोस्ट की संख्या में 136% की वृद्धि हुई है। ​व्यूअर्स (पाठकों) की संख्या में 280% की भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। ​वैश्विक मानचित्र पर मेरी वैचारिक गूँज ​आज मुझे गर्व है कि मेरे विचारों को सीमाएं नहीं रोक पाईं। वर्तमान में 30 से अधिक देशों के लोग मेरे ब्लॉग को नियमित पढ़ रहे हैं। भारत के अलावा मुख्य रूप से ...

अलविदा 2025 — स्मृतियों का कोलाज और सुनहरे कल की आहट !

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     ​1. उपलब्धियों का शिखर: विज्ञान और तकनीक का दम ​साल 2025 ने साबित कर दिया कि सीमाएँ केवल नक्शों पर खींची जा सकती हैं, संभावनाओं पर नहीं। ​अंतरिक्ष में भारत का दबदबा: इसरो (ISRO) के मिशनों ने इस साल नई सफलताएँ अर्जित कीं। विशेष रूप से गगनयान के मानव रहित परीक्षणों और चंद्रमा के अनछुए पहलुओं की खोज ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में एक 'ग्लोबल पावरहाउस' के रूप में स्थापित किया। ​तकनीकी आत्मनिर्भरता: भारत ने इस साल 'सेमीकंडक्टर हब' बनने की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई। स्वदेशी चिप निर्माण और AI के नैतिक उपयोग में भारतीय नवाचारों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। ​2. महत्वपूर्ण घटनाएँ: वैश्विक और राष्ट्रीय बदलाव ​पर्यावरण की चुनौती और समाधान: COP सम्मेलनों के बीच 2025 में रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ते कदमों ने उम्मीद जगाई। भारत का 'ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' अब कागजों से निकलकर सड़कों और उद्योगों में दिखने लगा है। ​खेल जगत की चमक: भारतीय युवाओं ने वैश्विक मंचों पर पदकों की झड़ी लगाकर यह बता दिया कि भारत अब एक 'मल्टी-स्पोर्ट्स नेशन' बन चुका है। ​3. उन महान हस्तियों को ...

​विदाई बेला: कर्तव्य पथ से सेवानिवृत्ति की ओर बढ़ते कदम !

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    ​दानापुर रेल मंडल में 46 रेलकर्मियों का सम्मानजनक विदाई समारोह ​जीवन का एक लंबा पड़ाव जब पूर्ण होता है, तो स्मृतियों का कारवां साथ चलता है। कुछ ऐसा ही दृश्य आज दानापुर मंडल रेल कार्यालय के सभागार में देखने को मिला, जहाँ दिसंबर 2025 में सेवानिवृत्त होने वाले 46 रेलकर्मियों के सम्मान में "समापक भुगतान एवं विदाई समारोह" का भव्य आयोजन किया गया। ​सम्मान और कृतज्ञता ​समारोह के मुख्य अतिथि, मंडल रेल प्रबंधक (DRM) श्री विनोद कुमार ने सभी सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अंगवस्त्र और समापक भुगतान के दस्तावेज सौंपकर सम्मानित किया। उन्होंने कर्मचारियों के दशकों के परिश्रम और भारतीय रेल के प्रति उनके समर्पण की सराहना करते हुए उन्हें भावभीनी विदाई दी। ​कार्यक्रम की रूपरेखा वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी श्री अतुल कुमार द्वारा प्रस्तुत की गई, जिन्होंने समापक भुगतान की प्रक्रिया और विवरण साझा किए। ​भविष्य के लिए अनमोल सुझाव ​मंडल रेल प्रबंधक ने अपने संबोधन में रेलकर्मियों के सुखद और समृद्ध भविष्य की कामना की। साथ ही, उन्होंने एक अत्यंत व्यावहारिक सलाह देते हुए कहा कि: ​"जीवन भर की इस जमा पूंजी...

​नवाब आलम: जहाँ कानून की संजीदगी और कला की संवेदना का मिलन होता है !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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 जन्मदिन की बधाई !💐💐 ​बिहार की मिट्टी ने सदैव ऐसे मनीषियों को जन्म दिया है जिन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनना अपना धर्म समझा। इसी कड़ी में एक दीप्तिमान नाम है—नवाब आलम। पेशे से अधिवक्ता, स्वभाव से कलाकार और आत्मा से एक सजग सामाजिक कार्यकर्ता; नवाब आलम जी का व्यक्तित्व किसी बहुआयामी इंद्रधनुष की तरह है, जिसका हर रंग समाज सेवा और लोक-कल्याण को समर्पित है। ​बहुआयामी व्यक्तित्व: एक संक्षिप्त परिचय ​पटना के खगौल की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर आज पूरे बिहार के लिए एक मिसाल बन चुका है। स्नातक और पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त करने वाले नवाब साहब ने 1990 में जब दानापुर सिविल कोर्ट के गलियारों में कदम रखा, तो उनके हाथ में केवल कानून की किताबें नहीं थीं, बल्कि उनके दिल में गरीबों के प्रति अगाध संवेदना भी थी। आज भी वे उन असहाय लोगों के लिए आशा की किरण हैं, जिन्हें वे निःशुल्क न्यायिक सलाह देकर न्याय की दहलीज तक पहुँचाते हैं। ​कला और साहित्य के 'सूत्रधार' ​नवाब जी केवल कानून के ज्ञाता ही नहीं, बल्कि कला-संस्कृति के अनन्य उपासक भी हैं। नाट्य संस्था 'सूत्रधार' के संस्थापक म...

"श्रेष्ठ नागरिक, श्रेष्ठ राष्ट्र: सभ्यता की शुरुआत हमसे" !

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     ​हम अक्सर विदेशों की यात्रा करते हैं या टीवी पर विकसित देशों की झलक देखते हैं, तो वहां की साफ-सुथरी सड़कों, व्यवस्थित यातायात और सार्वजनिक अनुशासन की प्रशंसा करते नहीं थकते। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह व्यवस्था किसी 'चमत्कार' से पैदा हुई है? नहीं, यह वहां के नागरिकों के उन छोटे-छोटे निर्णयों का परिणाम है, जिन्हें वे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना चुके हैं। ​व्यवस्था सरकारी नहीं, व्यक्तिगत है ​अक्सर हम गंदगी या अव्यवस्था के लिए प्रशासन को दोष देते हैं। निस्संदेह, सरकार की जिम्मेदारी व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन उस व्यवस्था को सफल बनाना नागरिकों के हाथ में है। एक विकसित समाज की पहचान वहां की भव्य इमारतों से नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों के व्यवहार से होती है। ​परिवर्तन के तीन आधार स्तंभ सभ्यता तीन बुनियादी संकल्पों पर टिकी है: ​कचरा न फैलाना: "मेरा घर सा,सफ रहे, चाहे सड़क पर कचरा हो"—यह सोच ही अव्यवस्था की जड़ है। सार्वजनिक स्थान को अपना समझना ही सच्ची नागरिकता है। ​नियमों का पालन: रेड लाइट पर रुकना या कतार में खड़े होना किसी डर के कारण नहीं, बल्कि अनुशासन के प्र...

​आर्थिक प्रगति और वसुधैव कुटुम्बकम्: वैश्विक समृद्धि का नया मार्ग !

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     ​भारत-ओमान व्यापार समझौता: एक नई आर्थिक सुबह ! ​हाल ही में १८ दिसंबर को भारत और ओमान के बीच 'समग्र आर्थिक भागीदारी समझौता' (CEPA) हस्ताक्षरित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ओमान के सुल्तान की उपस्थिति में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा किया गया यह समझौता दोनों देशों के संबंधों में एक मील का पत्थर है। ​इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत के ९८ प्रतिशत निर्यात को ओमान के बाजार में शून्य शुल्क (Zero Duty) पर पहुंच मिलेगी। इससे भारतीय कपड़ा, रत्न-आभूषण, दवाइयां, वाहन, कृषि उत्पाद और चमड़ा उद्योग को अभूतपूर्व विस्तार मिलेगा। ​आर्थिक विकास और सामाजिक एकता का संबंध ​आर्थिक प्रगति कभी भी अलगाव में नहीं हो सकती। आज का वैश्विक युग आपसी निर्भरता का है। जब दो देश व्यापार करते हैं, तो केवल वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि संस्कृतियों और विचारधाराओं का मिलन भी होता है। ​रोजगार के अवसर: व्यापार बढ़ने से दोनों देशों में रोजगार सृजित होंगे, जिससे गरीबी कम होगी और सामाजिक स्थिरता आएगी। ​तकनीकी विनिमय: साझा व्यापार से नई तकनीकों का आदान-प्रदान होता है, जो अंततः मानव जी...

​रात की रोशनी: आपके दिल के लिए एक अदृश्य खतरा !

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   ​हालिया वैज्ञानिक शोधों ने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है—रात के समय कृत्रिम प्रकाश (जैसे स्मार्टफोन, टीवी और तेज बल्ब) के संपर्क में रहना केवल आपकी नींद को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि आपके हृदय को गंभीर खतरे में डालता है। ​यह शरीर को कैसे प्रभावित करता है? (वैज्ञानिक कारण) ​हमारा शरीर एक प्राकृतिक सर्कैडियन रिदम  या 'जैविक घड़ी' के अनुसार काम करता है। रात के अंधेरे में, मस्तिष्क मेलाटोनिन  नामक हार्मोन जारी करता है, जो गहरी नींद और हृदय की मरम्मत के लिए आवश्यक है। ​हार्मोनल असंतुलन: रात में कृत्रिम रोशनी मेलाटोनिन के उत्पादन को रोक देती है। इसके अभाव में शरीर तनाव की स्थिति में रहता है। ​रक्तचाप और धड़कन: प्रकाश के संपर्क से रात के समय कोर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है, जिससे हृदय गति और रक्तचाप  में वृद्धि होती है। ​मेटाबॉलिक रिस्क: शोध बताते हैं कि जो लोग रात में अधिक रोशनी में रहते हैं, उनमें हृदय रोग का खतरा 56% तक बढ़ जाता है। ​प्रमुख चेतावनी संकेत ​रात में देर तक फोन या लैपटॉप का उपयोग करना। ​हल्की रोशनी या टीवी चलाकर सोने की आदत। ​खिड़की से आने वाली ब...

स्वीकृति की शक्ति: स्वयं से संसार की ओर एक सेतु !

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    ​१. आत्म-केंद्रितता का अंत और 'वस्तुनिष्ठ वास्तविकता' ​मनोवैज्ञानिक रूप से, हम अक्सर अपनी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों और इच्छाओं के "बुलबुले" में जीते हैं। इसे संज्ञानात्मक पक्षपात कहा जाता है। 'वस्तुनिष्ठ वास्तविकता'  का सामना करने का अर्थ है उस बुलबुले को फोड़ना। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि संसार हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चलता, तो हम मानसिक तनाव से मुक्त होकर सत्य के साथ जीना शुरू करते हैं। ​२. ब्रह्मांड और मानसिक विस्तार  "दिमाग के बाहर एक पूरा ब्रह्मांड मौजूद है," सामाजिक मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य-ग्रहण  की क्षमता को दर्शाता है। एक परिपक्व व्यक्तित्व वही है जो यह समझ सके कि उसकी अपनी सोच अंतिम सत्य नहीं है। यह अहसास हमें 'अहंकार' से हटाकर 'अनुभव' की ओर ले जाता है। ​३. 'दूसरे की राय' का सामाजिक महत्व ​सामाजिक दृष्टिकोण से, दूसरों की राय को अपने बराबर महत्व देना समानुभूति और लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव है। समाज में संघर्ष तब उत्पन्न होते हैं जब हम अपनी राय को श्रेष्ठ और दूसरों की राय को गौण मानते हैं। स्वीकृति हमें यह...

विनोद कुमार शुक्ल को सूत्रधार की श्रद्धांजलि: "

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  साहित्य के जादुई यथार्थ के एक युग का अंत। ​खगौल। हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष, 'शब्दों के जादूगर' और सादगी के पर्याय विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन पर नाट्य संस्था, सूत्रधार खगौल ने गहरा शोक व्यक्त किया है।  अपने शोक संदेश में ​संस्था के महासचिव नवाब आलम ने कहा, "विनोद जी ने साहित्य की दीवार में अनंत संभावनाओं की एक ऐसी खिड़की खोली थी, जिससे आने वाली ताजी हवा हिंदी जगत को सदियों तक महकाती रहेगी। उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे बेहद साधारण और घरेलू शब्दों के माध्यम से मनुष्य के अस्तित्व की सबसे जटिल और असाधारण बातें कही जा सकती हैं।साहित्यकार ​प्रो. प्रसिद्ध कुमार ने उनकी रचनाओं को याद करते हुए कहा कि 'नौकर की कमीज' से लेकर 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' तक, उनकी हर कृति निम्न-मध्यमवर्गीय जीवन की जद्दोजहद उसमें छिपी है। ​  ​इस अवसर पर संस्था के अन्य रंगकर्मी और साहित्य प्रेमी जिनमें विकाश कुमार उर्फ पप्पू,  मुकेश कुमार, सऊद , शमशाद अनवर , शोएब कुरैशी, सामाजिक कार्यकर्ता चंदू प्रिंस, अस्तानंद सिंह रूपेश कुमार, जोगेंद्र यादव,जितेंद्र वत्स,रंजन कुमार, जय प्रकाश मिश्र...

​"साहित्य की दीवार में अनंत संभावनाओं की एक खिड़की हमेशा के लिए खुली छोड़कर, शब्दों के जादूगर विदा हो गए..." 🖋️

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  निराली सादगी और जादुई यथार्थ के अमर रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल जी को भावभीनी श्रद्धांजलि। ​विनोद जी ने हमें सिखाया कि कैसे बहुत साधारण शब्दों में बहुत असाधारण बातें कही जा सकती हैं। 'नौकर की कमीज' से लेकर 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' तक, उनकी हर रचना निम्न-मध्यमवर्गीय जीवन की जद्दोजहद और उसमें छिपी मासूमियत का जीवंत दस्तावेज़ है। ​अंतिम क्षणों में भी हाथ में कलम और कागज की चाह रखने वाला यह मौन साधक, हिंदी साहित्य को एक ऐसा मुहावरा दे गया जो सदियों तक गूँजता रहेगा। ​✨ विश्राम तो शरीर ने किया है, आपकी शब्द-यात्रा तो अब युगों तक चलेगी। ​हैशटैग्स: #VinodKumarShukla #HindiLiterature #विनोद_कुमार_शुक्ल #श्रद्धांजलि #साहित्य #HindiPoetry #Legend #नौकर_की_कमीज #RIP

​भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पूंजी का 'महा-पलायन': अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

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    ​हालिया रिपोर्ट के आँकड़े भारतीय पूंजी बाजार की एक डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। वर्ष 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा 1.58 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड निकासी कोई सामान्य लाभ-वसूली नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर गहराते अविश्वास का संकेत है। यह अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी निकासी है, जो यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या 'शाइनिंग इंडिया' का आकर्षण अब वैश्विक निवेशकों के लिए फीका पड़ रहा है? ​निकासी के मुख्य कारण: नीतिगत और आर्थिक विफलता? ​रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना विदेशी निवेशकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। जब मुद्रा का मूल्य गिरता है, तो विदेशी निवेशकों का रिटर्न अपने आप कम हो जाता है। ​अत्यधिक मूल्यांकन (Overvaluation): भारतीय शेयर बाजारों का मूल्यांकन (Valuation) लंबे समय से वास्तविक आय से कहीं ऊपर चल रहा था। अब जब 'बुलबुला' फटने की कगार पर है, तो विदेशी निवेशक अपना पैसा सुरक्षित निकालने में ही भलाई समझ रहे हैं। ​वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव: अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाना और वैश्विक व्यापा...

डिजिटल बचपन: तकनीक के उत्साह में कहीं खो न जाए बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य !

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    ​आज के दौर में डिजिटल उपकरणों को भारत में शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य का एक सशक्त माध्यम माना जा रहा है। निःसंदेह तकनीक ने सीखने के नए दरवाजे खोले हैं और सूचनाओं तक पहुँच को आसान बनाया है, लेकिन इस डिजिटल क्रांति के उत्साह में हम बच्चों के मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। ​सिमटता बचपन: मोबाइल ही अब खेल का मैदान ​शहरी जीवन में बदलाव इस कदर आया है कि बच्चों के लिए असली खेल के मैदान अब मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गए हैं। चिंता की बात यह है कि अब यह प्रवृत्ति केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी तेजी से पैर पसार रही है। जहाँ पहले बच्चे गलियों और पार्कों में दौड़ते-भागते थे, अब वे घंटों एक ही जगह बैठकर स्क्रीन से चिपके रहते हैं। ​सीमित होता 'दृश्य संसार' ​तकनीक पर बढ़ती इस निर्भरता का परिणाम यह है कि बच्चों का 'दृश्य संसार' (Visual World) बहुत छोटा और एकरूप होता जा रहा है। वे दुनिया को अनुभव करने के बजाय केवल उसे स्क्रीन पर देख रहे हैं। इससे उनकी रचनात्मकता, सोचने की क्षमता और बाहरी वातावरण स...

​पश्चाताप से प्रायश्चित तक: असफलता को विकास में कैसे बदलें?

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    ​परीक्षा के परिणाम केवल अंकों का मेल नहीं होते, कई बार वे हमारी मानसिक स्थिति का पैमाना बन जाते हैं। कम अंक आने या फेल होने पर मन में दुख होना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह दुख एक अंतहीन 'पश्चाताप' बन जाता है, तो यह हमारी आगे बढ़ने की क्षमता को खत्म कर देता है। ​1. "अति" का मनोवैज्ञानिक जाल ​किसी भी चीज़ की अति हानिकारक है। जब कोई विद्यार्थी अपनी असफलता पर ज़रूरत से ज्यादा पछताता है, तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से 'रयूमिनेशन' (Rumination) का शिकार हो जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ मस्तिष्क बार-बार एक ही नकारात्मक विचार को दोहराता रहता है। यह न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि मानसिक ऊर्जा का क्षय भी है। ​2. पश्चाताप बनाम प्रायश्चित ​पश्चाताप को प्रायश्चित का रूप देना। इन दोनों में एक बुनियादी अंतर है: ​पश्चाताप (Regret): यह अतीत की ओर देखता है। "मैंने ऐसा क्यों किया?" या "काश मैं पढ़ लेता।" यह आपको ग्लानि की अग्नि में जलाता है। ​प्रायश्चित (Atonement/Correction): यह भविष्य की ओर देखता है। "मुझसे गलती हुई, अब मैं इसे सुधारने के लिए क्या कर सकता...

विकास की पटरी पर सरपट दौड़ती पूर्व मध्य रेल: उपलब्धियों से भरा रहा साल 2025 !

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  ​हाजीपुर | 28 दिसंबर, 2025 ​भारतीय रेल के नेटवर्क में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले पूर्व मध्य रेल (ECR) के लिए वर्ष 2025 मील का पत्थर साबित हुआ है। अधोसंरचना विस्तार से लेकर यात्री सुविधाओं और सुरक्षा तकनीक तक, इस वित्तीय वर्ष में रेलवे ने विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री सरस्वती चन्द्र द्वारा जारी विवरण के अनुसार, इस वर्ष न केवल नई रेल लाइनों का जाल बिछाया गया, बल्कि अत्याधुनिक सुरक्षा कवच प्रणाली और माल ढुलाई के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक प्रगति हुई है। ​1. इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़ी छलांग: जुड़ते शहर, बढ़ती रफ्तार ​रेलवे ने इस वर्ष कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पूर्ण कर यातायात को सुगम बनाया है: ​कोयला ढुलाई को मिला बल: शिवपुर-टोरी तीसरी लाइन (41.5 किमी) और टोरी-बीराटोली दोहरीकरण का कार्य पूर्ण होने से झारखंड की चतरा एवं लातेहार माइन्स से पावर प्लांटों तक कोयले की आपूर्ति अब बिना किसी बाधा के हो रही है। ​नई रेल लाइनें: बिहार शरीफ से शेखपुरा तक नई रेल लाइन का कार्य पूर्ण हो चुका है। वहीं, नेउरा-दनियावां-शेखपुरा परियोजना का बड़ा हिस्सा (जटडुमरी से शेखपुरा...

रोहतास के 13 करोड़ के ढहते बिहार के 'सेल्फी पॉइंट' !

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  "   सिर्फ वही देखना जो स्वार्थ के अनुकूल हो।" ​बिहार में इन दिनों एक नया 'टूरिज्म' फल-फूल रहा है— 'ध्वस्त स्थापत्य कला' का दर्शन। रोहतास में अभी रोपवे का टावर क्या गिरा, मानों भ्रष्टाचार की नींव ने एक और अंगड़ाई ली हो। सरकार कहती है कि हम भ्रष्टाचार को 'ध्वस्त' कर देंगे, लेकिन धरातल पर भ्रष्टाचारी ही पूरी संरचनाओं को ध्वस्त कर सरकार के दावों की हवा निकाल रहे हैं। यह विडंबना ही है कि बिहार में अब पुल और टावर निर्माण के लिए नहीं, बल्कि गिरने के 'विश्व रिकॉर्ड' बनाने के लिए चर्चा में हैं। ​जब 'विकास' जल-समाधि लेने लगे ​पिछले कुछ महीनों में बिहार ने वो मंजर देखे हैं जो किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं। अररिया, सिवान, मधुबनी और किशनगंज—ये महज़ जिलों के नाम नहीं हैं, ये उन जगहों की सूची है जहाँ करोड़ों की लागत से बने पुल जनता के काम आने से पहले ही नदियों में समा गए। ​अगुवानी-सुल्तानगंज पुल: यह तो भ्रष्टाचार का 'ताजमहल' बन गया, जो दो बार गिरा। ​अररिया का बकरा नदी पुल: उद्घाटन से पहले ही जो जलमग्न हो गया, मानो अपनी बदकिस्मती पर आँसू बहा रहा ...

सत्ता की ढाल बनता मीडिया: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का ढहता स्वरूप !

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    मीडिया को सरकार का 'पीआर (PR) एजेंट' नहीं, बल्कि 'वॉचडॉग' होना चाहिए।  ​लोकतंत्र के तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—की निगरानी के लिए चौथे स्तंभ के रूप में 'मीडिया' की कल्पना की गई थी। मीडिया का धर्म था सत्ता से कठिन सवाल पूछना और जनता की आवाज़ बनना। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सूचना देने के बजाय 'नैरेटिव' (कथा) गढ़ने में लगा है। जब मीडिया जनता के मुद्दों को उठाने के बजाय सरकार के राजनीतिक हितों की 'जुगलबंदी' करने लगे, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी है। ​जुगलबंदी या जवाबदेही से बचाव? जब हम 'डबल इंजन' जैसी राजनीतिक मार्केटिंग की शब्दावली का उपयोग समाचारों में करते हैं, तो हम अनजाने में (या जानबूझकर) सत्ता के प्रवक्ता बन जाते हैं। ​संवेदनशीलता का अभाव: बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के दोषी को जमानत मिलने पर मीडिया का ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि पीड़ित को न्याय कैसे मिले या व्यवस्था में क्या खामियां हैं। इसके उलट, जब मीडिया यह चिंता करने लगे कि इस फैसले से सरकार 'रक्षात्मक' (...

​कट्टरपंथ: संवैधानिक मूल्यों का ह्रास और अस्थिरता का मार्ग !

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  ​आज के दौर में कट्टरपंथ और वैचारिक संकीर्णता एक ऐसी चुनौती बनकर उभरी है, जो न केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है, बल्कि राष्ट्र की लोकतांत्रिक नींव पर भी प्रहार कर रही है। जब भी कोई समाज समावेशी विचारों को त्यागकर कट्टरपंथ की ओर कदम बढ़ाता है, तो सबसे पहले 'धर्मनिरपेक्षता' और 'बहुलतावाद' जैसे मूल्य बलि चढ़ जाते हैं। ​संवैधानिक ढांचे पर प्रहार ​भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर टिका है।  यदि देश में ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा हावी होती है जो केवल एक विशिष्ट पहचान (जैसे 'हिंदू राष्ट्र') को प्राथमिकता देती है, तो वहां आधुनिक लोकतांत्रिक संविधान के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचेगा। संविधान का मूल उद्देश्य ही हर नागरिक को, चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो, समान अधिकार देना है। कट्टरपंथ इस मूल भावना के विपरीत कार्य करता है। ​अराजकता का भय: पड़ोसी देशों से सीख ​इतिहास और वर्तमान गवाह हैं कि जिन देशों ने धार्मिक कट्टरपंथ को अपनी राजनीति और शासन का आधार बनाया, वे आज अस्थिरता और अराजकता के दौर से गुजर रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे...

अमेरिकी टैरिफ नीतियां और भारतीय रुपया: एक गहराता आर्थिक संकट।

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    ​वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की आर्थिक नीतियों ने पूरी दुनिया में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। विशेष रूप से उनकी शुल्क नीतियां (Tariff Policies) वैश्विक व्यापार संतुलन को प्रभावित कर रही हैं, जिससे भारत जैसे विकासशील देशों के लिए आर्थिक चुनौतियां बढ़ गई हैं। ​मुख्य आर्थिक बिंदु ​एकतरफा शुल्क नीतियां: ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत के प्रति अपनाए जा रहे "एकतरफा पक्षपात" और ऊंचे टैरिफ के कारण भारतीय निर्यात प्रभावित हो रहा है। इसे आर्थिक भाषा में 'व्यापार संरक्षणवाद' (Trade Protectionism) कहा जाता है। ​रुपये का अवमूल्यन (Depreciation): भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में लगातार कमजोर हो रहा है। जब घरेलू मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा के मुकाबले गिरता है, तो आयात महंगा हो जाता है। ​ऐतिहासिक गिरावट: डॉलर का ₹91 के स्तर पर पहुंचना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक संकेत है। यह न केवल मुद्रास्फीति (Inflation) के खतरे को बढ़ाता है, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव डालता है।

ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की 'हाइड्रोजन क्रांति': एक सुनहरा भविष्य !

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    ​वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन की चुनौतियों से जूझ रही है, भारत ने स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक बड़ी उम्मीद जगाई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, परिवहन, बंदरगाह और स्टील जैसे प्रमुख उद्योगों को 'कार्बन-मुक्त' करने के लिए हाइड्रोजन की मांग तेजी से बढ़ रही है। ​1. भारत के पास ऊर्जा का विशाल भंडार ​विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास हाइड्रोजन का इतना विशाल प्राकृतिक भंडार है कि यह अगले 200 वर्षों से भी अधिक समय तक हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है। यह न केवल हमें ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि पेट्रोलियम आयात पर हमारी निर्भरता को भी कम करेगा। ​2. औद्योगिक ही नहीं, अब घरेलू उपयोग की बारी ​हाइड्रोजन का सबसे रोमांचक पहलू इसका घरेलू इस्तेमाल है। नए आविष्कारों और आधुनिक तकनीक के माध्यम से, वह दिन दूर नहीं जब हाइड्रोजन हमारे घरों की रसोई और अन्य दैनिक कार्यों के लिए आसानी से उपलब्ध होगा। यह आम आदमी के जीवन को अधिक सस्ता और प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा। ​3. नवीकरणीय ऊर्जा और सरकारी लक्ष्य ​भारत सरकार ...

​वेदना से विवेक तक: चेतना का रूपांतरण !

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  ​जीवन केवल सुखद अनुभवों की शृंखला नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, पीड़ा और अंतर्द्वंद्वों का एक विस्तृत सागर है। अक्सर हम दुःख को एक अंत मान लेते हैं, लेकिन दार्शनिक दृष्टि से देखें तो 'वेदना' केवल पीड़ा नहीं, बल्कि जीवन की गूंज है। यह वह प्रेरक शक्ति है जो मनुष्य को आत्म-निरीक्षण और सत्य की खोज के लिए बाध्य करती है। ​पीड़ा का दार्शनिक पक्ष ​साधारण स्तर पर दुःख हमें विचलित करता है, लेकिन जब यही दुःख हमारी चेतना से जुड़ता है, तो यह व्यक्तित्व निर्माण का साधन बन जाता है। छवि के अनुसार, चेतना ही वह माध्यम है जो साधारण अनुभवों को 'जीवन दर्शन' में बदल देती है। जब हम अपनी पीड़ा को केवल व्यक्तिगत हानि न मानकर उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तब 'विवेक' का जन्म होता है। ​महापुरुषों के जीवन से सीख ​इतिहास गवाह है कि महान व्यक्तित्वों का निर्माण कठिन परिस्थितियों की भट्टी में ही हुआ है: ​महात्मा बुद्ध: उन्होंने जन्म, मृत्यु और रोग जैसी सार्वभौमिक पीड़ा को देखा, लेकिन वे उससे टूटे नहीं। उन्होंने उस वेदना को करुणा और आत्म-ज्ञान में रूपांतरित कर दिया। ​महर्षि पतंजलि: उन्हों...

रूस-चीन निकटता: भारत की कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा!

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  ​हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति के पटल पर रूस और चीन के बीच बढ़ती नजदीकियों ने नए भू-राजनीतिक समीकरणों को जन्म दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव ने मॉस्को और बीजिंग को एक-दूसरे के करीब ला दिया है। चूँकि चीन भारत का प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है और रूस भारत का एक विश्वसनीय ऐतिहासिक मित्र, यह स्थिति नई दिल्ली के लिए एक 'दोधारी तलवार' के समान है। ​वर्तमान चुनौतियां और भू-राजनीतिक परिदृश्य ​रूस अब चीन का एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बन चुका है। भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि क्या रूस की चीन पर बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक निर्भरता, भारत के साथ उसके दशकों पुराने रक्षा और वैज्ञानिक संबंधों को प्रभावित करेगी। दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव और 'हिमालयी सीमा' पर तनाव भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निरंतर चुनौती बना हुआ है। ​सुधारात्मक दृष्टिकोण और आगे की राह ​भारत को इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए: ​रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): भारत को अपनी उस नीति को और म...

न्याय की डगर और रसूख का साया।

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       ​1. कानूनी दांव-पेंच और न्याय में बाधा  आज भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर लगाम लगाना एक बड़ी चुनौती है। अक्सर "कानूनी बारीकियों"  का सहारा लेकर जघन्य अपराधों के दोषियों को रियायत मिल जाती है। जब एक सिद्ध अपराधी को जमानत या सजा में निलंबन मिलता है, तो वह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि पीड़ित के लिए न्याय के मार्ग में एक बड़ी बाधा बन जाती है। ​2. सत्ता और रसूख का प्रभाव पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का मामला है।  ​निचली अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। ​दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सजा के निलंबन के फैसले ने न्याय की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि राजनीतिक रसूख वाले अपराधी किस तरह तंत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ​3. पीड़ित का संघर्ष और व्यवस्था की विफलता ​पिता की मृत्यु, एक्सीडेंट के नाम पर जानलेवा हमला और परिजनों को खोना। जब अपराधी ताकतवर होता है, तो न्याय की लड़ाई केवल अदालत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह जीवन और मृत्यु का संघर्ष बन जाती है। ऐसे में कानू...

मुक्त मन: स्पष्टता और करुणा का मार्ग !

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    ​जीवन की भागदौड़ और मानसिक उथल-पुथल के बीच, हम अक्सर शांति और स्पष्टता की तलाश करते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह स्पष्टता आती कहाँ से है? इसका उत्तर किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि हमारे अपने 'मन की अवस्था' में छिपा है। ​1. ग्रहणशीलता: सीखने की पहली शर्त ​एक मुक्त  और ग्रहणशील मन उस खाली बर्तन की तरह है, जिसमें नया ज्ञान भरा जा सकता है। जब हम पूर्वाग्रहों और पुरानी धारणाओं से बंधे होते हैं, तो हम नए अनुभवों के लिए द्वार बंद कर लेते हैं। ग्रहणशील होने का अर्थ है—जीवन को वैसा ही देखना जैसा वह है, न कि वैसा जैसा हम उसे देखना चाहते हैं। ​2. निरंतर विकास की अनुमति ​जब मन खुला होता है, तो वह ठहरा हुआ नहीं रहता। वह एक बहती नदी की तरह होता है जो हर मोड़ पर कुछ नया सीखती है। यह खुलापन हमें स्वयं को विकसित करने की अनुमति देता है। हम अपनी गलतियों से डरते नहीं, बल्कि उन्हें विकास की सीढ़ी मानते हैं। ​3. अपूर्णता को स्वीकार करना ​समाज अक्सर हमें 'परफेक्ट' होने का दबाव देता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अपूर्णता कोई दोष नहीं, बल्कि मानव होने का स्वभाव है। * अपूर्णता स्...

​स्मृति-शेष: रामायण के सुरों में रचे-बसे मेरे पिताश्री !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​भाग - 2: भक्ति का अजस्र प्रवाह और संस्कारों की विरासत ​भोर की पहली किरण और राम-नाम का गुंजन ! पिताश्री के दिन का आरंभ किसी अलार्म से नहीं, बल्कि 'मंगल भवन अमंगल हारी' की पावन चौपाइयों से होता था। जैसे ही सूर्य की पहली रश्मि आंगन को स्पर्श करती, पिताश्री के कंठ से फूटती सुरीली तान— 'श्रीरामचन्द्र कृपालु भजुमन'— पूरे घर को किसी मंदिर की पवित्रता से भर देती थी। 'जय जय जय गिरिराज किशोरी' के छंदों को जब वे अपनी विशेष रागिनी में गाते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो भक्ति साक्षात शब्द बनकर हवा में तैर रही हो। उनके व्यक्तित्व में राम-नाम की ऐसी व्याप्ति थी कि लोग उनका वास्तविक नाम 'रामकिशुन' भूलकर उन्हें श्रद्धा से 'रामजी' ही पुकारने लगे थे। ​नामों की त्रिवेणी और एक मेधावी टीस यह एक अद्भुत संयोग ही था कि हमारे परिवार में भक्ति की गंगा नामों के माध्यम से प्रवाहित होती थी। दादाजी 'रामदेव राय' से लेकर पिताश्री के सभी भाइयों— रामावतार राय, रामाश्रय राय और राम करण राय— के नामों के मूल में 'राम' ही विराजमान थे। ​किन्तु इस पारिवारिक सुख के उपवन मे...

"मेरे पिता, मेरा स्वाभिमान"!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   ​ पुण्यतिथि: 30वीं (स्मृति शेष: 25 दिसंबर 1995) ​आज से ठीक तीन दशक पहले, 25 दिसंबर 1995 की वह दुपहरी मुझे आज भी याद है। दानापुर रेलवे अस्पताल की वह घड़ी, जब दिन के करीब 12 बज रहे थे और मेरे पिता, जिन्हें दुनिया 'रामजी' के नाम से जानती थी, हमें मोह-माया के बंधनों से मुक्त कर चिरनिद्रा में सो गए। आज उनकी 30वीं पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। ​कर्तव्यनिष्ठा और संघर्ष का पर्याय ​पिता जी दानापुर रेलवे के IOW विभाग में राजमिस्त्री के रूप में कार्यरत थे। उस दौर में आज जैसी ठेकेदारी प्रथा नहीं थी; छोटे-छोटे निर्माण कार्यों की नींव में पिता जी जैसे कर्मयोगियों का पसीना लगा होता था। मुझे याद है, मैं छोटा था और हफ़्तों उनके दर्शन नहीं होते थे। वे सूर्योदय से पहले ड्यूटी पर निकल जाते और देर रात लौटते। समय की पाबंदी और अनुशासन उनकी पहचान थी। उनकी मेहनत का ही फल था कि आज रेलवे की वे दीवारें और संरचनाएं अडिग खड़ी हैं। ​असीम उदारता और अपनों का दंश ​पिता जी का हृदय एक विशाल समुद्र की तरह था। उन्होंने संयुक्त परिवार और अनगिनत संबंधियों की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ढोया। उन्होंने दूसर...

​'शांत क्षेत्र': कागजी नियमों और शहरी शोर की कड़वी हकीकत !

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  ​विभिन्न शहरों में 'शांत क्षेत्र' (Silence Zones) अधिसूचित करने का वास्तविक मकसद इन संवेदनशील इलाकों को शोर-शराबे से दूर रखना और वहां शांति का वातावरण सुनिश्चित करना था। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और अदालतों के आसपास के क्षेत्रों को इसी मंशा से 'शांत क्षेत्र' घोषित किया जाता है। लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि केवल कागजों में कानून बना देने से ध्वनि प्रदूषण कम नहीं हो सकता। ​समस्या की जड़: पुराने नियम और नई चुनौतियां ​आज की सबसे बड़ी समस्या पुराने नियमों की नहीं, बल्कि इस बात की है कि वे समय, आधुनिक विज्ञान और तेजी से बदलती शहरी वास्तविकताओं के साथ विकसित नहीं हो पाए। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हुआ और आबादी बढ़ी, पुराने मानक आज की भीड़भाड़ और तकनीक के सामने बौने साबित हो रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे निम्नलिखित तीन स्तंभों पर खड़ा करने की जरूरत है: ​शहरी नियोजन : शहरों का विकास इस तरह हो कि रिहायशी और शांत क्षेत्रों को शोर वाले मुख्य मार्गों या औद्योगिक क्षेत्रों से अलग रखा जाए। ​प्रभावी प्रवर्तन : कानून तो मौजूद है...

कल्पना की शक्ति: क्या ख्यालों में खोना वाकई आलस है?

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  ​समाज अक्सर उन लोगों को 'आलसी' या 'अवास्तविक' मान लेता है जो अपनी ही सोच की दुनिया में खोए रहते हैं। अक्सर ऐसे लोगों को टोक दिया जाता है कि वे वर्तमान में जीने के बजाय सपने देख रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि अगर ये "सपना देखने वाले" न होते, तो दुनिया आज कहाँ होती? ​चिंतन का महत्व  गहराई से सोचना भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है, जितना कि किसी भौतिक लक्ष्य को पूरा करना। जब कोई व्यक्ति विचारों में डूबता है, तो वह केवल समय नहीं बिता रहा होता, बल्कि वह संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा होता है। ​नये विचार: हर महान आविष्कार या स्टार्टअप की शुरुआत एक छोटे से 'ख्याल' से ही होती है। ​कला और साहित्य: बिना कल्पना और गहरी सोच के न तो कोई अमर कविता लिखी जा सकती है और न ही कोई कालजयी चित्र बनाया जा सकता है। ​विज्ञान की प्रगति: विज्ञान केवल प्रयोगों का नाम नहीं है; यह उन परिकल्पनाओं (Hypothesis) का परिणाम है जो वैज्ञानिकों के मन में विचारों के रूप में जन्म लेती हैं। ​समाज की संकीर्ण दृष्टि ​आज के भागदौड़ भरे जीवन में हमने 'व्यस्तता' को सफलता का पैमाना म...

बदलाव: प्रगति की एक सुंदर यात्रा !

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    ​बदलाव की रफ्तार, उसकी चाल, दिशा और मकसद को समझना भले ही कभी-कभी पेचीदा लगे, लेकिन यही जीवन की गतिशीलता है। कुछ सकारात्मक बदलाव पल भर में हमारे जीवन को रोशन कर देते हैं, जबकि कुछ बड़े बदलावों के लिए हमें धैर्य के साथ निरंतर प्रयास करना पड़ता है। ​यह सच है कि हर किसी की प्रगति की यात्रा अलग होती है। जहाँ एक कार चलाने वाला व्यक्ति कुछ वर्षों की मेहनत से हवाई जहाज के सफर तक पहुँच सकता है, वहीं पैदल चलने वाले मुसाफिर के लिए एक सुरक्षित वाहन मिलना भी बड़ी सफलता हो सकती है। ​महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम कितनी तेजी से बदल रहे हैं, बल्कि यह है कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। हर छोटा कदम, चाहे वह कितना भी धीमा क्यों न हो, हमें एक बेहतर कल की ओर ले जाता है। जब हम अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए सकारात्मक कर्म करते हैं, तो धीरे-धीरे सुरक्षित और सुखद भविष्य के सारे रास्ते खुद-ब-खुद खुलने लगते हैं। ​"बदलाव का असली मकसद केवल गंतव्य तक पहुँचना नहीं, बल्कि उस सफर के दौरान खुद को बेहतर बनाना है।" ​मैंने इसमें क्या बदलाव किए हैं? ​हताशा को आशा में बदला: 'मुश्किल' पर जोर था, वह...

​महंगा सफर: सुविधाओं के अभाव में बढ़ता वित्तीय बोझ

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    ​भारतीय रेल, जिसे देश की 'जीवन रेखा' कहा जाता है, आज अपने सबसे विरोधाभासी दौर से गुजर रही है। एक ओर सरकार इसे विश्वस्तरीय और 'अंतरराष्ट्रीय मानकों' के अनुरूप बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर आम यात्री के लिए रेल का सफर आर्थिक और शारीरिक, दोनों मोर्चों पर एक 'दुस्वप्न' बनता जा रहा है। ​किराया वृद्धि: राजस्व की भूख या सेवा का संकल्प? ​हाल ही में भारतीय रेलवे द्वारा यात्री किराए में की गई वृद्धि—जो विशेष रूप से 215 किलोमीटर से अधिक की यात्रा पर लागू है—भले ही प्रति किलोमीटर एक से दो पैसे की मामूली बढ़ोतरी दिखे, लेकिन इसका व्यापक प्रभाव चौंकाने वाला है। सरकार को इससे अगले तीन महीनों में लगभग 600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिलने की उम्मीद है। यह स्पष्ट करता है कि सरकार बजट जैसे औपचारिक मौकों का इंतजार किए बिना, जब चाहे यात्री की जेब पर बोझ डालने के लिए स्वतंत्र है। सामान के वजन पर सीमा और अतिरिक्त शुल्क जैसे नियम इसी 'राजस्व वसूली' की कड़ी का हिस्सा हैं। ​जमीनी हकीकत और सरकारी दावे ​टिकटों की मारामारी: आज एक आम आदमी के लिए कन्फर्म टिकट मिलना किसी ...

दुख और संघर्ष: व्यक्तित्व को निखारने वाली कसौटी !

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    ​जीवन का मार्ग हमेशा समतल नहीं होता; इसमें उतार-चढ़ाव, धूप और छाँव का आना-जाना लगा रहता है। अक्सर हम सुख की कामना करते हैं और दुख से दूर भागना चाहते हैं, —"दुख व्यक्ति को मांजता है।" जिस प्रकार सोने को चमकने के लिए आग में तपना पड़ता है, उसी प्रकार जीवन के संघर्ष हमारे व्यक्तित्व को और अधिक प्रखर और मजबूत बनाते हैं। ​1. आत्म-मंथन और सुधार का अवसर ​जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तो हम अक्सर ठहरकर अपने बारे में नहीं सोचते। लेकिन दुख की घड़ी हमें आत्म-मंथन करने पर मजबूर करती है। यह हमें हमारे भीतर की उन कमियों से परिचित कराती है जिन्हें हम अनदेखा कर रहे थे। यह एक नए अध्याय की शुरुआत है, जहाँ हम पहले से अधिक समझदार और अनुभवी होकर उभरते हैं। ​2. सुख की सच्ची पहचान ​अंधेरे के बिना प्रकाश की कोई महत्ता नहीं होती। यदि जीवन में कभी दुख न आए, तो हम सुख के आनंद को कभी महसूस ही नहीं कर पाएंगे। दुख हमें कृतज्ञता (Gratitude) सिखाता है। यह हमें उन छोटी-छोटी खुशियों की कद्र करना सिखाता है जिन्हें हम अक्सर साधारण मानकर भूल जाते हैं। ​3. भविष्य की नई राहें ​अक्सर एक दरवाजा बंद होने पर ही हम ...

​उच्च शिक्षा में जवाबदेही का नया सवेरा: पारदर्शिता से सुधरेगी शैक्षणिक व्यवस्था !

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    ​डिजिटल निगरानी और अनुशासन: अब पढ़ाई में नहीं होगी 'फांकी' ! मैंने इस साल जितना जिस तारीख में क्लास में पढ़ाया ,उसे चैप्टरवैज डिजिटली लिख रखा है ताकि यह स्मरण में रहे और पूरे सिलेबस को पूरा किया है !-प्रो प्रसिद्ध कुमार। ​बिहार के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए राज्यपाल एवं कुलाधिपति द्वारा उठाया गया कदम एक दूरगामी और ऐतिहासिक निर्णय है। कक्षाओं के विवरण को प्रतिदिन वेबसाइट पर अपलोड करने की अनिवार्यता से न केवल व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी, बल्कि यह शिक्षकों और छात्रों के बीच एक सक्रिय शैक्षणिक वातावरण भी तैयार करेगा। ​अक्सर यह देखा गया है कि समुचित निगरानी के अभाव में कक्षाएं अनियमित हो जाती हैं, जिसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। अब डिजिटल मॉनिटरिंग के माध्यम से यह सुनिश्चित होगा कि पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो। जब प्राध्यापक और छात्र दोनों की उपस्थिति और सक्रियता ट्रैक होगी, तो "फांकी" मारने की प्रवृत्ति स्वतः समाप्त हो जाएगी और कैंपस में फिर से पढ़ाई का माहौल लौटेगा। ​सिक्के का दूसरा पहलू: वित्त रहित कॉलेजों की समस्याओं ...

इन्डिका (Indica) एक ऐतिहासिक, भोगौलिक , पुरातत्व के अद्भुत ज्ञान की पुस्तक !

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   ए डीप नेचुरल हिस्ट्री ऑफ द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (A Deep Natural History of the Indian Subcontinent) ​यह पुस्तक भारत के उस इतिहास को बताती है जो इंसानों के आने से बहुत पहले का है। यह उपमहाद्वीप के बनने की कहानी है—कैसे भारत कभी अंटार्कटिका से जुड़ा था, कैसे यह विशाल महासागरों को पार कर एशिया से टकराया और हिमालय का जन्म हुआ। लेखक ने इसमें जीवाश्मों (fossils), लुप्त हो चुके डायनासोरों, प्राचीन पौधों और उन ज्वालामुखी विस्फोटों का वर्णन किया है जिन्होंने भारत की वर्तमान भौगोलिक स्थिति को आकार दिया। यह केवल विज्ञान की किताब नहीं, बल्कि भारत की भूमि की एक रोमांचक जीवनी है। ​उपयोगिता और मूल्य ​ज्ञानवर्धक: यह उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो भूविज्ञान (Geology), पुरातत्व और प्रकृति में रुचि रखते हैं। ​सरल भाषा: वैज्ञानिक विषयों पर आधारित होने के बावजूद, इसकी भाषा और समझाने का तरीका बहुत सरल और दिलचस्प है। ​दृश्यात्मक प्रस्तुति: पुस्तक में दुर्लभ चित्रों, नक्शों और रेखाचित्रों का प्रयोग किया गया है, जो इसे पढ़ने के अनुभव को जीवंत बना देते हैं। ​सांस्कृतिक महत्व: यह हमें बताती है कि...

आत्म-सम्मान - बाहरी प्रशंसा और आंतरिक गरिमा के बीच का मनोविज्ञान !

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    ​ "लोकैषणा बनाम स्व-बोध: आत्म-सम्मान की मनोवैज्ञानिक यात्रा" ! ​आधुनिक युग में, जहाँ हमारी पहचान सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और समाज की 'स्वीकृति' पर टिकी है, यह विचार एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप की तरह है। जीवन का सबसे बड़ा संतोष यह नहीं है कि दुनिया हमें कितना सम्मान देती है, बल्कि यह है कि हम स्वयं को कितना सम्मान देते हैं। ​1. सामाजिक तुलना का मनोविज्ञान  ​सामाजिक मनोविज्ञान के अनुसार, मनुष्य अक्सर अपनी योग्यता का आकलन दूसरों से तुलना करके करता है। हम बाहरी सम्मान को अपनी सफलता का पैमाना मान लेते हैं। लेकिन यह 'बाहरी सम्मान' अस्थिर होता है। जब समाज की प्रशंसा कम होती है, तो व्यक्ति का आत्मविश्वास गिर जाता है।  हमें इस बाहरी निर्भरता से मुक्त कर 'आंतरिक नियंत्रण' की ओर ले जाता है। ​2. आत्म-सम्मान: पदक नहीं, एक प्रक्रिया ​"आत्म-सम्मान कोई पदक नहीं है, जिसे कोई और दे।" यह पंक्ति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पदक 'उपलब्धि' का प्रतीक है, जबकि आत्म-सम्मान 'अस्तित्व' का। ​पदक (बाहरी): यह दूसरों द्वारा तय की गई...

मनरेगा और नई योजनाएँ: सुधार या राज्यों पर अतिरिक्त भार?

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    ​हाल के नीतिगत बदलावों और नई योजनाओं के क्रियान्वयन ने एक बार फिर केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय असंतुलन की बहस को जन्म दे दिया है। वर्तमान परिदृश्य में सरकार की नीतियां जनहित के दावों और व्यावहारिक धरातल के बीच झूलती नजर आ रही हैं। ​नीतिगत अस्पष्टता और मनरेगा की अनदेखी यदि सरकार के पास जनकल्याण के लिए नए प्रावधान थे, तो उन्हें मनरेगा  जैसी स्थापित योजना में ही क्यों शामिल नहीं किया गया? मनरेगा को अधिक लक्ष्यबद्ध बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त किया जा सकता था। नई योजनाओं को लाने की होड़ में अक्सर पुरानी और प्रभावी योजनाओं के बुनियादी ढांचे की उपेक्षा कर दी जाती है। ​पारिश्रमिक बनाम कार्यदिवस: एक अधूरा न्याय ​बढ़ती महंगाई के इस दौर में कार्यबल की सबसे प्राथमिक मांग पारिश्रमिक  में वृद्धि होनी चाहिए थी। सरकार ने वेतन बढ़ाने के बजाय काम के दिनों को 25 दिन बढ़ाकर एक "संख्यात्मक राहत" देने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह है कि यदि दैनिक मजदूरी ही सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो अधिक दिनों तक कम मजदूरी पर काम करना श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में कितना ...

अक्षरों का इंद्रधनुष: जब कलम बनी प्रकृति के हुनर की तूलिका

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     ​कहते हैं कि शब्द केवल भाव नहीं व्यक्त करते, वे अपने स्वरूप में कलाकार के व्यक्तित्व का दर्पण भी होते हैं। नेपाल की वादियों से निकली एक सोलह वर्षीया बालिका, प्रकृति मल्ला, ने इस कथन को न केवल सत्य सिद्ध किया, बल्कि अपनी लेखनी से विश्व पटल पर विस्मय का एक नया अध्याय लिख दिया। जहाँ आज की डिजिटल दुनिया में कीबोर्ड की खटखटाहट ने कलम की सरसराहट को गौण कर दिया है, वहाँ प्रकृति की लिखावट किसी प्राचीन शिलालेख की गरिमा और आधुनिक चित्रकला की सुघड़ता का अनूठा संगम बनकर उभरी है। ​साधना की स्याही, धैर्य का कागज़ ​प्रकृति की उत्तर-पुस्तिका केवल उत्तरों का संग्रह नहीं, बल्कि एकाग्रता की एक जीवंत कविता है। जब उनकी कलम कागज़ का स्पर्श करती है, तो अक्षर मानों एक अनुशासनबद्ध पंक्ति में नृत्य करने लगते हैं। न कोई कांट-छांट, न कोई विचलन—बस एक निरंतर प्रवाह। उनकी लिखावट को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी दक्ष शिल्पी ने संगमरमर पर महीन नक्काशी की हो। जिसे दुनिया 'ग्लोबल सेंसेशन' कह रही है, वह वास्तव में वर्षों के मौन अभ्यास और धैर्य की पराकाष्ठा है। ​सादगी में छिपा सौंदर्य ​इस गौरवमयी उपलब...

​नाट्य समीक्षा: 'बिदेसिया' ने जीवंत की पलायन और विरह की मार्मिक पीड़ा !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​21 दिसम्बर को  खगौल के बालिगा विद्यालय स्थित रंगमंच  पर नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा लोकनायक भिखारी ठाकुर की अमर कृति 'बिदेसिया' का भव्य मंचन किया गया। वरिष्ठ रंग निर्देशक नवाब आलम के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने न केवल लोक संस्कृति की खुशबू बिखेरी, बल्कि दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोर कर रख दिया। ​कथानक: प्रेम, प्रतीक्षा और द्वंद्व की गाथा ​नाटक की कहानी एक ऐसे युवा (बिदेसी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शादी के तुरंत बाद रोजगार की तलाश में अपनी पत्नी 'प्यारी सुंदरी' को छोड़कर कलकत्ता चला जाता है। वर्षों के लंबे इंतजार और विरह की पीड़ा के बीच कहानी में तब नया मोड़ आता है, जब एक राहगीर (बटोही) के जरिए उसे संदेश भेजा जाता है। ​कलकत्ता के ग्लैमर में फंसा बिदेसी वहां 'धानिया' नाम की स्त्री से दूसरी शादी कर लेता है। नाटक का अंतिम पड़ाव बेहद संवेदनशील है, जहाँ अंततः दोनों पत्नियों के बीच टकराव और फिर आपसी सहमति के साथ रहने के फैसले से नाटक एक सकारात्मक संदेश के साथ समाप्त होता है। ​कलाकारों का प्रदर्शन और निर्देशन ​मुख्य भूमिकाएं: युवा अभिनेता चैतन्य न...